"क्या आप अनिल की मम्मी बोल रही है ".....जी कहिये ......जी ,मैं राजधानी कॉलेज से बोल रही हूँ .....प्रिंसिपल मैम ने आपको अनिल के बारे में कुछ बात करने के लिए तुरंत अभी कॉलेज बुलाया है .....'तुरंत अभी'.... सुनते ही सरोज जी को पता नहीं क्यों बैचनी होने लगी ...वो जल्दी से शौर्य की कॉलेज पहुंची ....प्रिंसिपल ने जो कहा वो सुनते ही सरोज जी के माथे पर पसीने की बूंदे उभर आईं.. कंपकपाते हाथों से पानी का गिलास भी गिर पड़ा....सरोज जी प्रिंसिपल के सवालों के जवाब देते हुए कांप रही थी।
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प्रिंसिपल ने सरोज जी को दिलासा दिया ...आप घबराएं नहीं सरोज जी , बच्चे नादानी करते हैं... लेकिन नादानी कब बड़ी गलती बन जाये , पता नहीं चलता... आप समझदार माँ है ....अपने बच्चे को समझाएं कि दोबारा कोई ऐसी हरकत न हो.. अभी तो मामला सुलझ गया है लेकिन आगे से ख्याल रखे ...
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इतना सुनते ही मां अपने आंसू रोक नहीं सकी.... "देखिये सरोज जी , मै भी एक माँ हूँ, आपकी मनोदशा समझ सकती हूं लेकिन माँ से पहले मैं एक स्त्री हूँ और उस बच्ची की हालत भी समझ सकती हूं....आप भी समझें कि सरोज जी की नादानी की वजह से उस लड़की पर क्या असर पड़ सकता है....
आंसू छुपाते हुए सरोज जी प्रिंसिपल का केबिन से निकली ही थी कि चपरासी ने बोल दिया "अभी से कन्ट्रोल कर लीजिए मैडम, बेटा हाथ से निकल जायेगा, संगत अच्छी नहीं है उसकी.....
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पूरे रास्ते सरोज जी और अनिल में कोई बातचीत नही हुई.... अभी 1 घण्टे पहले ही तो कॉलेज से फोन आया... अनिल और उसके दोस्तों पर एक लड़की ने छेड़छाड़ का इल्जाम लगाया था.....सरोज जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी, इतनी ओछी हरक़त, यही सिखाया मैंने उसे, छी! अपनी कोख़ को ही कोस बैठी थी वो....अनिल के पापा का मार्बल का ठीक-ठाक बिज़नेस था ...उन्होंने कहा भी था ...अनिल को सम्भालना तो मेरा बिज़नेस ही है तो अभी क्यों नहीं, ग्रेजुएशन तो प्राइवेट ही हो जायेगी.... छोटे शहर में सपने भी छोटे होते हैं....
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लेकिन सरोज जी ने भरपूर जोर लगा कर अनिल के ग्रेजुएशन तक का वक़्त मांगा था...अभी 2 महीने भी नहीं हुए कॉलेज जाते और ये हरक़त....18 साल का भी नहीं है और लड़की के साथ ऐसा व्यवहार....ऐसी क्या संगत कि मेरे संस्कार ही धूमिल हो गए...प्रिंसिपल ने बताया कि किस तरह अनिल और उसके दोस्तों ने उस लड़की को परेशान किया कि उसने कॉलेज जाना ही बंद कर दिया...उसके घर वाले पुलिस कम्प्लेन करने वाले थे लेकिन प्रिंसिपल ने ज़िम्मेदारी लेकर बीच बचाव किया...ओह माय गॉड ... कौन सी कमी रह गई मेरी परवरिश में...उस दिन इसको बिज़नेस में ही लगा दिया होता तो ये दिन नहीं देखने होते ... सब मुझे ही दोष देंगे...क्योंकि बच्चो को बिगाड़ने में औरत ही तो ज़िम्मेदार है...
