सुबह का समय था। रिद्धि अपने कमरे में तैयार हो रही थी—आज उसके कॉलेज का वार्षिक नृत्य समारोह था और वह मुख्य प्रस्तुति देने वाली थी। माँ ने आवाज़ लगाई,
"रिद्धि, जल्दी कर! हमें समय से हॉल पहुँचना है। तुम्हारे पापा का भी इंतज़ार है।"
रिद्धि भागती हुई कमरे से बाहर आई, लेकिन जैसे ही ड्राइंग रूम से गुज़री, उसकी नज़र कोने में बैठे अपनी दादी पर पड़ी। दादी के पैरों में सूजन थी, और उन्होंने पुरानी, हल्की फटी चप्पल पहनी हुई थी। उनके हाथ में एक पुराना स्वेटर था जिसे वे बुन रही थीं।
"दादी, आप भी चलिए ना मेरे डांस शो में!" रिद्धि ने उत्साह से कहा।
दादी ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं बेटा, मैं चलूँगी तो तुम्हें संभालने वाला कौन होगा? मैं वहीं रहकर भगवान से तुम्हारे लिए दुआ करूँगी।"
रिद्धि ने मम्मी की तरफ देखा, "माँ, दादी को क्यों नहीं ले जा रहे? वे तो मुझे हमेशा डांस स्टेप्स याद करने में मदद करती हैं।"
माँ ने धीमे स्वर में कहा, "बेटा, वहाँ सब तुम्हारे कॉलेज के लोग होंगे, भीड़ होगी, दादी को चलने में परेशानी होती है। और उनकी व्हीलचेयर ले जानी पड़ेगी, फिर हर कोई सवाल करेगा।"
रिद्धि की आँखों में पानी आ गया। "माँ, दादी को आज मेरे साथ होना ही चाहिए। अगर वे नहीं आएँगी, तो मैं डांस ही नहीं करूंगी।"
पापा ने अख़बार से नज़र उठाई, "रिद्धि, इतनी ज़िद मत करो। तुम्हारा शो मिस हो जाएगा।"
रिद्धि ने दृढ़ स्वर में कहा, "तो मिस हो जाए, लेकिन दादी के बिना मैं मंच पर नहीं जाऊंगी।"
पापा ने गहरी साँस ली, "ठीक है, ले चलते हैं, लेकिन दादी की देखभाल का ज़िम्मा तुम्हारा होगा।"
"पक्का!" रिद्धि ने खुशी से सिर हिलाया।
उसने दौड़कर दादी के लिए हल्के गुलाबी रंग की साड़ी निकाली, उनके बालों में एक छोटा-सा गजरा लगाया, और आरामदायक चप्पल पहनाई। फिर व्हीलचेयर में आराम से बिठाकर कार में बैठा दिया।
रास्ते भर दादी के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी—शायद सालों बाद वे कहीं बाहर जा रही थीं।
हॉल में पहुंचते ही सबकी नज़रें रिद्धि और उसकी दादी पर पड़ीं। रिद्धि मंच के पीछे तैयार होने चली गई, लेकिन हर थोड़ी देर में आकर दादी का हाल पूछ लेती।
"दादी, पानी लाऊँ?"
"दादी, कंबल ठीक है?"
"दादी, मेरी बारी आने वाली है, आप यहीं से देखना।"
समारोह शुरू हुआ। कई प्रस्तुतियों के बाद रिद्धि की बारी आई। वह मंच पर आई और दर्शकों की ओर देखते हुए माइक्रोफोन उठाया।
"आज का डांस मैं अपनी दादी को समर्पित करती हूँ। जब मैं छोटी थी, तो मेरे डांस स्टेप्स की पहली टीचर यही थीं। इन्होंने मुझे सिर्फ कदम मिलाना नहीं सिखाया, बल्कि जिंदगी में हर कदम मजबूती से चलना भी सिखाया है।"
दर्शकों में हलचल हो गई, सभी दादी की ओर देखने लगे। दादी की आँखें भर आईं।
रिद्धि ने कथक की अद्भुत प्रस्तुति दी। हर ताल, हर भाव में दादी के साथ बिताए बचपन के पल झलक रहे थे। कभी वह घूमते-घूमते दादी की ओर हाथ बढ़ाती, तो कभी पाँव पटकते हुए उनकी ओर मुस्कुराती।
प्रस्तुति खत्म होते ही पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
रिद्धि सीधी दादी के पास गई, उनके हाथ पकड़कर बोली, "दादी, ये आख़िरी स्टेप आपके बिना अधूरा था।"
समारोह के बाद, एक सम्मानित अतिथि—शहर के जाने-माने कला संस्थान के प्रमुख—रिद्धि और उसकी दादी के पास आए।
"बेटी, तुम्हारे नृत्य में सिर्फ कला नहीं, बल्कि भावनाओं का सागर था। और जब जाना कि इसकी प्रेरणा तुम्हारी दादी हैं, तो मन भर आया। मैं चाहता हूँ कि तुम हमारे संस्थान में बतौर छात्रा आओ, और साथ में अपनी दादी को भी यहाँ अतिथि शिक्षक के रूप में लाएँ।"
सब हैरान रह गए। दादी के चेहरे पर गर्व और संकोच दोनों थे।
घर लौटते समय पापा ने कार में कहा, "अम्मा, आज मुझे शर्म आ रही है कि मैंने सोचा था कि आपको साथ ले जाना परेशानी होगा। असल में, आज अगर आप न होतीं, तो ये दिन अधूरा होता।"
दादी ने हंसकर कहा, "बेटा, मैं समझती हूँ कि तुम अपनी इज्जत और आराम के बारे में सोच रहे थे, लेकिन कभी-कभी रिश्तों का मान रखना इज्जत से भी बड़ा होता है।"
रिद्धि ने पापा का हाथ पकड़ते हुए कहा, "पापा, पंजा और उंगलियों वाली बात याद है ना? अगर पंजा नहीं होगा, तो उंगलियां बिखर जाएंगी।"
पापा ने दादी की ओर देखते हुए कहा, "अम्मा, अब से आपकी जगह सिर्फ घर के कोने में नहीं होगी। आप हमारे साथ हर खुशी, हर मौके में रहेंगी—चाहे व्हीलचेयर हो या कुछ और।"
कुछ महीनों बाद, रिद्धि और दादी कला संस्थान में साथ जातीं। दादी बच्चों को पारंपरिक नृत्य के भाव और हाथों की मुद्राएं सिखातीं, और रिद्धि नई पीढ़ी की नृत्य शैलियां।
एक दिन दादी ने कहा, "रिद्धि, तुम्हें पता है, तुम्हारे कारण मैं फिर से जीने लगी हूँ। मुझे लगा था कि अब मेरा काम खत्म हो गया है, लेकिन तुमने साबित कर दिया कि उम्र चाहे जो हो, अगर परिवार साथ हो, तो हर कदम नया होता है।"
रिद्धि मुस्कुराई, "दादी, ये तो बस हमारी जोड़ी का पहला स्टेप है।"
दोस्तो जब हम अपने बुज़ुर्गों को बोझ समझकर उनसे दूरी बनाते हैं, तो हम सिर्फ उन्हें ही नहीं, बल्कि खुद को भी अपूर्ण बना लेते हैं।
परिवार का असली सौंदर्य तब है, जब हर पीढ़ी एक-दूसरे का हाथ थामे, हर कदम साथ चलती है।
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