शाम के गहरे सन्नाटे में घड़ी की टिकटिक गूँज रही थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, जो खिड़कियों के शीशों पर किसी अनचाहे मेहमान की तरह दस्तक दे रही थी।
जगन्नाथ बाबू अपनी व्हीलचेयर पर बैठे, काँपते हाथों से मेज़ पर रखे पानी के गिलास और अपनी सांस की नली (इनहेलर) की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें अस्थमा का ज़बरदस्त दौरा पड़ रहा था। साँसें किसी पुरानी धौंकनी की तरह चल रही थीं।
तभी कमरे का दरवाज़ा धड़ाम से खुला। वहां उनकी बहू, लावण्या खड़ी थी। उसके चेहरे पर क्रूरता का भाव था। उसने एक झटके में जगन्नाथ बाबू के हाथ से इनहेलर छीन लिया।
"साँस चाहिए आपको?" लावण्या ने इनहेलर को हवा में नचाते हुए कहा। "साँस लेकर क्या करेंगे बाबूजी? ताकि आप अपने उस नकारा बेटे के कान भर सकें? ताकि आप वसीयत बदलने की साज़िशें रच सकें?"
जगन्नाथ बाबू का चेहरा नीला पड़ रहा था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, बस आँखों से याचना कर रहे थे।
तभी उनकी पत्नी, सुमित्रा देवी, जो रसोइड़े में थीं, दौड़ती हुई आईं। पति की हालत देख उनके हाथ से दूध का गिलास छूट गया।
"लावण्या! यह क्या कर रही हो? उन्हें पंप दे दो, वरना उनकी जान चली जाएगी!" सुमित्रा देवी लावण्या के सामने गिड़गिड़ाने लगीं। "तुम्हें जो चाहिए ले लो, जेवर, ज़मीन, सब... लेकिन मेरे सुहाग को मत मारो।"
लावण्या ने क्रूरता से हँसते हुए इनहेलर को खुली खिड़की से बाहर अंधेरे और कीचड़ में फेंक दिया।
"जाओ, ढूँढ लो कीचड़ में," लावण्या ने फुफकारते हुए कहा। "और सुन लो, आज रात तुम दोनों को इस आलीशान कमरे में नहीं, बल्कि पीछे वाले पुराने स्टोर रूम में सोना होगा। मुझे कल की पार्टी के लिए यह कमरा खाली चाहिए। मेरे मेहमान आने वाले हैं और मैं नहीं चाहती कि घर में दवाइयों और बुढ़ापे की बदबू आए।"
उसने सुमित्रा देवी को बांह से पकड़कर खींचा और जगन्नाथ बाबू की व्हीलचेयर को धक्का देते हुए बरामदे की ओर ले गई।
"आज रात अगर आवाज़ भी की, तो कल का सूरज नहीं देख पाओगे। और हाँ, अगर मेरे पति से शिकायत की, तो याद रखना, वो मेरी मुट्ठी में है। वो वही सुनेगा जो मैं सुनाऊँगी।"
दरवाज़ा उनके मुँह पर बंद कर दिया गया।
बाहर कड़ाके की ठंड थी। स्टोर रूम, जिसमें सालों से कबाड़ भरा था, धूल और सीलन से भरा हुआ था। सुमित्रा देवी ने किसी तरह एक पुरानी दरी ज़मीन पर बिछाई और जगन्नाथ बाबू को उस पर लिटाया। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से उनकी छाती सहलाई और उन्हें शांत करने की कोशिश की। सौभाग्य से, सुमित्रा देवी हमेशा अपनी साड़ी की गांठ में एक छोटा सा आपातकालीन इनहेलर छुपाकर रखती थीं, जो उन्होंने डॉक्टर के कहने पर मंगवाया था। उन्होंने कांपते हाथों से वह पंप जगन्नाथ बाबू के मुंह में लगाया। दो-तीन कश लेने के बाद उनकी साँसें थोड़ी स्थिर हुईं।
"सुमित्रा..." जगन्नाथ बाबू ने क्षीण स्वर में कहा, उनकी आँखों से आँसू बह निकले। "हमने किस लिए इतनी मेहनत की? पूरी ज़िंदगी सरकारी दफ्तर में घिसते रहे, ताकि बेटे को बड़ा आदमी बना सकें। आज वही बेटा अपनी पत्नी के हाथों की कठपुतली बन गया है और हम... हम अपने ही घर में बेगाने हो गए।"
सुमित्रा देवी ने उनके आँसू पोंछे। "शांत हो जाइए। अभी आपको आराम की ज़रूरत है। कल सुबह हम कोई रास्ता निकालेंगे।"
"रास्ता?" जगन्नाथ बाबू ने कड़वाहट से कहा। "अब कौन सा रास्ता बचा है? बेटा मनीष तो हमारी शक्ल भी नहीं देखना चाहता। उसे लगता है कि हम उसकी आज़ादी और तरक्की के दुश्मन हैं। लावण्या ने उसे पूरी तरह बदल दिया है।"
पूरी रात दोनों ने जागकर काटी। ठंड हड्डियों में चुभ रही थी, लेकिन उससे ज़्यादा चुभन औलाद की बेरुखी की थी।
