विक्रम सिंघानिया के लिए दुनिया में हर चीज़ बिकाऊ थी, बस उसकी सही कीमत लगाने वाला जौहरी होना चाहिए। शहर के सबसे पॉश इलाके में उसका आर्ट गैलरी का व्यवसाय था, लेकिन वह खुद को व्यापारी से ज्यादा 'कला का पारखी' मानता था। उसे पुरानी, दुर्लभ और नायाब चीज़ों को कौड़ियों के दाम में खरीदने और उन्हें करोड़ों में बेचने का नशा था। उसके लिए इंसान की भावनाएँ, मजबूरी या आंसू कोई मायने नहीं रखते थे; मायने रखती थी तो सिर्फ वह वस्तु जो उसके ड्राइंग रूम या गैलरी की शान बढ़ा सके।
आज भी उसकी आलीशान कार शहर की चकाचौंध से दूर, एक बेहद तंग और बदबूदार बस्ती की ओर बढ़ रही थी। ड्राइवर ने नाक पर रुमाल रख लिया था, लेकिन विक्रम की आँखों में एक शिकारी जैसी चमक थी। उसे खबर मिली थी कि इस बस्ती के एक पुराने, जर्जर मकान में एक ऐसा वाद्ययंत्र (सितार) है जो मुगलकालीन है और उसकी नक्काशी बेजोड़ है।
"साहब, गाड़ी यहाँ से आगे नहीं जाएगी," ड्राइवर ने संकोच करते हुए कहा।
विक्रम ने झुंझलाते हुए अपना महंगा कोट सही किया और कीचड़ भरे रास्ते पर उतर गया। उसके चमचमाते जूते उस गंदगी में बेमेल लग रहे थे। वह उस दलाल, रज्जाक के पीछे चल दिया जो उसे यहाँ लाया था।
"साहब, बस यही वो घर है। बुढ़िया बहुत बीमार है और घर में एक जवान लड़की है। पैसे की सख्त ज़रूरत है उन्हें। आप जो भी दाम फेंकेंगे, वो उठा लेंगे," रज्जाक ने अपने पान रंगे दांत दिखाते हुए कहा।
विक्रम ने एक तिरस्कार भरी नज़र उस टूटे हुए दरवाजे पर डाली। दीवारों का प्लास्टर उखड़ चुका था और छत से शायद पानी टपकता था। उसने मन ही मन सोचा, 'ऐसी गंदगी में नायाब हीरे छुपे होते हैं, जिन्हें तराशना मेरा काम है।'
दरवाजा खटखटाने पर एक हल्की सी आहट हुई। दरवाजा खुला और सामने एक लड़की खड़ी थी। उम्र मुश्किल से बीस-इक्कीस साल रही होगी। सांवला रंग, बड़ी-बड़ी उदास आँखें और शरीर पर एक पुराना, जगह-जगह से रफू किया हुआ सूती कुरता। गरीबी ने उसके चेहरे की मासूमियत को समय से पहले ही परिपक्वता में बदल दिया था।
"जी? किसे ढूँढ रहे हैं?" उसकी आवाज़ में एक डर और संकोच था।
रज्जाक ने विक्रम की ओर इशारा किया, "अरे गौरी, ये शहर के बड़े साहब हैं। तेरी माँ ने वो पुराना सितार बेचने को कहा था ना? बस उसी को देखने आए हैं। अगर साहब को पसंद आ गया, तो तुम्हारे सारे कर्जे उतर जाएंगे।"
गौरी ने विक्रम की ओर देखा। विक्रम की नज़रें उस पर नहीं, बल्कि घर के भीतर झाँक रही थीं, जैसे वह तौल रहा हो कि यहाँ और क्या-क्या लूटा जा सकता है।
"आइए," गौरी ने रास्ता दिया।
घर के अंदर अंधेरा और सीलन थी। एक कोने में खाट पर एक बुजुर्ग महिला लेटी थी जो लगातार खाँस रही थी। विक्रम ने उस तरफ देखना भी ज़रूरी नहीं समझा। उसका पूरा ध्यान उस सितार पर था जो दीवार के सहारे खड़ा था। लकड़ी पर की गई नक्काशी धूल के नीचे भी चमक रही थी। विक्रम का अनुभवी मन समझ गया कि यह कोई साधारण चीज़ नहीं है। बाज़ार में इसकी कीमत लाखों में होगी।
उसने सितार को हाथ में लिया, तारों को छेड़कर देखा, और फिर चेहरे पर एक बनावटी निराशा लाकर बोला, "हम्म... हालत बहुत खराब है। दीमक लग रही है नीचे। तार भी बदलने पड़ेंगे। इस कबाड़ को रिस्टोर करने में ही हज़ारों लग जाएंगे।"