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थोड़ी देर तक ये सोचने के बाद सरोज जी खुद से पूछने लगी ....अब प्रश्न यह है कि अनिल को कैसे रास्ते पर लाऊँ, कैसे समझाऊं,हाथ उठा कर भी क्या होगा,पर सजा तो देनी ही होगी उसे , तभी एहसास होगा ...बहुत ज्यादा टूट चुकी थी सरोज जी ....घर पहुँचते अनिल शुरू हो गया "माँ मुझे माफ़ कर दो, मैं अब ऐसी कोई गलती नहीं करूँगा.....आप पापा को मत बताना, आप जो चाहो वो सजा दे दो, पर प्लीज़ पापा को मत बताना।
पापा तो मार ही डालेंगे, प्लीज माँ।" ने उसे शान्त करवाया ....और कहा आज मैं तुम्हे एक कहानी सुनाती हूँ..
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"एक लड़की थी, उसे पढ़ने का बहुत शौक था...पर उस ज़माने के रूढ़ीवादी घर वालों को मनाना इतना आसान नहीं था....वो लड़की पढ़ाई में होशियार थी और स्कॉलरशिप मिलने के बाद भी उसके घर वालों ने बड़ी मुश्किल से उसे कॉलेज जाने की परमिशन दी...उस जमाने में लड़कियों का कॉलेज जाना बहुत बड़ी बात हुआ करता था...उस लड़की की आँखों में ढेरों सपने थे जो उसे साकार करने थे... उसके कॉलेज में एक लड़का भी था, जो उसे बहुत परेशान करता था, लेकिन वह लड़की अपनी परेशानी अपने घरवालों से बाँट नहीं सकती थी....क्योंकि उसे पता था कि जिस दिन उसने यह परेशानी घर पर बताई, उस दिन ही उसका कॉलेज जाना बंद हो जाएगा....एक दिन उस लड़के ने उस लड़की से उसका रजिस्टर मांगा और अगले दिन लौटा दिया ....वह लड़की दुनिया के छल कपट से अनजान थी ...दुर्भाग्य भी लड़की का ही दुश्मन था जो घर पहुंचते ही किसी काम के लिए उसके चाचा ने खाली पेज मांगा और उस नादान लड़की ने अपना रजिस्टर पकड़ा दिया ...उस रजिस्टर में एक लेटर गिरा ,जो उस लड़के ने छुपाया था....लेकिन लड़की उससे बिलकुल अनजान थी और उसके बाद पता है क्या हुआ ?.....क्या हुआ" अनिल उत्सुकता से सुन रहा था.....उसके बाद वो हुआ, जो होना था,पर जो सही तो बिलकुल नहीं था....उस लड़की को मारा गया, पीटा गया और उसका कॉलेज जाना बंद करवा दिया ,बदचलन कहा गया, सारा दोष उसे ही दिया और कुछ ही महीनों में उसकी शादी कर दी गई।
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जानते हो लड़की कौन थी??
"नहीं " अनिल बोला
"वह लड़की, तुम्हारी माँ यानी मैं थी" मां की आँखे अविरल झरने लगी, सारा दर्द बाहर आ रहा था.....किस तरह किसी की नादानी ने उसके सारे सपने, सारे अधिकार छीन लिए थे....
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"आज तुमने मुझे वही दिन फिर दिखा दिया शौर्य .....आज मेरी जगह वो लड़की है और उस लड़के की जगह तुम....मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी औलाद किसी को इतनी तकलीफ दे सकती है.....मगर अब वो नहीँ होगा जो उस दिन हुआ अनिल .....तुम्हारी वजह से कोई लड़की कॉलेज जाना बंद करे, तुम्हारी वजह से किसी लड़की के साथ अन्याय हो यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती.....हर बार कोई लड़की ही क्यों भुगते अनिल ?....इस बार सजा के हकदार तुम हो....अब से तुम्हारा कॉलेज जाना बंद ... कल से तुम पापा के बिज़नेस में उनका हाथ बटाओगे,यही तुम्हारी सजा होगी...और हां ,उस लड़की को मैं फ़ोन कर रही हूँ अभी की अभी ...और तुम उसे अभी बहन बोल कर सम्बोधित करोगे और उसे हर रक्षा बंधन पर राखी बंधवाने का वचन दोगे "......सरोज जी ने आँसुओ को पोछ, दृढ़ता से न्याय कर दिया । यदि हम अपने लडको को सजा देंगे तो अपराध अपने आप कम हो जाऐंगे
# खुशबु
अनिल जैन
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