अगली सुबह घर में हलचल शुरू हो गई। लावण्या के लिए आज का दिन बहुत खास था। शहर के मेयर और कुछ बड़े बिल्डर्स लंच पर आने वाले थे। लावण्या मनीष के कंस्ट्रक्शन बिज़नेस को बड़ा करना चाहती थी और इसके लिए उसे जगन्नाथ बाबू के नाम वाली पुश्तैनी ज़मीन के पावर ऑफ अटॉर्नी की ज़रूरत थी। उसका प्लान था कि आज मेहमानों के सामने अच्छेपन का नाटक करके वह जगन्नाथ बाबू से कागज़ात पर साइन करवा लेगी।
सुबह के दस बजे, स्टोर रूम का दरवाज़ा खुला। नौकरानी चाय और कुछ अच्छे कपड़े लेकर आई।
पीछे-पीछे लावण्या आई, चेहरे पर एक झूठी मुस्कान चिपकाए हुए।
"अरे माँ जी, बाबूजी! आप लोग यहाँ क्यों सो रहे हैं? मैंने तो रात को कितनी बार कहा कि अंदर आ जाइए, लेकिन आप दोनों को तो ज़िद थी कि खुली हवा में सोना है," लावण्या ने ज़ोर से कहा, ताकि बाहर काम कर रहे मज़दूर और नौकर सुन सकें।
उसने जगन्नाथ बाबू के पास जाकर कहा, "सुनिए बुड्ढे, आज घर में वीआईपी लोग आ रहे हैं। चुपचाप नहा-धोकर तैयार हो जाओ और व्हीलचेयर पर बैठकर बस मुस्कुराते रहना। जब मैं इशारा करूँ, तो उन नीले कागज़ों पर साइन कर देना। अगर कोई ड्रामा किया, तो कसम है मुझे, कल से खाना तो दूर, पानी भी नसीब नहीं होगा।"
जगन्नाथ बाबू ने अपनी पत्नी की ओर देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई थी—वो चमक जो डर की नहीं, बल्कि एक निर्णय की थी। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
दोपहर को घर सज गया था। मेज़ पर तरह-तरह के पकवान थे। मनीष भी अपनी महँगी सूट में तैयार था, लेकिन वह अपने माता-पिता से नज़रें नहीं मिला पा रहा था। मेहमान आ चुके थे। मेयर साहब जगन्नाथ बाबू की पुरानी प्रतिष्ठा को जानते थे। जगन्नाथ बाबू अपने ज़माने के एक ईमानदार और कड़क ज़िलाधिकारी (DM) रह चुके थे।
"अरे जगन्नाथ साहब!" मेयर ने आगे बढ़कर हाथ मिलाया। "सुना है तबीयत नासाज़ रहती है? पर आज तो चेहरे पर बड़ा तेज है।"
लावण्या तुरंत बीच में कूद पड़ी, "जी अंकल, हम इनका बहुत ख्याल रखते हैं। मनीष तो इनके बिना एक पल नहीं रह पाता। है न मनीष?"
मनीष ने धीमे से सिर हिलाया, "जी..."
लंच के बाद, लावण्या ने अपनी चाल चली। वह एक फाइल लेकर आई।
"अंकल, देखिए न, बाबूजी मनीष के नए प्रोजेक्ट से कितने खुश हैं। आज शगुन के तौर पर ये अपनी ज़मीन मनीष के नाम कर रहे हैं, ताकि वो अपना ड्रीम प्रोजेक्ट शुरू कर सके।"
उसने पेन जगन्नाथ बाबू के हाथ में थमाया। "लीजिए बाबूजी, आशीर्वाद दीजिए।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। सबकी नज़रें जगन्नाथ बाबू के कांपते हाथों पर थीं। मनीष के माथे पर पसीना था। सुमित्रा देवी पत्थर की मूर्ति बनी बैठी थीं।
जगन्नाथ बाबू ने पेन उठाया। लावण्या की आँखों में जीत की चमक थी।
लेकिन तभी, जगन्नाथ बाबू ने फाइल को मेज़ पर ज़ोर से पटका। आवाज़ इतनी तेज़ थी कि सब चौंक गए।
"मैं साइन करूँगा," जगन्नाथ बाबू की आवाज़ में आज कंपन नहीं, बल्कि एक शेर की दहाड़ थी। "लेकिन इन कागज़ों पर नहीं।"
उन्होंने अपनी शेरवानी की जेब से एक पुराना, मुड़ा-तुड़ा लिफाफा निकाला।
"लावण्या, मनीष..." उन्होंने मेयर की ओर देखते हुए कहा, "मेयर साहब, आप गवाह रहिएगा। कल रात मेरी बहू ने मेरी जीवन रक्षक दवा कीचड़ में फेंक दी थी। मुझे और मेरी पत्नी को जानवरों की तरह स्टोर रूम में बंद कर दिया था।"
लावण्या का रंग फक पड़ गया। "यह... यह क्या बकवास कर रहे हैं? बुढ़ापे में इनका दिमाग सठिया गया है!" वह चिल्लाई।
"खामोश!" जगन्नाथ बाबू ने अपनी पुरानी अदालती आवाज़ में डांटा। "मैं बूढ़ा हूँ, पागल नहीं। सुमित्रा, ज़रा वो रिकॉर्डिंग सुनाना।"
सुमित्रा देवी ने अपने पल्लू से मनीष का पुराना मोबाइल निकाला, जो उन्होंने कल रात स्टोर रूम में मिले पुराने बक्से से ढूँढ निकाला था और संयोग से वह चालू हालत में था जिसे उन्होंने चार्ज कर लिया था और पूरी रात की बातचीत और लावण्या की सुबह की धमकी रिकॉर्ड कर ली थी।
मोबाइल पर लावण्या की आवाज़ गूँजी: "सुनिए बुड्ढे... अगर कोई ड्रामा किया, तो कसम है मुझे, कल से खाना तो दूर, पानी भी नसीब नहीं होगा..."
