एक पुरानी हवेली के निचले हिस्से में ‘रहीम चाचा का जरदोजी कारखाना’ चलता था। यहाँ दिन भर लगभग बीस महिलाएँ और कुछ पुरुष कारीगर रेशमी कपड़ों पर सुनहरे और चांदी के तारों से कढ़ाई का बारीक काम करते थे। इन सबके बीच एक चेहरा था—मीरा का।
मीरा की उम्र यही कोई पच्चीस-छब्बीस रही होगी। आँखों में एक अजीब सी खामोशी और हाथों में गज़ब की रफ़्तार। वह ‘आरी’ (कढ़ाई करने वाली सुई) चलाने में माहिर थी। उसके द्वारा काढ़े गए लहंगे और शेरवानियाँ बड़े-बड़े शोरूम में लाखों में बिकते थे। लेकिन मीरा की दुनिया उस कारखाने की चार दीवारों और उसके बाद अपने छोटे से कमरे तक ही सीमित थी। पति की मौत के बाद बूढ़ी सास और पांच साल की बेटी गुड़िया की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी।
कारखाने का मुंशी था—गजेन्द्र। गजेन्द्र, मालिक रहीम चाचा का दूर का रिश्तेदार था और सारा हिसाब-किताब वही देखता था। रहीम चाचा अब बूढ़े हो चले थे और ज़्यादातर घर पर ही रहते थे, इसलिए कारखाने पर गजेन्द्र का एकछत्र राज था। गजेन्द्र की उम्र चालीस के पार थी, पान चबाता हुआ मुंह और लिजलिजी सी मुस्कान। उसकी नज़रें कारखाने की लड़कियों पर अक्सर रेंगती रहती थीं, लेकिन मीरा पर उसकी नज़र कुछ ज़्यादा ही गड़ी हुई थी।
पिछले दो महीनों से मीरा के लिए वह कारखाना, जो उसकी रोजी-रोटी का जरिया था, एक पिंजरे जैसा बन गया था। गजेन्द्र उसे काम के बहाने रोकता। कभी कहता कि “धागा कम पड़ गया है, गोदाम से ले आ,” और फिर खुद भी पीछे-पीछे चला जाता। कभी उसका हिसाब करने में जानबूझकर देर करता ताकि बाकी कारीगर चले जाएं और मीरा अकेली रह जाए।
मीरा सब समझती थी। उसकी रूह कांप जाती थी जब गजेन्द्र उसके पास से गुजरता और जानबूझकर उसे छूने की कोशिश करता। उसने कई बार सोचा कि काम छोड़ दे, लेकिन घर का किराया, सास की दवाइयां और गुड़िया की स्कूल फीस—ये सब उसे बेबस बना देते थे। उसने दबी ज़ुबान में विरोध भी किया था, “मुंशी जी, आप दूर रहकर बात किया करें,” लेकिन गजेन्द्र हंसकर टाल देता, “अरे मीरा, हम तो काम की बात कर रहे हैं, तू बुरा मान जाती है।”
उसकी यह ढिठाई दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। मीरा घर आकर अक्सर रोती, लेकिन अपनी सास से कुछ कह नहीं पाती थी। उसे डर था कि कहीं सास की तबीयत और न बिगड़ जाए।
एक शाम, जब मीरा घर लौटी, तो उसने देखा कि उसकी बेटी गुड़िया घर के बाहर खेल रही थी। गली का एक आवारा कुत्ता गुड़िया की तरफ भौंकते हुए लपका। गुड़िया डरी नहीं। उसने पास पड़ा एक नुकीला पत्थर उठाया और पूरी ताकत से कुत्ते के सामने तान दिया। कुत्ता, जो शायद गुड़िया को डरा हुआ समझ रहा था, उसके इस आक्रामक तेवर को देखकर ठिठक गया और दुम दबाकर भाग गया।
मीरा ने दौड़कर गुड़िया को गले लगा लिया। “तुझे डर नहीं लगा बेटा?” उसने पूछा।
गुड़िया ने अपनी तोतली ज़ुबान में कहा, “माँ, पापा कहते थे, अगर हम डरेंगे तो कुत्ता और डराएगा। अगर हम पत्थर उठा लेंगे, तो वो भाग जाएगा। जो डराता है, वो खुद बहुत डरपोक होता है।”
