आग पर तेल छिड़कना

 जीवन की राह आसान नहीं होती। कभी छोटी-सी गलतफ़हमी, कभी मामूली विवाद, तो कभी किसी की कटु वाणी हमारे सामने “आग” की तरह भड़क उठती है। ऐसे समय में इंसान की असली परख होती है। कोई शांति और धैर्य से काम लेता है, तो कोई बिना सोचे-समझे ऐसा बोल या कर देता है, मानो “आग पर तेल छिड़क” दिया हो। परिणाम यह होता है कि जो समस्या छोटी थी, वह विकराल रूप ले लेती है।


आधुनिक युग में यह प्रवृत्ति और भी बढ़ गई है। सोशल मीडिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक साधारण-सी पोस्ट पर किसी की तीखी टिप्पणी आते ही लोग तर्क-वितर्क में पड़ जाते हैं। बहस इतनी बढ़ जाती है कि दोस्ती टूटने और नफ़रत फैलने तक की नौबत आ जाती है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे सुलगती चिंगारी पर किसी ने तेल डालकर उसे ज्वाला बना दिया हो।


कार्यालय या व्यवसाय की दुनिया में भी यही सच है। यदि कोई कर्मचारी गलती करे और प्रबंधक क्रोध में भड़क जाए, तो गलती सुधारने के बजाय वातावरण और तनावपूर्ण हो जाता है। वही स्थिति परिवार में भी देखी जाती है। पति-पत्नी के बीच यदि झगड़ा हो और कोई तीसरा आकर ताना मार दे, तो झगड़ा और बढ़ जाता है। सच तो यह है कि असावधानी से निकले कटु शब्द किसी भी रिश्ते को गहरी चोट पहुँचा सकते हैं।


यह मुहावरा हमें एक महत्वपूर्ण सीख देता है कि संकट या विवाद की घड़ी में हमें संयम और विवेक का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। हमें आग पर तेल नहीं, बल्कि शांति का जल छिड़कना चाहिए। यदि हम प्रेम, धैर्य और सहनशीलता से परिस्थितियों का सामना करें, तो कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं लगती।


निष्कर्ष यह है कि जीवन की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम विवादों को सुलझाने वाले बनें या बढ़ाने वाले। “आग पर तेल छिड़कना” हमें चेतावनी देता है कि क्रोध, कटाक्ष और नकारात्मकता केवल नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए हमें हमेशा शांति, सद्भाव और सहनशीलता को अपनाना चाहिए। यही सकारात्मक सोच हमारे जीवन और समाज को प्रकाशमान बना सकती है।सुदर्शन सचदेवा 


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