आंखों में धूल झोंकना

 मां के लिए नया मिक्सर ग्राइंडर..पिता के लिए नई कमीज़ और छोटे भाई बहनों के लिए तोहफे देखकर देवांग के पिताजी का माथा ठनका और उन्होंने उससे पूछ लिया,"क्या तुम्हारी तनख्वाह इस बार जल्दी मिल गई है जो यह सामान ले आए हो..अभी पहली तारीख आने में तो 10 दिन बाकी हैं"। 


"नहीं पिताजी, मेरे पास कुछ पैसे बचे थे वहीं से लाया हूं"।


"कुछ दिन पहले तो तुमने अपने सारे जमा पैसे मुझे यह कह कर दिए थे कि मैं उससे घर की मरम्मत करवा लूं.. तो अब तुम्हारे पास पैसे कहां से आए"।


पिता के सवालों से देवांग थोड़ा घबरा सा गया था। उसकी घबराहट भांप कर पिता ने दोबारा पूछा," सच बताओ..कहां से आए पैसे"?


"वो.. वो मैं दफ्तर से ले आया था"।


"दफ्तर से कैसे"?


दरअसल देवांग एक ऑफिस में कैश का काम देखता था।अपनी पढ़ाई के साथ-साथ वह एक दफ्तर में पार्ट टाइम जॉब कर रहा था।हालांकि उसके पिता ने उसे पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहा था पर घर के हालात को देखते हुए वह पिता की मदद करना चाहता था इसलिए उसने यह नौकरी पकड़ ली थी और आज पिता के सवालों से घबराहट उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी।


"बताओ ना कैसे लिए पैसे दफ्तर से"?


"वो पिताजी, शाम को सारा कैश मेरे पास ही जमा होता है तो उसमें से मैंने थोड़े पैसे निकाल लिए थे।वह मेरा दोस्त है ना नीरज उसने मुझे बोला कि अगर कुछ पैसे निकल भी जाएं तो क्या पता चलेगा।हिसाब में इधर-उधर कुछ कर देना"।


"उसने कहा और तुमने मान लिया।तुमने एक बार भी नहीं सोचा कि आज जो तुम अपने बॉस की आंखों में धूल झोंक कर खुश हो रहे हो उसके बाद तुम अपने आप से नज़रें कैसे मिला पाओगे।बेटा, ईमानदारी का रास्ता ही  तुम्हें जीवन में आगे ले जाता है।हां, यह रास्ता कठिन तो है पर इससे मिली सफलता में बहुत संतुष्टि है। आज नहीं तो कल तुम पकड़े जाओगे फिर तुम्हारे कारनामों की वजह से कोई तुम्हें नौकरी नहीं देगा और तुम्हारा करियर बनने से पहले ही चौपट हो जाएगा"।


"जी पिताजी, मुझसे बहुत भूल हो गई..मैं लालच में आ गया था"। 


"ठीक है, सुबह जाने से पहले मुझसे पैसे ले जाना और कैश पूरा कर देना.. मेरे पास कुछ पैसे रखे हैं और आगे से किसी की आंखों में धूल झोंकने से पहले एक बार मेरी कही बातों पर गौर ज़रूर करना।" 


पिता के कहे शब्द देवांग ने अपने जीवन में अच्छी तरह से बांध लिए थे और फिर उसके बाद उसे सफल होने से कोई नहीं रोक पाया।


#स्वरचितएवंमौलिक 

#अप्रकाशित

 

गीतू महाजन, 

नई दिल्ली।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