"अरे! और कितनी देर लगेगी, तैयार होने में? किसे दिखाना है जो इतना सज - सँवर रही हो? सभी नई बहू को देखने आ रहे है, तुम्हे नही ।"
"बस, पांच मिनट "अपने बालों का जूडा बनाते हुए संजना ने जवाब दिया ।
"ठीक है, जल्दी करो,मैं गाड़ी स्टार्ट कर रहा हूँ ।"
जैसे -तैसे तैयार होकर संजना बाहर आई तो देखा सारे घर की खिड़कियाँ खुली है , लाईट, पंखे, टीवी सभी चल रहे है ।जल्दी जल्दी लाईट, पंखे, टीवी और खिड़कियां बंद करके वह बाहर आई और दरवाजे पर ताला लगा कर गाड़ी में बैठ गई|
गौतम ," पता नहीं कितना वक्त लगता है तैयार होने में, हमेशा तुम्हारी वजह से देर हो जाती है ।वहाँ जाते ही मुझे सुनना पड़ेगा ।"
संजना का मूड खराब हो गया और वह उस वक्त रूआंसी हो गई जब उसने देखा कि अपनी देवरानी की मुँह दिखाई के फंक्शन में वह वैसे तो जैसे तैसे ठीक से तैयार हो गई लेकिन पैरों मे स्लीपर पहन कर आ गई ।वह गौतम से रूकने का कहती उससे पहले ही वह भड़क उठा और संजना चाह कर भी कुछ न बोल पाई ।
संजना सोचने लगी कही भी जाना हो तो हमेशा उसे मुश्किल से आधा घंटा पहले ही पता चलता है । इस आधे घंटे में उससे उम्मीद की जाती है कि वह खुद भी तैयार हो जाए और बच्चों को भी सलीके से तैयार कर दे । साथ ही कांच की चूड़ी, बिछिया, पायल, सिर पर सिंदूर और गले मे मंगलसूत्र तो होना ही चाहिए और बिन्दी भी बड़ी ही होनी चाहिए । इसमे जरा सी चूक बर्दाश्त नही की जाती थी ।
खैर, जैसे तैसे साड़ी से पैरो को छुपाते हुए फंक्शन अटेंड किया । चेहरे पर एक मुस्कान ओढ़ के रख ली और सभी नाते रिश्तेदारो का स्वागत, खान-पान और आराम का ख्याल रखने लगी ।बड़ी बहू जो है इस घर की, जिम्मेदारी तो बनती है उसकी ।
आज से ठीक चार साल पहले ढेर सारे रंग बिरंगे सपने संजोए कुमकुम लगे क़दमों से अपने पिया के घर पर पहला कदम रखा था संजना ने। फिर पिया के साथ कलेवा खोलना, थाल उठाई, जुआ -जुई, मुँह दिखाई जैसी कई रस्में निभाई थी और इन रस्मों को निभाते, शर्माते -सकुचाते वह कब गौतम के करीब आ गई उसे पता भी नही चला ।पिया के प्यार की मदहोशी में मदहोश दिन बड़े अच्छे कट रहे थे । वह गौतम के प्यार में इस कदर डूबी हुई थी कि गाहे-बगाहे मिलने वाले तानो और उलाहने को अनसुना कर दिया करती थी ।
बड़े ही धैर्य के साथ वह अपनी गृहस्थी में रमने की कोशिश कर रही थी । पर कहते है न कि हर दिन एक समान नहीं होते । जहाँ खुशियाँ आती है वही गम की परछाई भी पीछा करती है ।
संजना हर नई नवेली दुल्हन की तरह घर के सभी सदस्यों का मन जीतने की कोशिश करती, सबकी जरूरतो का ध्यान रखती, सासु जी की हर बात को बिना किसी तर्क वितर्क के मानती, पर फिर भी उसे महसूस होता था कि शायद कोई कमी रह गई है मुझसे इसलिए कोई घर मे उस तरह से खुश नहीं होता जैसे मेरे मम्मी पापा होते थे । कैसे मेरी एक छोटी सी उपलब्धि पर या छोटी सी सफलता पर ही बड़े खुश हो जाते थे वह , प्रोत्साहित करते थे. कोई भी नई सब्जी या पकवान बनाना सीखती थी तो तारीफ भी करते और अगर कोई कमी रह भी जाती तो इस तरह से बताते की मै दुगुने उत्साह के साथ उसे सुधारने मे लग जाती ।
लेकिन यहा तो जरा सी चूक होने पर ही इतना बुरा डांटते है कि रोना ही आ जाता है । कभी याद नही आता कि पापा ने कभी जोर से डाटा हो वह तो ससुराल आ कर पता चला कि डांटने वाले पापा भी होते है, पीहर मे तो पापा ने हमेशा बचाया ही है माँ की डाट और मार से ।पर माँ पापा ने संस्कार ही ऐसे दिये कि बड़ो के सामने बोला नही जाता चाहे खुद की गलती हो या ना हो । सब कुछ चुपचाप सुनती और कोई गुंजाइश होती तो सुधारने की कोशिश करती ।
