तुलसी.... बैठो ना थोड़ी देर मेरे पास....
"जी... मैं तो आपके पास ही बैठी हूँ ..
कहिए कुछ कहना है आपको....
"तुम्हारे आगे मैं स्वयं को बहुत बौना महसूस कर रहा हूँ .... तुम नहीं होती तो शायद मैं कभी भी चलने के काबिल नहीं हो पाता ....कहते हुए अनिल का गला रुँध गया.....कोई तराज़ू नहीं होता..
रिश्तों का वज़न तोलने के लिए...
"फिर भी मेरे द्वारा तुम्हारे साथ किया गया व्यवहार किसी भी तराजू पर रखूँ तो भार शून्य ही आएगा...
लकवाग्रस्त शरीर से ज्यादा मेरे अपराधों का बोझ है जो मेरे चारों तरफ कालिमा का आवरण आच्छादित करता हुआ सा प्रतीत होता है मुझे...
अपना सर तुलसी की गोदी में रख अनिल तीन दशक पीछे चला गया..
जब तुलसी से उसकी शादी हुई तब वह केवल 19 वर्ष की नवयौवना और अनिल बाइस वर्ष का छबीला नौजवान .....जो बाद में सेना में मेजर बनने के साथ ही अपने ऐश्वर्य व प्रतिष्ठा के अभिमान में नए फूलों की तरफ आकर्षित होता हुआ जूही पर जा टिका था...
जब-जब वो जूही के साथ होता ....उसे यही लगता कि सावन की बहार है जीवन में.. ...
जब कभी वो छुट्टियों में घर आता तब भी तुलसी की उपेक्षा ही करता था...
उसे तुलसी नाम से भी चिढ़ यहा तक थी कि सर्दियों में कभी चाय में भी माँ ने तुलसी पत्ती डाल दी तो मैं वह चाय नहीं पीता था....
अचानक आये लकवे के अटैक के बाद...
सावन मे वो जूही कभी नहीं खिली... मिलना तो दूर बात भी नही करी.....और करती भी क्यो एक लकवाग्रस्त इंसान को कौन ढोना चाहता है
लेकिन तुलसी.....जिसने अपने साहस और समर्पण से उसकी सेवा की उसके पत्नी धर्म अनिल के लिए दवा ही साबित हुई और पिछले पांच सालों के उसके अथक प्रयास ने अनिल को चलने में समर्थ बना दिया...
अचानक अनिल की आँखों से ढलके आँसुओं को अपने हाथों से पोंछते हुए उसने अनिल अपना होने का अहसास दिलाया....
अब अनिल भीगी आँखों से तुलसी को देख रहा था और सोच रहा था ...काश.... मैं समय रहते समझ पाता कि मौसमी पौधे कभी भी *तुलसी नहीं बन सकते*....
*मेरे आंगन की तुलसी.*...
एक दोस्त की सुंदर रचना
0 टिप्पणियाँ