आपकी परछाई हुं और रहुंगी

 एक दिन सुमना के पापा की मुलाकात उन के दोस्त की पत्नी और बेटे से हो गई.अपने मास्टर दोस्त के हार्ट अटैक से गुजर जाने का उन्हें पता चला. उन्हें बहुत दुख हुआ. पर यह जान कर खुशी हुई कि अपने पापा की जगह पर उन के इकलौते बेटे अनिल को नौकरी मिल गई. अब वह इसी शहर में नौकरी कर रहा है अनिल ने पैर छू कर उन का आशीर्वाद लिया और उन्हें उस में अपना भावी दामाद नजर आया. इसीलिए उन्होंने मां बेटे को अपने घर आमंत्रित किया. सुमना की मां को भी अनिल पसंद आया और अनिल तथा उस की मां को सुमना एक नजर में भा गई. लेकिन खुबसुरत सुमना को अनिल फूटी आंख भी पसंद नहीं आया. अनिल थोड़े नाटे कद का और सांवला. ऊपर से उस के सिर के बीच के बाल उड़ गए थे और चांद दिख रहा था.  उस ने मां से कह सीधे सीधे शादी से इनकार कर दिया. मगर उस के पापा आपे से बाहर हो गए, ‘‘मैं ने तुम्हारी बहनों को जिस खूंटे से बांधा वे बंध गईं और तुम अपनी पसंद के लड़के  से प्रेम ब्याह रचाओगी. यह मेरे जीतेजी नहीं हो सकता. तुम्हारा दोस्त बाप की दौलत पर मौज करता है. कल को उस का बाप उसे घर से निकाल देगा, तो वह कटोरा ले कर भीख मांगेगा. सुंदर चेहरे का क्या अचार डालना है...अनिल मेरा देखा सुना, अच्छा लड़का है. सरकारी नौकरी है..

उस का.... घरद्वार सब है.

ऊपर से इकलौता है अब क्या चाहिए... इस घर का दामाद अनिल बनेगा, नहीं तो तुम मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी.’’ मां बहनों ने सुमना को खूब समझाया और उस की शादी अनिल से हो गई.

अनिल सुमना को जी जान से चाहता था, पर वह मन ही मन उस पर खफा रहती. उस के साथ रास्ते में चलते हुए उसे बड़ी शर्म आती. ‘हूर के साथ लंगूर’ कहकह सहेलियों ने उस की खूब खिल्ली उड़ाई. वह मन ही मन अनिल को ‘चंडूल’ कहती

अनिल अपना नया नामकरण जान कर भी उस पर जान छिड़कता रहा. वह सुमना को आगे पढ़ाना चाहता था. जहां पढाता था  पास मे कालेज भी था. उस ने उस का बी.ए. में ऐडमिशन करा दिया. वह पढ़ने में कमजोर थी, अत: उस की पढ़ाई में भरपूर मदद करता. सुमना के न चाहते हुए भी उस के पैर भारी हो गए. सास ने खूब धूमधाम से उस की गोदभराई करवाई. पर कुदरत से उन की ये खुशियां देखी नहीं गईं. एक रात 8-9 बजे अनिल ट्यूशन पढ़ा कर बाइक से घर लौट रहा था कि अचानक बाइक की हैडलाइट खराब हो गई और अंधेरे में वह बिजली के एक खंभे से टकरा कर गिर गया. तभी तेज रफ्तार से सामने से आ रही जीप उस के दोनों पैरों पर चढ़ गई. उस के दोनों पैर कुचल गए और जीप वाला भाग खड़ा हुआ....

डाक्टर ने अनिल के दोनों पैर घुटने तक काट दिए. मां और सुमना पर तो दुखों का पहाड़ टूट गया. मां को जबरदस्त सदमा तो इस बात का लगा कि अब उन का बेटा अपने पैरों पर नहीं चल पाएगा. वह तो अपाहिज हो गया. अब दूसरे के रहमो करम का मोहताज रहेगा. इसी सदमे के कारण वे खुद ही दुनिया छोड़ गईं. सुमना पर यह दूसरा पहाड़ टूटा.  अब उस की स्थिति देख उस का कठोर हृदय मोम की तरह पिघलता जा रहा था. अनिल को टूट कर बिखरते देख वह उस की शक्ति बन ढाल बनी हुई थी. पहली बार उस ने अनिल का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘जो हो गया उसे तो हम नहीं बदल सकते. अब आगे जो जिंदगी बची है उसे तो हम हंस कर जीएं. आप बच्चों को हिम्मत से लड़ने की बात सिखाते रहे हैं और आज खुद हिम्मत छोड़ कर बैठे हैं. आप कल से स्कूल पढ़ाने जाइए और मैं कालेज पढ़ने जाया करूंगी. हमें अपने आने वाले बच्चे को एक बेहतर समाज और एक सुनहरा भविष्य देना है. इस तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा.’’ अनिल नम आंखों से सुमना को देखे जा रहा था कि उसे नापसंद करने वाली आज उसे अपनी मां की तरह समझा रही है. ‘‘आप अगर मेरी बात नहीं मानेंगे तो फिर मैं आप को चंडूल महाराज बोलूंगी,’’ सुमना ने हंस कर कहा ताकि अनिल को हंसी आ जाए. वह ठठा कर हंस दिया. फिर बोला, ‘‘मैं सोच रहा था कि इतने दिनों से कोई मुझे मेरे प्यारे नाम से बुलाता क्यों नही... हां,  आपकी यह बात ठीक है. मैं एक नौकर रख लेता हूं. वह मुझे स्कूल ले जाएगा, लाएगा और तुम कालेज जाना. अरे हां, तुम पढ़ने के फेर में मेरे आने वाले बच्चे की देखभाल मत भूल जाना. वैसे अभी बच्चे के जन्म में तो समय है ना. हांजी कहकर शर्मा गई।