गौरी ने घबराकर कहा, "नहीं साहब, यह बहुत पुराना है। मेरे नानाजी बजाते थे। माँ कहती हैं यह रियासत के समय का है। हमें माँ के इलाज के लिए पैसों की ज़रूरत है, वरना हम इसे कभी नहीं बेचते।"
विक्रम ने एक क्रूर मुस्कान के साथ कहा, "मजबूरी और इतिहास बाज़ार में नहीं बिकते, लड़की। चीज़ की हालत बिकती है। मैं इसके पांच हज़ार दे सकता हूँ। लेना है तो बोलो, वरना मैं चलता हूँ।"
"पांच हज़ार?" गौरी की आँखों में पानी भर आया। "साहब, रज्जाक चाचा ने तो कहा था कि कम से कम पचास हज़ार मिलेंगे। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए चालीस हज़ार मांगे हैं।"
विक्रम ने अपनी जेब से बटुआ निकाला और नोटों की गड्डी दिखाई। "देखो, नकद लाया हूँ। बाज़ार में मंदी है। कोई इसे कबाड़ के भाव भी नहीं लेगा। मैं तो सिर्फ रज्जाक के कहने पर यहाँ तक आया। सौदा करना है तो करो, मेरा वक़्त बहुत कीमती है।"
वह जानता था कि मेज पर रखा पैसा और कोने में खाँसती माँ, इस लड़की को झुकने पर मजबूर कर देंगे। यह उसका रोज़ का खेल था।
गौरी ने एक नज़र अपनी माँ की ओर देखा जो दर्द से कराह रही थी। फिर उसने अपनी आत्मसम्मान की चादर उतार फेंकी और कांपते हाथों से सितार विक्रम की ओर बढ़ा दिया।
"ले जाइए साहब... बस माँ बच जाए।"
विक्रम ने जीत की चमक के साथ पांच हज़ार रुपये मेज पर पटक दिए। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि वह एक अनमोल धरोहर को मिट्टी के दाम लूट रहा है। उसने सितार उठाया और पलटने लगा।
"पानी मिलेगा? गला सूख रहा है," विक्रम ने आदेश दिया।
गौरी चुपचाप अंदर रसोई की तरफ मुड़ी। विक्रम घर का मुआयना करने लगा। उसकी नज़र कमरे की दीवार पर टंगी एक पुरानी, धुंधली तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर पर धूल की परत जमी थी और मकड़ी के जाले लगे थे।
उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और अनायास ही उस तस्वीर को साफ करने लगा, यह देखने के लिए कि शायद फ्रेम एंटीक हो। जैसे ही धूल हटी और तस्वीर का चेहरा साफ़ हुआ, विक्रम के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसके हाथ से महंगा रुमाल छूटकर गंदे फर्श पर गिर गया।
उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि उसे लगा पसलियां टूट जाएंगी। वह तस्वीर किसी और की नहीं, बल्कि उसकी अपनी जवानी की थी, जिसमें वह एक महिला के साथ खड़ा था। और वह महिला... वह महिला वही थी जो आज कोने में खाट पर पड़ी मौत से लड़ रही थी—सुधा।
अतीत का एक बवंडर उसकी आँखों के सामने घूम गया। पच्चीस साल पहले, विक्रम एक संघर्षरत कलाकार था। सुधा से उसने प्रेम विवाह किया था। लेकिन विक्रम की महत्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी थीं। उसे पैसा चाहिए था, शोहरत चाहिए थी। सुधा सादगी पसंद थी। वह चाहती थी कि विक्रम अपनी कला को बेचे नहीं, बल्कि जिए।
