न घर का न घाट का

 जिल्लत भरी जिन्दगी से तंग आकर नीना शाम में नदी किनारे बैठी सूर्य के अप्रतिम सौन्दर्य  को एकटक निहार रही थी।सूर्य तो डूबने के समय भी चहुँओर अपनी अलौकिक  छटा बिखेरकर डूब रहा था,परन्तु उसकी जिन्दगी तो जवानी में ही थाली के बैंगन की भाँति इधर-उधर लुढ़क रही है।अपने एक गलत फैसले के कारण वह न घर की रही न घाट की।बैठे -बैठे छः महीने पूर्व  की उसकी जिन्दगी आँखों के सामने घूमने लगी।


सामान्य परिवार की नीना  माता-पिता और भाई के साथ रहती थी।युवावस्था के आगमन होते ही उसकी आँखों में सुनहले ख्वाब भरने लगें।उसे सपनों की दुनियाँ में खोई हुई देखकर  कई बार टोकते हुए उसकी माँ ने कहा था -" बेटी!अभी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान  दो।।कुछ शिक्षा हासिल कर लो,जिससे जिन्दगी सुधर जाएगी।"

परन्तु  उसे माँ की बातें जहर के समान लगतीं क्योंकि उसे पड़ोस के ही नितिन  नाम के लड़के से प्यार हो चुका था।नीना नितिन की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर एक दिन  घर से भाग गई। 


माता-पिता बेटी की करतूत से सदमे में आ गए। समाज में काफी बदनामी हो गई। अपनी इज्जत पर धब्बा लगने के कारण उसे परिवार के लिए  मृत  मानकर सम्बन्ध तोड़ लिया।कुछ दिनों तक तो नीना नितिन के साथ  सपनों की दुनियाँ में खोई रही।एक महीना बाद ही नितिन उसे छोड़कर चुपचाप चला गया।वो सपनीला प्यार  उसकी आँखों में अपने लिए आकर्षण,साथ जीने-मरने की कसमें एक झूठी बेचारगी बनकर रह गई। उसके अंतस् में कैद ऊर्जा  खीझ और चिड़चिड़ेपन के रुप में बाहर आने लगी।वो चाहत पहले निराशा,फिर  आक्रोश,फिर आत्महत्या के लिए  उसे उकसा रही थी।जीवनलीला समाप्त करने के उद्देश्य से ही नदी किनारे आई थी।पर घर से भागने के समय जो लड़की कमजोर नहीं पड़ी थी,वो आज नदी में कूदने का साहस नहीं बटोर पाई।चहुँओर अँधियारा फैलने पर वह अपने कदमों को घसीटते हुए धर्मशाला की ओर चल पड़ी।आखिर अपने दुष्कर्मों का फल उसे खुद भोगना पड़ेगा।

नीना की कहानी को पढ़कर कह सकते हैं कि अपनी नादानियों के कारण वह न तो घर की रही न ही घाट की।


समाप्त। 

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)


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