खून खौलना

  अरे कमली! तूने में मेरा सोने का हार देखा ,कल रात मैंने शादी से वापस आने के बाद टेबिल के ट्रॉवर में रखा था... कमली बोली - नहीं मैडम! मैं तो सुबह से रसोई में काम कर रही हूं बेटे शुभम् को स्कूल भेजने के बाद रुपाली ने पूरा घर छान मारा कहीं भी हार नहीं मिला... घर में रुपाली उसक़े पति और १६ साल का बेटा शुभम् थे ... अब शक की सुई घर के नौकरों पर गई । घर में कमली 3० साल पुरानी बाई थी वह ऐसा कदापि नहीं कर सकती थी... सभी को उस पर बहुत विश्वास था तभी याद आया सुबह  ड्रायवर रमेश शुभम् को स्कूल को छोड़ने के लिए घर में चाबी लेने आया था पिछले महीने ही उसे नौकरी पर रखा था।

  रमेश को बुलाया गया ... देखो रमेश! मेरा सोने का हार चोरी हो गया है इस घर में तुम्हारे अलावा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं आया है ... कमली इस घर  की  बहुत पुरानी वफादार बाई है उसके रहते 30 सालों में एक चम्मच भी नहीं खोई है... रमेश बोला -नहीं मेम साहब ! मैंने कोई हार नहीं देखा, मैं तो सुबह शुभम् बाबू को स्कूल छोड़ने गया था... देखों रमेश! सीधे तरह बता दो नहीं तो पुलिस को बुलाना पड़ेगा मैडम ने पुलिस को फोन करना चाह पर फोन व्यस्त था झूठे इल्जाम पर रमेश का खून खौला उठा... बुला लो पुलिस को कहकर रमेश जमीन पर बैठ गया।
  थोड़ी ही देर में फोन की घण्टी बज उठी.. रुपाली मैम! बोल रहीं हैं.. मैं अग्रवाल ज्वैलर से बोल रहा हूं। कुछ दिन पहले आपने हमारे यहां से जो हार खरीदा था वह हार बेचने कोई शुभम् नाम का लड़का आया है वह स्कूल की यूनीफोर्स में है ये देखो मैडम यह लड़का हैं हमें कुछ शक हुआ है इसलिए आपको फोन किया है रुपाली सन्न रह गई शुभम् ने यह हार चुराया है। स्पीकर पर बात हो रही थी , रमेश सब सुन रहा था। शुभम् ने दो दिन पहले रुपाली से पांचसितारा होटल में अपने दोस्तों के साथ अपनी बर्थडे पार्टी के लिए और रेसिंग मोटर बाइक के लिए पैसे मांगे थे। रुपाली ने कुछ दिनों बाद दिलाने की बात कही थी। शुभम् को यह रास्ता सही और जल्दी लगा।
      पहले झूठे आरोप पर रमेश का खून जल रहा था अब सच्चाई जानकर रमेश का खून खौल उठा बोला -मैडम ! हम गरीब जरूर हैं पर चोर नहीं ...हमारी गरीबी हमारी ईमानदारी और खुद्दारी को नहीं बेच सकती है। आप और आपके बच्चों की इच्छाएं असीमित होंगी परन्तु थोड़े में ईमानदारी से जीना हम गरीबों को अच्छे से आता है... अब ऐसे घर में मुझे काम करना स्वीकार नहीं जहां किसी गरीब ईमानदार पर इल्जाम लगाने से पहले माता पिता अपनी बिगड़ी संतान के आचरण को नहीं देखते... कहते हुए क्रोध से रमेश के दाँत भींच गए ,चेहरा तमतमा उठा,आँखे अंगार उगलने लगीं,  परन्तु अनुशासन और माता पिता से मिले सुसंस्कारों के कारण रमेश अप्रिय न बोला...

स्वरचित मौलिक रचना
सरोज माहेश्वरी पुणे ( महाराष्ट्र)


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