हॉल में सन्नाटा छा गया। मेयर और बिल्डर्स हक्के-बक्के रह गए। मनीष शर्म से ज़मीन में गड़ गया। लावण्या का चेहरा डर से सफेद पड़ गया था।
जगन्नाथ बाबू ने मेयर की ओर देखा और कहा, "साहब, जिस बेटे को मैंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वो कल रात चैन की नींद सोता रहा जब उसके माँ-बाप ठंड में ठिठुर रहे थे। मैं एक पूर्व ज़िलाधिकारी हूँ, कानून जानता हूँ। सीनियर सिटिजन एक्ट के तहत मैं अभी पुलिस बुला सकता हूँ और इन्हें जेल भिजवा सकता हूँ।"
मनीष रोते हुए पैरों में गिर पड़ा, "पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं डर गया था, मैं..."
जगन्नाथ बाबू ने अपना पैर पीछे खींच लिया।
"डर? डर हमें लगना चाहिए था मनीष, कि हमने कैसी औलाद पाली। लेकिन अब और नहीं।"
उन्होंने जेब से निकाला हुआ लिफाफा मेज़ पर रखा।
"यह मेरी वसीयत है, जिसे मैंने आज सुबह ही अपने वकील को बुलाकर बदल दिया है, जब तुम लोग सजावट में व्यस्त थे। मेरा यह घर, मेरी पुश्तैनी ज़मीन और मेरी सारी जमा पूंजी, मैं 'आसरा अनाथालय' और 'वृद्धाश्रम ट्रस्ट' के नाम करता हूँ।"
"क्या?" लावण्या चीखी। "आप ऐसा नहीं कर सकते! यह हमारा हक़ है!"
"हक़ कमाया जाता है बहू, छीना नहीं जाता," सुमित्रा देवी पहली बार बोलीं। "तुमने हमें घर से निकालने की धमकी दी थी न? अब यह घर ट्रस्ट का है। ट्रस्ट के नियमों के मुताबिक, हम यहाँ अपने जीवन के अंतिम दिनों तक सम्मान से रहेंगे। और तुम दोनों..."
जगन्नाथ बाबू ने दरवाज़े की ओर इशारा किया। "तुम्हें यहाँ रहने के लिए अब किराया देना होगा, या फिर तुम अपना इंतज़ाम कहीं और कर सकते हो। मुझे मेरे घर में शांति चाहिए, ज़हर नहीं।"
मेयर साहब ने खड़े होकर ताली बजाई। "जगन्नाथ जी, आपने आज फिर साबित कर दिया कि आप असली 'कलेक्टर' हैं। कचरे को घर से कैसे साफ़ किया जाता है, यह आपसे सीखना चाहिए।"
लावण्या सोफे पर धम्म से बैठ गई। उसका सारा गुरूर, सारी योजनाएँ ताश के पत्तों की तरह बिखर गई थीं। मनीष कोने में खड़ा आँसू बहा रहा था, लेकिन अब उन आँसुओं का कोई मोल नहीं था।
जगन्नाथ बाबू ने सुमित्रा देवी का हाथ थाम लिया।
"चलो सुमित्रा, बहुत थकान हो गई। अब अपनी मर्जी की चाय पियेंगे, अपने घर में।"
दोनों सिर ऊंचा करके अपने कमरे की ओर बढ़ गए, और पीछे छोड़ गए एक ऐसा सन्नाटा जो उस घर की दीवारों में हमेशा के लिए गूँजने वाला था। उस दिन बारिश रुक गई थी और बादलों के बीच से एक सुनहरी धूप निकल आई थी, बिल्कुल वैसी ही धूप जैसी अब जगन्नाथ और सुमित्रा के जीवन में खिली थी—सम्मान और आज़ादी की धूप।
लेखिका : महिमा मिश्रा
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