विचारों का मतभेद रोज़ के झगड़ों में बदल गया था। और एक दिन, जब विक्रम ने पैसे के लिए अपनी और सुधा की एक बेहद निजी और भावनात्मक पेंटिंग एक अमीर ग्राहक को बेच दी थी, तो सुधा उसे छोड़कर चली गई थी। वह उस वक़्त गर्भवती थी। विक्रम ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की थी। उसके अहंकार ने कहा था—'जाती है तो जाए, जब पैसे खत्म होंगे तो नाक रगड़ते हुए वापस आएगी।'
लेकिन वह कभी वापस नहीं आई। विक्रम ने अपनी दुनिया बना ली, दूसरी शादी की (जो टिक नहीं पाई), दौलत कमाई, लेकिन कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा कि सुधा कहाँ गई।
और आज... आज वह उसी सुधा के घर में खड़ा था।
विक्रम के हाथ कांपने लगे। वह धीरे-धीरे उस खाट की ओर बढ़ा जिसे उसने अब तक नज़रअंदाज़ किया था। बीमारी और गरीबी ने उस चेहरे को पहचानना मुश्किल कर दिया था, लेकिन माथे पर वही पुराना तिल और आँखों की बनावट... यह सुधा ही थी।
"सुधा..." उसके गले से एक फटी हुई आवाज़ निकली।
बुढ़ी महिला ने भारी पलकें उठाईं। धुंधली आँखों ने उसे देखा। एक क्षण के लिए पहचान की एक चिंगारी जली, और फिर नफरत और बेबसी में बदल गई। उसने अपनी सूखी उंगलियों से चादर को कसकर पकड़ लिया।
तभी गौरी पानी का गिलास लेकर आई। उसने देखा कि वह 'व्यापारी' उसकी माँ की खाट के पास घुटनों के बल बैठा है और उसकी आँखों से आंसू बह रहे हैं।
"क्या हुआ साहब?" गौरी ने डरते हुए पूछा।
विक्रम ने मुड़कर गौरी को देखा। अब उसे उस सांवले चेहरे में अपनी ही झलक दिखाई दे रही थी। वही तीखी नाक, वही माथा। यह उसकी बेटी थी। वह बेटी जिसके अस्तित्व को उसने अपने अहंकार में कभी ढूँढने की कोशिश नहीं की थी। वह बेटी जिससे वह अभी पाँच हज़ार रुपये में उसके पिता (नाना) की आखिरी निशानी ठग रहा था।
"गौरी..." विक्रम की आवाज़ रुंध गई। "यह... यह तस्वीर...?"
"यह मेरे पिताजी हैं," गौरी ने तस्वीर की ओर देखते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कड़वाहट आ गई। "माँ कहती हैं वो मर चुके हैं। बहुत पहले मर गए थे। जब उन्होंने पैसे के लिए अपना ज़मीर बेच दिया था, तभी मर गए थे।"
विक्रम को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारा हो।
"लेकिन... माँ ने यह तस्वीर क्यों रखी है?" विक्रम ने पूछा, हताशा में एक उम्मीद तलाशते हुए।
"ताकि मुझे याद रहे," गौरी ने सपाट स्वर में कहा। "माँ कहती थीं, 'बेटी, इस चेहरे को रोज़ देखना और याद रखना कि ज़िंदगी में कभी किसी इंसान को चीज़ों से कम मत समझना। कभी पैसे के लिए अपनों का सौदा मत करना।' यह तस्वीर मेरे लिए किसी याद की नहीं, बल्कि एक सबक की तरह टंगी है।"
विक्रम सर से पाँव तक सुन्न पड़ गया। उसने जिस सितार को "कबाड़" कहा था, वह असल में वही सितार था जिसे बजाकर वह कभी सुधा को रिझाया करता था। आज उसने अपनी ही बेटी को, अपनी ही पत्नी के इलाज के लिए, अपनी ही विरासत बेचने पर मजबूर कर दिया था। और कीमत लगाई थी—मात्र पांच हज़ार।
उसने अपनी जेब से वह सितार वहीं रखा। उसका सारा अहंकार, सारी दौलत, सारा आर्ट कलेक्शन इस टूटे हुए घर की चौखट पर धूल बन चुका था। उसने अपनी जेब से चेकबुक निकाली, हाथ कांप रहे थे। वह दौलत लुटा देना चाहता था, वह सब कुछ दे देना चाहता था जो उसके पास था।
"गौरी... मैं... मैं मदद करना चाहता हूँ। ऑपरेशन के लिए, घर के लिए..."
