"पढ़ाई अच्छी थी तेरी… पर अब तो बस घर संभालना है,"
शादी के बाद यही बात बार-बार सुनने को मिली।
माँ बनना एक सौभाग्य था — पर दो बच्चों की परवरिश में खुद को कहीं पीछे छोड़ देना पड़ा। हर सुबह घड़ी से पहले उठना, बच्चों की देखभाल, सबकी ज़रूरतें पूरी करना, घर संभालना — जैसे मेरी खुद की ज़रूरतें कभी थीं ही नहीं। दिन भर सबके लिए जीती रही… और खुद के लिए बस रात की थकान बचती थी।
धीरे-धीरे यह सब एक आदत बन गई। लेकिन फिर एक दिन, किसी शांत दोपहर में अचानक मन ने सवाल किया —
"अब मैं कौन हूँ?"
"मैं क्या चाहती हूँ?"
शायद जवाब आसान नहीं था, लेकिन सवाल सच्चा था।
किसी ने कहा, "कुछ नया सीखो, कुछ अपने लिए करो!"
मैंने किताब उठाई, पढ़ना चाहा — पर शब्द जैसे धुंधले हो गए। याददाश्त धोखा दे रही थी। डॉक्टर ने कहा, “थोड़ी मेमोरी कमजोर हो गई है।”
लेकिन जो असली तकलीफ़ थी, वो दिल और आत्मा की थी —
लोगों की नज़रों और लहजों में अक्सर अंगारे उगलते ताने थे।
जैसे हर कमज़ोरी पर उन्हें एक तंज़ मारना हो।
आईने में जो चेहरा दिखता, वो कभी मेरी अपनी पहचान थी — अब किसी और की तरह लगता था। वो हँसती-खेलती, सपने देखने वाली लड़की कहीं खो गई थी।
पर शायद… वो पूरी तरह खोई नहीं थी।
मुझे हमेशा से तस्वीरें लेना, लम्हों को सहेजना और कभी-कभी कैमरे के सामने वो पल जीना अच्छा लगता था। उसी शौक़ को फिर से थामने की कोशिश की —
कभी कुछ लिखा, कभी कुछ रिकॉर्ड किया…
बस छोटी-छोटी कोशिशें, खुद से फिर मिलने की।
अब ठान लिया है —
ना तोड़ूंगी खुद को और ना छोड़ूंगी।
अब चाहे धीरे चलूँ, पर चलूँगी ज़रूर — खुद की तरफ़।
जो ज़िंदगी अब तक सबके लिए जी,
अब थोड़ी सी — अपनी भी होगी।
0 टिप्पणियाँ