पाँच साल की बच्ची की इस बात ने मीरा के अंदर जैसे बिजली सी दौड़ा दी। वह पूरी रात सोचती रही। वह एक इंसान होकर भी उस जानवर से डर रही थी जो उसे नोचने की फिराक में था? वह गजेन्द्र के आगे गिड़गिड़ा रही थी, अपनी नज़रें झुका रही थी, जबकि गलती गजेन्द्र की थी। गुड़िया ने सही कहा था—अत्याचारी की ताकत हमारी खामोशी में ही छिपी होती है।
अगली सुबह मीरा कारखाने के लिए निकली। आज उसके बैग में हमेशा की तरह उसका टिफिन और पानी की बोतल थी, लेकिन उसके मन में एक अलग ही संकल्प था। कारखाने में पहुँचकर उसने अपनी जगह ली और ‘आरी’ को कपड़े पर चलाना शुरू किया। वह आरी, जो आगे से बेहद नुकीली और मुड़ी हुई होती थी, जिससे वह तारों को कपड़े के आर-पार करती थी। आज मीरा को वह आरी सिर्फ एक औज़ार नहीं, बल्कि एक हथियार लग रही थी।
दिन बीतता गया। शाम को गजेन्द्र ने ऐलान किया, “आज एक बहुत ज़रूरी ऑर्डर पूरा करना है। लखनऊ से जो शेरवानी का कपड़ा आया है, उसे आज रात तक हर हाल में खत्म करना होगा। सबको रुकना पड़ेगा।”
कारीगरों में सुगबुगाहट हुई, लेकिन मुंशी का हुक्म था। रात के आठ बजते-बजते काम खत्म हुआ। बाकी कारीगर जाने लगे। मीरा ने भी अपना सामान समेटा।
“मीरा, तुम रुको,” गजेन्द्र की आवाज़ आई। “तुम्हारे पिछले महीने के ओवरटाइम का हिसाब करना है। और वो जो लाल वाला दुपट्टा है, उसमें कुछ टांके ढीले रह गए हैं, उसे ठीक करके ही जाना।”
बाकी औरतों ने मीरा की तरफ सहानुभूति भरी नज़रों से देखा, लेकिन किसी ने कुछ कहा नहीं। गजेन्द्र का खौफ और नौकरी जाने का डर सबके होंठ सिल देता था। सलमा आपा, जो मीरा के बगल में बैठती थीं, धीरे से बोलीं, “जल्दी आ जाना मीरा, हम नीचे नुक्कड़ पर रिक्शे का इंतज़ार कर रहे हैं।”
हॉल खाली हो गया। सिर्फ एक पुराने पंखे की चरमराहट और बाहर सड़क के शोर की हल्की आवाज़ आ रही थी। गजेन्द्र ने मुख्य दरवाज़े की कुंडी लगा दी। मीरा की धड़कनें तेज़ हो गईं, लेकिन आज उसके हाथ नहीं कांपे। वह अपनी जगह पर बैठी रही, हाथ में अपनी सबसे मज़बूत और पैनी आरी थामे हुए।
गजेन्द्र अपनी गद्दी से उठा और धीरे-धीरे मीरा की तरफ बढ़ा। उसके चेहरे पर वही घिनौनी मुस्कान थी।
“क्यों मीरा रानी, आज तो कोई नहीं है। अब तो बता दो, कब तक ऐसे तड़पाओगी?” गजेन्द्र ने पास आकर मीरा की कुर्सी के हत्थे पर हाथ रखा।
मीरा ने सिर नहीं उठाया। वह कपड़े पर टांके लगाती रही।
“मुंशी जी, हिसाब कर दीजिए, मुझे देर हो रही है,” मीरा की आवाज़ सपाट थी।
“अरे हिसाब की क्या जल्दी है? पूरी रात पड़ी है,” गजेन्द्र ने मीरा के कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की।
मीरा ने झटके से अपना कंधा हटाया और खड़ी हो गई। “हाथ मत लगाना।”
गजेन्द्र हंसा। एक क्रूर हंसी। “अरे वाह! बिल्ली को गुस्सा भी आता है? देख मीरा, यहाँ तेरी चीख सुनने वाला कोई नहीं है। रहीम चाचा बीमार हैं, आएंगे नहीं। और बाहर का शोर इतना है कि तेरी आवाज़ दब जाएगी। प्यार से मान जा, तेरी तनख्वाह दोगुनी कर दूंगा। तेरी सास का इलाज अच्छे अस्पताल में करा दूंगा।”
