घुंघट

 मंदिर में शादी हुई थी अनामिका और सुदर्शन की। ससुराल में तो कोहराम मच गया। दोनों ने अपनी मर्ज़ी से शादी कर ली थी। एक तो अपनी मर्ज़ी की शादी और ऊपर से अलग जात में!

ससुराल में कदम रखते ही सास छाती पीट-पीटकर दहाड़े मारकर रोने लगी—
“हे रे मेरा भाग्य फूट गया! मेरी बहू ने मेरी मर्ज़ी के खिलाफ शादी कर ली। अब गाँव में क्या मुँह दिखाऊँगी? अच्छा होता, मैं मर जाती। कोई रस्सी लेकर आओ, मैं पेड़ से लटक जाऊँगी, यह जीवन समाप्त कर दूँगी। इस बहू के हाथ का पानी तक नहीं पिऊँगी। जात बिरादरी में मुँह दिखाने लायक नहीं रही!”

नई नवेली दुल्हन, मात्र 20 साल की अनामिका, टुकुर-टुकुर देखने लगी। उसे कुछ समझ नहीं आया। तभी शादीशुदा बड़ी ननद ने आकर उसके कान में कहा।

बेचारी बहू दौड़कर सासु माँ के पैर पकड़ ली और रो-रो कर कहने लगी—
“मुझसे गलती हो गई है माँजी। मुझे माफ़ कर दीजिए, मुझे अपनी बहू स्वीकार कर लीजिए।”

थोड़ी देर में सास का रोना कम हुआ। उसने बहू को दूर धकेलते हुए कहा—
“दूर हो जाओ मेरी नज़रों से! तुम्हारी जैसी मनहूस का मेरे घर में कोई स्थान नहीं है। मेरे बेटे पर डोरे डाल दिए, मायके से कुछ लाकर नहीं लाई। मेरा बेटा पढ़ा-लिखा और नौकरी करने वाला है, उसकी इज़्ज़त का तो थोड़ा ध्यान रखा होता।”

बेचारी बहू चुपचाप सासु माँ के पाँव पड़कर रोती रही और कहती रही—
“माँजी, मैं भी पढ़ी-लिखी हूँ। बी.ए. पास किया है प्रथम श्रेणी में। किसी दिन मैं भी ऑफिस में नौकरी कर लूँगी और तनख्वाह आपके हाथों में लाकर दूँगी।”

सास बोलीं—
“हमारे घर की बहुएँ नौकरी नहीं करतीं। घूँघट में रहती हैं। तुम्हें भी घूँघट में रहना पड़ेगा। जो भी लोग आएँगे, उन्हें प्रणाम करना, मगर घूँघट में रहना ताकि गाँव में मेरी नाक न कटे।”

बहु ने वैसा ही किया जैसा सासु माँ का आदेश था। कौन छोटा है, कौन बड़ा है—घूँघट से उसे कुछ नज़र नहीं आता था। जैसे-जैसे लोग आते गए, वह सबके पाँव छूकर प्रणाम करती गई।

अंत में एक 16 साल के लड़के के पाँव छू लिए। लड़का थोड़ा पीछे हटते हुए बोला—
“अरे, क्या कर रही हो भाभी! मैं तो तुम्हारा छोटा देवर मनोज हूँ। मेरे पाँव छूकर क्यों प्रणाम कर रही हो?”

मनोज की यह बात सुनकर वहाँ खड़े सब लोग ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। बेचारी बहू घूँघट में सिमट गई। उसे भला क्या पता सामने कौन खड़ा है—बड़ा है या छोटा।

आख़िरकार सासु माँ थोड़ी-सी खुश हुई और बहू का गृह प्रवेश करा दिया।

गाँव से अपमानित होकर बहू ने निश्चय किया—“अब नौकरी करके रहूँगी।” उसने पूरी कोशिश की और एक सरकारी ऑफिस में अच्छी नौकरी पा ली।

अब तो बहू को गाँव जाने का अवसर मिलता ही नहीं था। गाँव के लोग कभी-कभी शहर आते-जाते रहते।

सासु माँ अब बहू की बलिहारी जाने लगी। सबसे बहू का बखान करती—
“मेरी बहू बहुत अच्छे ऑफिस में नौकरी करती है। हर महीने इतनी तनख्वाह मिलती है। मुझे हर महीने पैसे भेजती है। मायके से कुछ नहीं लाई तो क्या हुआ, बहू स्वयं साक्षात लक्ष्मी है।”

अब वह कहतीं—
“तुम्हें घूँघट करने की ज़रूरत नहीं है।”

असल में बहू ने खुद ही घूँघट करना छोड़ दिया था।

गाँव जाकर उसने साफ़ कह दिया—
“अब मैं घूँघट नहीं कर सकती। मैं घूँघट प्रथा के खिलाफ़ हूँ। अगर आपको यह पसंद है तो मैं गाँव आऊँगी, वरना नहीं आऊँगी। चाहे आप जो भी कर लें, अब मैं घूँघट नहीं करूँगी।”

इस बार बहू के सामने सासु माँ की ज़ुबान नहीं चली। उसने हाँ में सिर हिला दिया—
“तुम्हें जैसा अच्छा लगे, वैसा करो।”

समय का फेर है। समय बदलते देर नहीं लगती।


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