ये तुमने क्या क्या रख दिया विद्या की मां... बेटी के ससुराल भेज रही हो या बाजार में बेचने रामदीन अपनी पत्नी सुशीला से कहता है जो बेटी के ससुराल भेजने के लिए थोड़ा बहुत समान रख रही है।
बेटी के ससुराल खाली हाथ कैसे जाओगे विद्या के बापू,और फिर भगवान की दया से हमारे पास बहुत कुछ है भेजने के लिए। देखना कैसे खुश हो जाएंगे उसके ससुराल वाले ये सब देख कर। खेत के ताजे भुट्टे, ककड़ी, नरम नरम सब्जियां और थोड़ा ताजा घी बनाया था ओ रख दिया है तुम्हारी विद्या के घी बिना रोटियां गले से न उतरती होगी, और वंहा शहर में जाने कैसा नकली घी दूध मिले है अब कंहा खा पाती होगी।
सुनो जी अबके उसकी सास हां कहे तो तुरत लिवा लाना, साल भर होने को आया बेटी का मुंह नही देखा... कहते कहते सुशीला की आंख भर आयी
ओह नो! घी तो कितना हैवी होता है और ये भुट्टे ककड़ी ओ माई गॉड ये देहातियों वाला खाना कौन खायेगा ये सब अरे रमिया ऐसा कर ये सब तू अपने घर ले जा... जैसे ही विद्या ने अपनी सास केतकी जी के मुंह से ये सब सुना उसका खून खौल उठा, न कोई आवभगत न सत्कार उस पर मायके से आये समान को भी कोई महत्व नही। मन तो कर रहा था कि सारा सामान उठाकर अपनी अलमारी में सहेज ले, पर मरती क्या न करती गरीब पिता की बेटी बड़े घर की बहू जो बन गयी थी।
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