"कीमत साड़ी की नहीं, मुस्कान की"

 दुकानदार ने काउंटर पर दो साड़ियां फैलाईं। एक गहरे लाल रंग की बनारसी साड़ी थी, जिसकी जरी का काम आंखों को चकाचौंध कर रहा था, और दूसरी हल्के गुलाबी रंग की शिफॉन की साड़ी थी, जो सुंदर तो थी लेकिन बनारसी के आगे फीकी लग रही थी।

"मैडम, यह लाल वाली पंद्रह हजार की है और यह गुलाबी वाली पांच हजार की। आप देख लीजिये," दुकानदार ने कहा।

सुमन ने दोनों साड़ियों को हाथ लगाकर देखा। फिर उसने अपनी ननद, कोमल की तरफ देखा, जो उस लाल साड़ी को ललचाई नज़रों से देख रही थी। कोमल की अगले महीने शादी थी और आज शगुन की साड़ी खरीदी जा रही थी।

सुमन ने धीरे से अपने पति, राजेश के कान में फुसफुसाया, "राजेश, कोमल की शादी का बजट पहले ही ऊपर जा रहा है। पंद्रह हजार की साड़ी सिर्फ एक दिन के लिए पहनना समझदारी नहीं है। यह गुलाबी वाली भी तो अच्छी है, और हल्की भी रहेगी। पांच हजार में काम हो जाएगा, बाकी पैसे कैटरिंग में काम आ जाएंगे।"

राजेश थोड़ा हिचकिचाया। वह अपनी इकलौती बहन की खुशी कम नहीं करना चाहता था, लेकिन सुमन की बात भी व्यावहारिक (Practical) थी। घर की आर्थिक स्थिति थोड़ी तंग थी।

सुमन ने तुरंत फैसला लेते हुए दुकानदार से कहा, "भैया, यह गुलाबी वाली पैक कर दीजिये। लाल वाली बजट के बाहर है।"

कोमल के चेहरे की चमक बुझ गई। उसने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुका लिया। वह जानती थी कि भैया-भाभी उसके लिए बहुत कुछ कर रहे हैं, इसलिए जिद करना उसे ठीक नहीं लगा।

पीछे बैठीं घर की बुजुर्ग, सुमित्रा जी (सुमन की सास), सब चुपचाप देख रही थीं। उन्होंने अपनी चश्मे के पीछे से सुमन के हाव-भाव पढ़े।

घर लौटने पर माहौल थोड़ा शांत था। कोमल अपने कमरे में चली गई। सुमन रसोई में शाम की चाय बनाने लगी। तभी सुमित्रा जी रसोई में आईं। उनके हाथ में एक पुरानी, मखमली डिब्बी थी।

"सुमन, बेटा, जरा गैस धीमी करना। मुझे तुमसे कुछ बात करनी है," सुमित्रा जी ने गंभीर स्वर में कहा।

सुमन ने गैस कम की और पल्लू से हाथ पोंछते हुए मुड़ी। "जी मां जी, कहिये?"

सुमित्रा जी ने वह डिब्बी सुमन के हाथों में रख दी। "इसे खोलकर देख।"

सुमन ने डिब्बी खोली। अंदर सोने के दो भारी कंगन रखे थे। सुमन की आंखें फटी रह गईं। ये वही कंगन थे जो सुमन ने अपनी मुंह दिखाई की रस्म में सास से मांगे थे, लेकिन तब सुमित्रा जी ने कहा था कि अभी नहीं बनवा सकते। और आज, शादी के दस साल बाद ये कंगन उसके हाथ में थे।

"मां जी, ये तो..." सुमन हकलाने लगी।

"हां बेटा," सुमित्रा जी ने कहा। "तुम्हें याद है जब तुम नई-नई ब्याह कर आई थीं? तुमने अपनी ननद (मेरी बेटी) की शादी में पहनने के लिए भारी कंगन की जिद की थी। तब राजेश की नौकरी नई थी। हमारे पास इतने पैसे नहीं थे। मैंने तुम्हें मना कर दिया था, और तुम बहुत रोई थीं। तुम्हें लगा था कि सास कंजूस है।"

सुमन ने नज़रें झुका लीं। उसे वो दिन याद था।

सुमित्रा जी ने आगे कहा, "लेकिन तुम्हें यह नहीं पता कि उसी शाम मैंने अपनी मां की दी हुई आखिरी निशानी, अपनी सोने की चेन बेच दी थी और कुछ पैसे उधार लेकर ये कंगन तुम्हारे लिए बनवाए थे। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी बहू का मन छोटा हो। मैंने तब 'बजट' नहीं देखा था सुमन, मैंने तुम्हारी 'खुशी' देखी थी। क्योंकि पैसा तो फिर कमाया जा सकता है, लेकिन अगर घर की लक्ष्मी का दिल टूट जाए, तो घर में बरकत नहीं रहती।"

