सुहानी को आज चाहकर भी नींद नहीं आ रही थी। बार बार कोशिश करने से भी नहीं, करवटें बदलते बदलते दो बज गए थे। इसका एहसास शायद अभय को भी हो गया था।
"क्या हुआ सुहू, तुम्हें नींद क्यूँ नहीं आ रही?" अभय ने पूछा| "तुम जॉब पर कल पहली बार तो नहीं जा रही, पिछले कई सालों से इस जॉब में हो, फिर ये घबराहट क्यूँ?"
"नहीं, कुछ भी नहीं, बस ऐसे ही" सुहानी चाह कर भी कुछ कह नहीं पाई| कैसे बताए अभय को अपने मन में उठने वाली दुविधा के बारे में।
असल में सुहानी और अभय की शादी को अभी पंद्रह ही दिन हुए थे। सुहानी की सरकारी नौकरी थी, शादी से पहले तक तो ठीक था, बिंदास जॉब कर रही थी। घर के काम की तो कोई टेंशन ही नहीं थी, मम्मी सब संभाल लेती थी। पर अब टेंशन यह थी क्या वो घर और ऑफिस की जिम्मेदारी बखूबी निभा पाएगी? घर में सबको खुश रख पाएगी या नहीं? आज उसकी छुट्टियों का आखिरी दिन था और उसे कल से ऑफिस जॉइन करना था। सोचते सोचते जो आंख लगी तो सुबह अलार्म से ही खुली।
नया दिन, नई सुबह, नया साल, क्या पता कैसे होगा सब! मन में तो सब प्लान कर चुकी थी, अब बारी थी एक्जिक्यूट करने की| सो फटाफट पहुंच गई रसोई में। जाकर देखा कि मम्मी जी वहां पहले से मौजूद थीं।
"बेटा,ये लो चाय तैयार है" चाय के दो कप डाइनिंग टेबल पर रखते हुए सासू मां बोली।
"आप इतनी जल्दी क्यों उठ गई मम्मी जी?" मैंने पूछा।
"तुम्हारी मदद करने बेटा, तुम अकेले सब कैसे करती?" मम्मी जी बोली।
मैंने झट से मम्मी जी को गले लगा लिया। हम दोनों ने गर्मागर्म चाय पी, फिर मिल कर नाश्ते व खाने की तैयारी की। बातें करते करते रसोई का काम कब निबट गया, पता ही नहीं चला।
"सुहानी अब तुम जाकर तैयार हो जाओ। मैं तुम्हारा, तुम्हारे पापा जी का व अभय का लंच लगा देती हूँ।"
समझ नहीं आ रहा था कि लोग ससुराल और मायके में इतना अन्तर क्यूँ समझते हैं? मुझे तो ये अन्तर बस उन्नीस-बीस का ही लग रहा था| मतलब पहले से भी कहीं ज्यादा प्यारा नज़र आ रहा था। सच में यह नया साल ढेर सारी खुशियाँ लेकर आया था मेरे जीवन में।
- Parul Bansal
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