बोलते-बोलते गजेन्द्र ने अचानक मीरा की कलाई पकड़ ली और उसे अपनी तरफ खींचा। मीरा का शरीर दीवार से जा टकराया। गजेन्द्र उसके बिल्कुल करीब आ गया था। उसके मुंह की बदबू मीरा की सांसों में घुल रही थी।
“छोड़ो मुझे!” मीरा चिल्लाई।
“नहीं छोड़ूंगा। आज तो तुझे मेरी बात माननी ही होगी,” गजेन्द्र ने उसे दबोचने की कोशिश की।
तभी मीरा को गुड़िया की बात याद आई—‘जो डराता है, वो खुद डरपोक होता है।’
मीरा ने अपनी मुट्ठी में भींची हुई उस लोहे की आरी को कसकर पकड़ा। यह वही आरी थी जिससे वह बेजान कपड़ों में खूबसूरती भरती थी, लेकिन आज यह उसकी अस्मिता की रक्षा करने वाली थी।
जैसे ही गजेन्द्र का हाथ मीरा के दुपट्टे की तरफ बढ़ा, मीरा ने पूरी ताकत से अपने दाहिने हाथ को हवा में लहराया।
“खच!”
एक तेज़ आवाज़ हुई।
मीरा ने आरी सीधे गजेन्द्र के उस हाथ पर दे मारी थी जो उसकी तरफ बढ़ रहा था। आरी की नुकीली नोक गजेन्द्र की हथेली को चीरती हुई आर-पार हो गई।
कारखाने में एक दिल दहला देने वाली चीख गूंजी। “आह्ह्ह्ह्ह...!”
गजेन्द्र पीछे लड़खड़ाया। उसका हाथ खून से सन गया था। वह दर्द से बिलबिला रहा था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस मीरा को वह अबला और लाचार समझता था, उसने उस पर वार किया है।
लेकिन मीरा यहीं नहीं रुकी। उसकी आँखों में अब आंसू नहीं थे, बल्कि दुर्गा जैसा तेज था। उसने पास रखी कैंची उठा ली।
“खबरदार जो अब एक कदम भी आगे बढ़ाया!” मीरा की आवाज़ में इतनी सख्ती थी कि गजेन्द्र का दर्द डर में बदल गया। वह ज़मीन पर गिर पड़ा, अपना लहुलुहान हाथ पकड़े हुए।
“तुम... तुमने मुझे मारा? मैं तुझे जान से मार दूंगा!” गजेन्द्र दर्द से कराहते हुए फुफकारा।
“मार डालना बाद में,” मीरा उसके करीब गई, हाथ में कैंची तानकर। “लेकिन आज अगर तूने उठने की कोशिश भी की, तो यह कैंची तेरे गले के आर-पार होगी। तू सोचता है हम औरतें सिर्फ सुई-धागा चलाना जानती हैं? यह सुई जब कपड़े में जाती है तो फूल बनाती है, और जब दुष्ट के शरीर में जाती है तो उसकी औकात याद दिला देती है।”
मीरा ने ज़मीन पर थूका और दरवाज़े की तरफ बढ़ी। गजेन्द्र इतना डर गया था कि वह अपनी जगह से हिल भी नहीं पाया। वह सिर्फ अपनी कटी हुई हथेली को देख रहा था जिससे लगातार खून बह रहा था।
मीरा ने दरवाज़ा खोला। बाहर सलमा आपा और दो-तीन अन्य कारीगर खड़े थे। उन्हें गजेन्द्र की चीख सुनाई दे गई थी और वे भागकर ऊपर आए थे। उन्होंने देखा कि मीरा बाहर आ रही है, उसके बाल थोड़े बिखरे हैं, सांसें तेज़ चल रही हैं, और हाथ में खून से सनी आरी और कैंची है।
अंदर गजेन्द्र ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था। नज़ारा देखकर सबको माजरा समझ में आ गया। किसी को कुछ पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
सलमा आपा ने आगे बढ़कर मीरा को गले लगा लिया। “तू ठीक है ना?”