दूसरे दिन  फिर पापा का फोन आ गया. वह दूसरे कमरे में जा कर उन से बातें करने लगी. इस बार फोन पर मां भी थीं. वे भी सुमना को सब छोड़ छाड़ कर अपने पास बुला रही थीं.... पापा ने एकदम खुल कर कहा, ‘‘एक अपाहिज के साथ तुम इतनी बड़ी जिंदगी कैसे काटोगी....

वह तुम्हें कोई सुख नहीं दे सकता, तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता...

तुम अपने दोस्त से शादी कर लो. मैं ने एक डाक्टर से अबौर्शन करवाने की बात कर ली है. वह तैयार…’’

सुमना को लगा कि उस के कान में पिता की आवाज नहीं गरम गरम सीसा जा रहा है.... अबौर्शन की बात पर उस का पूरा वजूद हिल गया. उस की ममता जाग उठी. अपने अजन्मे बच्चे की गरदन पर अपने पिता के खूनी हाथ की कल्पना कर उस का सर्वांग कांप उठा. उस का वात्सल्य प्रेम खौलते हुए खून के साथ चिंघाड़ उठा, मैं आपके हाथों की कठपुतली नही  हूं... मेरा कोई अस्तित्व नहीं है.. मुझ पर कब तक बस आपकी ही चलती रहेगी...मेरे पास क्या दिलदिमाग नहीं है... ‘‘वाह ...पापा वाह.... आप जैसा पिता तो मैने देखा ही नहीं. जब मैं दोस्त को चाहती थी तो आप ने जबरदस्ती अनिल से मेरी शादी करवाई और आज जब वे अपाहिज हो गए हैं तो उन्हें छोड़ने के लिए रोज रोज मुझ पर दबाव डाल रहे हैं... आप जैसा स्वार्थी और मौकापरस्त इंसान मैं पहली बार देख रही हूं. दोस्त से मेरी शादी होते ही अगर उस का भी ऐक्सीडैंट हो गया या वह मर गया, तो आप मेरी तीसरी शादी करवाएंगे...

जिस बच्चे के आने की खुशी में मैं और अनिल जी रहे हैं उसे आप खत्म करवाने की सोच बैठे. आप ने मेरे मासूम बच्चे की हत्या करवाने की बात कैसे कह दी...’ सुमना अपने अजन्मे बच्चे की याद में रो पड़ी. उस के पापा ने उस की सिसकी सुनी तो उन के मुंह पर ताला लग गया.

वह आगे बोली, ‘‘आप ने जिस उम्मीद के बलबूते पर मेरी शादी अनिल से करवाई है, मैं उसी उम्मीद पर खरी उतरना चाहती हूं. अगर मेरी जिंदगी में संघर्ष है, तो मुझे यह संघर्ष और अनिल के साथ जीवन जीना पसंद है. मैं उन्हें कभी नहीं छोड़ूंगी. मेरे सिवा उन का अब है ही कौन....

आगे से इस विषय पर आप मुझ से कभी बात नहीं करेंगे,’’ कह कर सुमना ने मोबाइल का स्विच औफ कर दिया.

तभी अचानक धड़ाम की आवाज आई तो वह दौड़ते हुए कमरे की तरफ गई. वहां देखा कि टेबल पर से पानी का गिलास लेने की कोशिश में अनिल पलंग पर से नीचे गिर गया. ..

‘यह आप ने क्या किया...

थोड़ा मेरा इंतजार नहीं कर सकते थे...’ सुमना अनिल को किसी तरह से उठाते हुए भर्राए गले से बोली.

‘‘अब तो सिर्फ नौकर का ही इंतजार करना पड़ेगा,’’ कहते कहते अनिल की आंखें छलछला आईं. ‘‘आप की जानकारी के लिए बता दूं कि मैं आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी. हमेशा आप की परछाई बन कर रहूंगी. पापा को जो बोलना है बोलने दीजिए. यह हमारी जिंदगी है और हमारा फैसला है,’’ मैं आप की धर्मपत्नी हूं, इसलिए अपना फर्ज निभाऊंगी...

आज से मैं आप की मां की तरह आप को डांटूगी...

समझाऊंगी, तो बहन की तरह दुलार और पत्नी की तरह प्यार करूंगी.’’ फिर उस ने अनिल को गले से लगा लिया. ...

एक दोस्त की सुंदर रचना

अनिल जैन


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