जिस सुबोध की उत्तरोत्तर उन्नति को देखकर यशोधरा जी की छाती पर सांप लौट जाता था,उसी के आश्रय में उन्होंने अपने जीवन के बाईस साल व्यतीत किए,और वही उनके जीवन का एकमात्र सहारा था।आज जीवन की घड़ियाँ उनका साथ छोड़ रही थी,और मौत का साया उनकी और बढ़ रहा था, सारे डॉक्टर जवाब दे चुके थे। यशोधरा जी बार-बार सुबोध से मॉफी मांगने की कोशिश कर रही थी, मगर होठों से शब्द नहीं निकल रहै थे।
सुबोध ने कहा ' काकी किसी चीज की जरूरत है क्या? आप मुझसे कहै मैं लाकर देता हूँ।' यशोधरा जी का मन आत्मग्लानि से भरा हुआ था, उनकी ऑंखों में ऑंसू आ गए। कंठ अवरूद्ध हो गया। उन्होंने अपने दोनों हाथों से उसका हाथ पकड़ कर अपने सिर से लगाया और हिम्मत करके बोली,बेटा कुछ नहीं चाहिए अगर हो सके तो मुझे माफ कर दे।' 'आप ऐसा क्यों कह रही है काकी? आपने तो मुझे बहुत प्यार दिया है।' नहीं बेटा मैं तेरी दोषी हूँ, तू जब-जब सफलता की और कदम बढ़ाता, मुझे तुझसे बहुत ईर्ष्या होती थी, मेरी छाती पर सांप लौट जाता था। तेरी परीक्षा के समय मैं जानबूझकर बिजली का फ्यूज उड़ा देती थी। घड़ी का आलार्म बंद कर देती थी कि तेरा पेपर बिगड़ जाए, मैं केवल अमित, सुमित को उन्नति के शिखर पर चढ़ते देखना चाहती थी। मैंने उन्हें भी गलत शिक्षा दी कि वे तुम्हें परेशान करे और तुम्हारा पेपर बिगड़ जाए।मगर बेटा! मैं बहुत गलत थी।' सुबोध ने उन्हें रोकते हुए कहा 'आप ऐसी बातें क्यों कर रही है काकी ?मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है,अब तो मेरे माता -पिता भी मुझे छोड़कर चले गए। आप ही मेरी सबकुछ है।' नहीं बेटा आज मुझे कहने दे मेरे दिल पर बहुत बड़ा बोझ है, तुझे कहने से शायद कुछ कम हो जाए। तुम्हारे काका असमय मुझे छोड़कर चले गए।बेटा, मेरे जिन बच्चों के लिए मैंने हमेशा ईश्वर से प्रार्थना की वे अपना स्वार्थ सिद्ध करके मुझे छोड़कर चले गए। मगर इसमें उनका दोष नहीं है, उन्हें अच्छे संस्कार देने में, मैं ही चूक गई। धन्य है बेटा भाई साहब और भाभी जिन्होंने तुम्हें इतने अच्छे संस्कार दिए। बेटा सच्चे मन से मॉफी मांग रही हूँ, हो सके तो मुझे मॉफ कर देना। अब बस तू ही मेरा बेटा है, एक उपकार और करना मेरी चिता को अग्नि तू ही देना।' यशोधरा जी की ऑंखें खुली की खुली रह गई,उनकी ऑंखों में एक चमक आ गई थी। सुबोध की ऑंखों से अविरल ऑंसू बह रहै थे। वह काकी को रोकना चाह रहा था, मगर जाने वाले को कब, कौन रोक पाया है?
प्रेषक-
पुष्पा जोशी
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
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