घर का न घाट का

 टोपी बाबा हमारे बाबा के जिगरी दोस्त थे। दोनों लोग हमारे शहर के शुगर फैक्ट्री में काम करते थे। टोपी बाबा का घर  दूसरे शहर में था। शुगर फैक्ट्री का क्वार्टर मिला था लेकिन रहते हमारे यहां ही थे। नौकरी सीजनल थी इसलिए 6 महीने यहां रहते उसके बाद  अपने घर चले जाते थे।

  हां ,अब मैं बताऊं, उन्हें टोपी बाबा क्यों कहते थे। हुआ यूं, जब भी मां चाय -नाश्ता हम भाई बहनों द्वारा बाबा और उनके दोस्त के लिए भेजती थी तो हम पूछ बैठते थे, "कौन बाबा को देना है, अपने बाबा या दूसरे वाले बाबा को?" मां को यह बात बहुत बुरी लगती थी। तब मां ने हमें सिखाया 'टोपी वाले बाबा'। हम नादान बच्चे उनके मुंह पर ही टोपी बाबा कह देते थे और तब बन गए हमारे 'टोपी बाबा'।

वे हमें बहुत दुलारते और कहानियां सुनाते थे। कभी -कभी उन्हें भी शरारत सुझती और कहानी सुनाते समय एक ही पंक्ति को बार-बार दोहराते थे। जैसे -एक हथिनी थी और उसका एक बच्चा।एक हथिनी थी और उसका एक बच्चा।हम बच्चे उत्सुक हो आगे की कहानी सुनना चाहते लेकिन वे एक पंक्ति से आगे बढ़ते ही नहीं थे और हमारी नाराजगी पर ठहाके लगा कर हंसते थे।हम मां के पास शिकायत लेकर पहुंचते। मां मुस्कुरा देती ,और हमें आश्वस्त करती कि कल टोपी बाबा पूरी कहानी जरूर सुनाएंगे।

रिटायरमेंट के बाद वे अपने घर चले गए। कभी -कभार आते थे। हमारे बाबा नहीं रहे।

  संजोगवश बीएससी की मेरी परीक्षा का सेंटर टोपी बाबा के शहर में था। मैंने पापा से टोपी बाबा से मिलने की इच्छा जताई। पापा ने कहा ,"क्यों नहीं , मुझे भी 2 साल हो गए उनसे मिले।" होटल में ना रुक कर उन्हीं के यहां रुकेंगे। मैं बहुत खुश थी। मां ने टोपी बाबा के पसंद की आलू ,बैगन और अदौरी की सब्जी और चीला बना कर दी।

रात्रि के 9:00 बजे हम टोपी बाबा के यहां पहुंचे। ड्राइंग रूम में चाय- नाश्ता आया। मैंने उनके बेटे यानी चाचा जी से पूछा , "टोपी बाबा कहां है?"उन्होंने कहा," बीमार हैं।"   "मुझे उनसे मिलना है।"मैंने कहा।

उन्होंने मिलने से यह कह कर मना कर दिया कि सो रहे हैं।

पापा ने जब रुकने की बात कही तो उन्होंने कहा, गेस्ट आएं हैं जगह नहीं है। खड़ूस आदमी हैं टोपी बाबा के लड़के।

पापा ने मां की दी हुई सब्जी और चीला उन्हें दे दिया।

हम वहां से चल,कई होटलों में गए लेकिन कहीं जगह नहीं मिली क्योंकि उस दिन शादी का‌ जबरदस्त लग्न था। अंततः हमने स्टेशन के प्लेटफार्म पर किसी तरह रात बिताई।

हमें न टोपी बाबा मिले और न होटल।

हम न घर के रहे‌ न घाट के।


संगीता श्रीवास्तव

लखनऊ

स्वरचित, अप्रकाशित।


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