सुधा, जो अब तक खामोश थी, ने पूरी ताकत बटोरकर हाथ उठाया और दरवाजे की तरफ इशारा किया। उसके मुँह से शब्द नहीं निकले, लेकिन उसकी आँखें चिल्ला रही थीं—'अब नहीं।'
गौरी ने विक्रम के हाथ में चेकबुक देखकर उसे वापस धकेल दिया। "साहब, हमने सितार बेचा है, अपना स्वाभिमान नहीं। सौदा हो गया है। आप चीज़ उठाइए और जाइए। हमें किसी की भीख नहीं चाहिए। मेरे पिता तो मर चुके हैं, और कोई अजनबी हम पर इतना मेहरबान क्यों होगा, यह हम नहीं जानते। और जानना भी नहीं चाहते।"
विक्रम के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे। वह कैसे कहता कि वह ज़िंदा है? वह कैसे बताता कि वह वही 'मुर्दा' पिता है? जिस बाप ने अभी-अभी अपनी बेटी की मजबूरी का फायदा उठाया हो, वह किस मुँह से रिश्ता जोड़े?
उसने मेज पर रखे पांच हज़ार रुपयों को देखा। वे नोट उसे अब कागज के टुकड़े नहीं, बल्कि अंगारे लग रहे थे।
गौरी ने सितार उठाया और उसके हाथों में थमा दिया। "लीजिए, आपकी अमानत। अब जाइए।"
विक्रम भारी कदमों से, सितार सीने से लगाए, उस घर से बाहर निकला। बाहर ड्राइवर ने दरवाजा खोला, "मिल गया साहब वो नायाब पीस?"
विक्रम ने उस सितार को देखा। यह अब उसके लिए कोई एंटीक पीस नहीं था, बल्कि उसके अपराध का एक भारी बोझ था। उसने सितार को पिछली सीट पर रखा और खुद वहीं सड़क किनारे बैठ गया।
बारिश की हल्की बूंदें गिरने लगी थीं। विक्रम की महंगी गाड़ी, महंगा सूट और करोड़ों का बैंक बैलेंस—सब कुछ वहीं था। लेकिन आज वह दुनिया का सबसे गरीब इंसान महसूस कर रहा था। उसने एक नायाब चीज़ तो खरीद ली थी, लेकिन उस घर में, उस तस्वीर के सामने, और अपनी बेटी की नज़रों में, वह खुद को बहुत सस्ता बेच आया था।
अंदर से गौरी के रोने की आवाज़ आई, शायद माँ की तबीयत और बिगड़ गई थी। विक्रम चाहकर भी अंदर नहीं जा सका। उसके और उस दरवाजे के बीच पच्चीस साल के पापों की दीवार खड़ी थी, जिसे कोई भी चेकबुक अब गिरा नहीं सकती थी। उसने जीवन भर चीजों की कीमत लगाई थी, आज ज़िंदगी ने उसकी कीमत लगा दी थी—और वह कीमत थी, 'शून्य'।
लेखक: सुरेंद्र गुप्ता
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