“हाँ आपा, मैं ठीक हूँ। आज बिल्कुल ठीक हूँ,” मीरा ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
पुलिस बुलाई गई। गजेन्द्र को अस्पताल ले जाया गया और वहां से सीधे हवालात। गजेन्द्र ने कोशिश की कि वह कहानी पलट दे, यह कहे कि मीरा ने उस पर हमला किया। लेकिन उसकी बदनीयती की गवाही देने के लिए अब सिर्फ मीरा अकेली नहीं थी। सलमा आपा और बाकी औरतों ने भी अपनी चुप्पी तोड़ दी। उन्होंने पुलिस को बताया कि कैसे गजेन्द्र महीनों से उन सबको परेशान कर रहा था। मीरा के वार ने उन सबकी जुबान खोल दी थी।
जांच अधिकारी ने जब गजेन्द्र के हाथ का घाव देखा, तो समझ गया कि यह वार किसी हमलावर का नहीं, बल्कि अपनी रक्षा कर रही एक औरत के आत्मसम्मान का था।
इस घटना के बाद पुरानी दिल्ली की उस गली में बहुत कुछ बदल गया। मीरा अब सिर्फ एक कारीगर नहीं थी। वह एक मिसाल बन गई थी।
कारखाना फिर से खुला। रहीम चाचा के बेटे ने अब काम संभाल लिया था और माहौल बदल चुका था। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव औरतों के रवैये में आया था।
अब जब भी लंच के समय औरतें बैठतीं, तो वे अपनी आरी और कैंचियों की धार तेज़ करती नज़र आतीं। वे अपनी बेटियों के बस्तों में सिर्फ किताबें नहीं रखती थीं, बल्कि उन्हें यह भी समझाती थीं कि जो कलम या पैमाना (scale) वे पढ़ाई के लिए इस्तेमाल कर रही हैं, ज़रूरत पड़ने पर वह उनकी रक्षा भी कर सकता है।
मीरा अब भी उसी एकाग्रता से कढ़ाई करती है। उसकी आरी अब भी उतनी ही तेज़ी से चलती है। लेकिन अब उसकी आँखों में वो खामोशी नहीं है। अब उसकी आँखों में एक चमक है—आत्मविश्वास की। वह अक्सर नई आने वाली लड़कियों से कहती है:
“यह जो तुम्हारे हाथ में औज़ार है न, यह सिर्फ रोज़ी-रोटी कमाने के लिए नहीं है। यह तुम्हारी ताकत है। जब तक तुम इसे हुनर समझोगी, दुनिया तुम्हारी कला की तारीफ करेगी। लेकिन जिस दिन कोई तुम्हारी इज़्ज़त पर हाथ डाले, तो याद रखना—यही औज़ार तुम्हारा हथियार है। कभी खुद को कमज़ोर मत समझना, क्योंकि लोहे की यह छोटी सी नोक, बड़ी से बड़ी चट्टान (अहंकार) को भी तोड़ सकती है।”
कारखाने की दीवार पर टंगी गजेन्द्र की पुरानी तस्वीर अब वहां नहीं थी। उसकी जगह एक छोटा सा पोस्टर लगा था, जिस पर एक आरी का चित्र था और नीचे लिखा था— ‘सम्मान से बड़ा कोई आभूषण नहीं, और साहस से बड़ा कोई हथियार नहीं।’
लेखिका : साइमा फ़ैज़
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