कभी-कभार ज्यादा परेशान हो जाती तो सोचती गौतम से कहु पर अगले ही पल अपना फैसला बदल लेती क्योंकि समझती थी वह की गौतम विश्वास नही करेंगे , उनके सामने कभी ऐसा हुआ नही इसलिए । जो भी बात होती गौतम की गैरमौजूदगी मे ही होती थी, तो वह भला कैसे विश्वास करते।
"अरे संजना किन ख्यालो मे डूबी हुई हो, और यह चाय किस के लिए बना रही हो, एक कप मुझे भी देना।"
संजना वर्तमान मे लौट आई और अपनी ताई सास के पैर छू कर बोली "नई बहू के मम्मी पापा के लिए बना रही हूँ, आपके लिए भी बना देती हूँ ।"
ताई सास, "संजना तुम्हारे पीहर से कोई नही आया? "
संजना ,"नही कोई नही आया क्योंकि किसी ने बुलाया ही नही और आप तो सब जानती है यह हमेशा की बात है ।"
ताई सास, "अरे! तो तुम क्यो देवरानी के पीहर वालो की आवभगत मे लगी हुई हो, तुम्हारे तो पीहर वालो को पूछते भी नही । यह भेदभाव नही है क्या? "
संजना, "हा ताई जी, भेदभाव तो है, लेकिन यह भेदभाव तो मेरे सास-ससुर कर रहे है, उसमे मेरी देवरानी या उसके पीहर वालो का क्या दोष है? आप तो आराम से बैठकर चाय पीजिए, इन सब बातो को छोड़िए ।"
चाय पीते हुए संजना के सामने 3 साल पहले की वह घटना आँखो के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगी । 3 साल पहले उसे अपने ससुराल को छोडने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि उसने अपने ससुर को जवाब दे दिया था । क्या करती वह, शादी हुए काफी वक्त हो चुका था, पगफेरे के बाद एक बार भी अपने पीहर नही जा पाई थी वह । उसे सबकी बहुत याद आती थी। पर सासु जी ने एक बार भी उसे पीहर जाने को नही कहा । जब भी वह जाने का पूछती उसे कई घंटो तक जवाब ही नही देती, या एक के बाद एक काम बताती जाती और उसे करते करते शाम हो जाती । फिर उसकी सास कहती तुम गई नही? वह मन मसोस कर रह जाती । एक दिन संजना ने ठान लिया कि सुबह जल्दी तैयार होकर गौतम के साथ ही निकल जाएगी । उस दिन उसने सुबह जल्दी उठ कर नाश्ता और खाना साथ ही बना दिया और गौतम के साथ जाने को तैयार हो गई ।जैसे ही सासु जी ने संजना को तैयार देखा वह बिफर पड़ी,
"ये क्या? सुबह-सुबह कहा जा रही हो? "घर के काम कौन करेगा? "
"मैैंने नाश्ता और खाना बना दिया है, मै पीहर जा रही हू ।"
संजना का इतना कहना था कि ससुरजी चिल्ला के बोले, "किस की इजाजत से पीहर जा रही हो? "
संजना से भी नही रहा गया वह बोल पड़ी, "अपने पीहर जाने और मम्मी पापा से मिलने के लिए मुझे किसी की इजाजत की जरूरत नही है । आपको कैसा लगेगा जब आपके बेटे को आपसे बात करने के लिए इजाजत माँगनी पड़े । और मै तो हमेशा पूछती थी, लेकिन कोई जवाब ही नही देता, तो मैने भी सोच लिया अब किसी से नही पुछुंगी।"
इतने वक्त का गुबार और गुस्सा संजना के शब्दो मे झलक रहा था आज न उसे माँ के संस्कार याद आ रहे थे ना ही पिता की सीख ।उसे याद रहा तो सिर्फ वह तड़प और बेबसी जो इतने महीनो से वह महसूस कर रही था। एक माँ-बाप अपने बेटी को कितने प्यार से पालते है, बड़ा करते है, हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश करते है और साथ ही उसे संस्कारित करते है क्योंकि उसे पराये घर जाना है । लेकिन बेटी तो मा -पापा के साथ 27-28 साल रहती है, उसे उनसे बात करने के लिए इजाजत नही लेनी पड़ती । वह जब चाहे तब बात कर सकती है, उनसे रूठ सकती है, उन्हे मना सकती है ।लेकिन शादी होते ही उम्मीद की जाती है वह अपने माता पिता को भूल जाए? सिर्फ तब याद रखे जब ससुराल मे कोई रस्म निभानी हो और तोहफे की बरसात करनी हो ।क्यो? किसने हक दिया आप सबको ।
और यह पति पता नही किस मिट्टी के बने हुए है? सही को सही और गलत को गलत कहने मे किस बात का डर लगता है? कहते फिरते है तुम से बहुत प्यार करते है और मौका मिलने पर जताते भी है, पर ऐसे प्यार का क्या अचार डाला जाए जो अपनी पत्नी के साथ खड़ा नही हो सकता, उसके पक्ष मे एक बात नही बोल सकता?