सुमन सन्न रह गई। उसे आज पता चला कि उन कंगनों की कीमत सुमित्रा जी के स्त्रीधन की कुर्बानी थी।

सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली और कोमल के कमरे की तरफ देखा। "आज जब तुम दुकान पर कोमल के अरमानों का सौदा कर रही थी, तो मुझे अपना वो वक्त याद आ गया। फर्क बस इतना है बेटा कि तब मैं 'मां' बनकर सोच रही थी, और आज तुम 'हिसाब-किताब' करने वाली मैनेजर बनकर सोच रही थी। कोमल ने एक बार भी नहीं कहा कि उसे वो लाल साड़ी चाहिए, क्योंकि वो तुम्हारा मान रख रही थी। पर क्या तुम उसका मान रख पाईं? पंद्रह हजार और पांच हजार के बीच सिर्फ दस हजार का फर्क नहीं था, उसमें कोमल के जीवन भर की यादों का फर्क था। कल वो अपने ससुराल में कहेगी कि यह साड़ी मेरी भाभी ने दी है, तो उसकी आंखों में चमक होनी चाहिए, समझौता नहीं।"

सुमन के हाथ से वो कंगन वाली डिब्बी छूटकर स्लैब पर गिर गई। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह पैसों के गणित में इतनी उलझ गई थी कि भावनाओं का गणित भूल गई। उसे याद आया कि जब उसकी शादी हुई थी, तो उसके मायके वालों ने भी हैसियत से बढ़कर उसे विदा किया था, ताकि उसकी ससुराल में इज्जत बनी रहे। और आज वो अपनी ही ननद के लिए कंजूसी कर रही थी?

सुमन की आंखें भर आईं। उसे अपने अंदर का वो छोटापन साफ दिखाई देने लगा। वह सुमित्रा जी के कदमों में बैठ गई और उनके घुटनों पर सिर रख दिया।

सुमन की आंखें नम हो गई थीं। भर्राई आवाज में वो बोली, "आप ठीक बोल रही हो मां जी, बड़े होने के साथ साथ ये दिल ना जाने कब इतना छोटा हो गया। आगे से मैं कभी ऐसी गलती नहीं करूंगी।"

सुमित्रा जी ने मुस्कुराकर बहू के सिर पर हाथ फेरा। "गलती सुधारने का मौका अभी गया नहीं है बेटा। अभी तो शाम है, दुकान खुली होगी।"

सुमन ने आंसू पोंछे और तुरंत खड़ी हो गई। "राजेश! गाड़ी निकालो, हमें अभी बाजार जाना है।"

राजेश हैरान था, "अभी? क्यों?"

"कोमल की वो लाल बनारसी साड़ी लाने," सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा। "मेरी ननद उस गुलाबी साड़ी में नहीं, उस लाल जोड़े में ही सजेगी। पैसे कम पड़ेंगे तो मैं अपने ये कंगन गिरवी रख दूंगी, पर उसकी खुशी फीकी नहीं पड़ने दूंगी।"

उस रात, जब कोमल के हाथ में वो लाल साड़ी आई, तो उसने रोते हुए भाभी को गले लगा लिया। उस गले मिलने में जो सुकून था, वो उन दस हजार रुपयों से कहीं ज्यादा कीमती था। सुमन समझ गई थी कि घर बजट से नहीं, बड़प्पन से चलता है।



हूक लाइन:

"दुकान पर भाभी ने ननद के अरमानों का सौदा चंद रुपयों के लिए कर दिया, लेकिन घर आकर सास ने जब अपनी पुरानी तिजोरी का राज खोला, तो बहू को समझ आया कि रिश्तों में 'बजट' नहीं, 'दिल' देखा जाता है।"


कहानी का सार:

अक्सर हम गृहस्थी चलाने और पैसे बचाने के चक्कर में इतने व्यावहारिक हो जाते हैं कि अपनों की छोटी-छोटी खुशियों का गला घोंट देते हैं। याद रखिये, पैसे तो आज नहीं तो कल आ जाएंगे, लेकिन शादी-ब्याह और त्यौहारों के ये मौके दोबारा लौटकर नहीं आते। रिश्तों में गणित नहीं, गुंजाइश रखिये।

सवाल आपके लिए:

क्या आपने भी कभी पैसों की वजह से अपनी कोई इच्छा मारी है? या कभी किसी अपने की खुशी के लिए अपना बजट बिगाड़ा है? अपने खट्टे-मीठे अनुभव कमेंट में जरूर बताएं।

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