संजना का इतना कहना था कि गौतम उस पर बरस पड़े, "ये किस तरह से बात कर रही हो तुम? "
संजना आँखो मे आंसू लिए, "क्या गलत कहा? और क्यो कहना पड़ा? क्योंकि तुम कुछ नही बोलते ।मै गलत करू तो तुम मुझे कहो मै गलती सुधारने की कोशिश करूंगी लेकिन अगर तुम्हारे मम्मी पापा गलत कर रहे है तो तुम चुप क्यो हो? गलत बात मुझसे बर्दाश्त नही होती और जिन्होंने जन्म दिया उनसे मिले बिना कैसे रहूंगी? खुद से क्यों नही कहते मिल आओ तो इतनी बात ही नही होती।"
गौतम बिना कुछ बोले ऑफिस निकल गया और संजना अपना सामान पैक कर के पीहर चली गई । हफ्ते भर बाद गौतम संजना को लेने गया, उससे माफी मांगी और समझाया कि कुछ भी कहना हो मुझ से कह लेना लेकिन मम्मी पापा के सामने मत बोलना । लेकिन संजना ने साफ मना कर दिया, उसने कहा "जिस घर मे मेरे माता-पिता की इज्जत नही वहा मै नही रहूंगी ,जहा मेरे मम्मी पापा को मुझसे मिलने के लिए मिन्नतें करनी पड़े मै वहा नही रह सकती ।अगर तुम चाहते हो मै तुम्हारे साथ उस घर मे चलूं तो तुम्हे वादा करना होगा कि कोई मेरे माता-पिता को अपशब्द नही कहेगा और अपने घर जाने के लिए मै किसी की इजाजत नही लूँगी तुम्हारी भी नही ।"
गौतम, "तुम क्यो बात को बढा रही हो? "
संजना, "मै तुम्हारी बातो मे नही आऊंगी गौतम या तो वादा करो या मुझे भूल जाओ ।"
गौतम उस वक्त तो वहा से चला गया पर संजना का पक्ष अपने मम्मी पापा के सामने रखने की हिम्मत नही कर पा रहा था । वह सोच ही रहा था कि कैसे इस समस्या को सुलझाया जाए कि तभी उसके पास उसके तबादले का ऑर्डर आ गया और उसे अपनी समस्या का हल मिल गया ।वह संजना को लेकर नये शहर आ गया । गौतम समझ रहा था उसने अपनी समस्या बहुत अच्छे से सुलझा ली, संजना अपने सास-ससुर की नजर मे बुरी बहू बन गई जिसके किस्सों का ढिंढोरा उसकी सास अपने समाज मे गाती रहती ।आखिर अपने आप को पाक साफ साबित करने के लिए सफाई भी तो पेश करनी थी ।
"संजना! संजना ,तुम गौतम के साथ जाकर अपने 2-3 दिन के कपड़े ले आओ तुम्हे यही रहना होगा, सारे मेहमान आज चले जाएंगे पर तुम यहा रहोगी तो नई बहू का मन भी लगा रहेगा "सासु जी ने जैसे संजना को आदेश दिया ।
संजना, "माफ कीजिएगा माँ जी मै नही रूक पाउंगी, मुझे मम्मी को हॉस्पिटल दिखाने जाना है और एक हफ्ते तक जब तक यहा हू उन्ही के पास रहूंगी मै कौनसा रोज आ पाती हू । रही बात नई बहू की उसका मन लगाने के लिए देवर जी की जरूरत है, मेरी नही ।मै चलती हू, मेरा इंतज़ार मत कीजिएगा ।"
संजना ने बच्चो को बुलाया और गाड़ी के पास खड़े होकर गौतम का इंतजार करने लगी । वह बहुत खुश थी अपने फैसले पर । क्योंकि वह आजाद थी ।वह अपने सारे कर्तव्य निभा रही थी ।सर पर पल्लू, हाथ मे काँच की चूड़ी, पाजेब, बिछिया, सिन्दूर सब पहना था उसने । सास-ससुर के पैर भी छूती है, चाहे आशीर्वाद मिले या अपमान ।जब भी घर मे कोई काम होता है एक बार बुलाने पर तुरंत पहुंच जाती है ।लेकिन अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से जी रही है ।अब उसे अपने घर जाने के लिए, माता-पिता से मिलने के लिए, उनके प्रति अपने फर्ज निभाने के लिए किसी की इजाजत नही लेनी होती । अब कोई उसके माता-पिता की बेइज्जती करने की हिम्मत नही कर सकता । भले ही वह अपने सास-ससुर की अच्छी बहू नही बन पाई पर उसे गर्व है कि वह अपने माता पिता का सम्मान बनाए रख पाई । चाहे समाज उसे बुरी बहू समझे पर उसके लिए महत्वपूर्ण है कि उसके माता-पिता की वह अच्छी बेटी कहलाए ।बहू तो सभी बुरी ही होती है चाहे वह कितना भी कर ले,तो वह बुरी ही सही ।
साभार धन्यवाद🙏🙏🙂
0 टिप्पणियाँ