"पापा… मुझे ₹3000 दीजिए ना, आपको पता है ना, मैंने वो सुंदर लाल लहंगा देखा था, जो पिछले हफ्ते दुकान पर दिखा था… आज ही जाकर लेना है!"
कपिल जी अखबार से नज़रें उठाकर मुस्कुराए, “हां बेटा, क्यों नहीं… ये लो ₹5000, और अगर कुछ और पसंद आए तो वो भी ले लेना।”
उन्होंने बड़ी नर्मी से अपनी बेटी लक्ष्मी के हाथ में पैसे रख दिए।
इतने में उनका बेटा रोहित जो पास ही बैठा था, झट से बोल पड़ा,
“पापा! जब मैं पैसे मांगता हूं तो आप मुझे ₹2000 देकर कहते हैं कि ‘इतने काफी हैं’, और जब दीदी मांगती हैं तो ₹5000 दे देते हैं। क्या हम दोनों में कोई फर्क है?”
कपिल जी ने अखबार मोड़ा, बेटे की ओर देखा और धीमे स्वर में बोले,
“हाँ बेटा… फर्क है — जिम्मेदारी का, भरोसे का और हालात का। तेरी दीदी अब बड़ी हो गई है। मुझे पता है कि वो पैसों का कभी गलत इस्तेमाल नहीं करेगी। और बेटा, एक बात हमेशा याद रखना — जब तक बेटी अपने पापा के घर है, हमें उसकी हर इच्छा पूरी करनी चाहिए। कौन जाने, आगे ससुराल में उसे कोई उसकी जिद पूरी करने वाला मिले या नहीं…”
रोहित की आँखें भर आईं। वो बोला, “पापा, मैं तो ऐसे ही मजाक कर रहा था। मुझे अपनी दीदी की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं चाहिए।”
कपिल जी मुस्कुराए, “मुझे पता है बेटा। और याद रखना — मेरे बाद अपनी दीदी को किसी चीज़ के लिए कभी तरसाना मत।”
लक्ष्मी उनके घर की रौनक थी। माँ के गुजर जाने के बाद घर की ज़िम्मेदारी भले कपिल जी और रोहित पर आ गई थी, लेकिन घर की मुस्कान — वो तो लक्ष्मी ही थी।
उसकी हँसी जैसे दीवारों से टकराकर पूरे घर में रौशनी भर देती थी।
वो बचपन से ही समझदार थी। जब माँ गुज़री थी, तब वो सिर्फ़ आठ साल की थी।
रोहित उस वक्त दस का था, और कपिल जी के लिए तो जैसे ज़मीन ही खिसक गई थी।
पर उस छोटी सी बच्ची ने धीरे-धीरे अपने पापा के आँसू पोंछने की कला सीख ली।
कभी रोटी बनाना, कभी कपड़े धोना, कभी भाई को स्कूल भेजना — सबकुछ उसने मुस्कुराते हुए किया।
समय बीतता गया। अब लक्ष्मी कॉलेज में थी, और रोहित इंजीनियरिंग कर रहा था।
कपिल जी बूढ़े हो चले थे, लेकिन जब लक्ष्मी पास होती, उनके चेहरे पर आज भी वही चमक लौट आती थी।
लक्ष्मी अक्सर शाम को पापा के साथ छत पर बैठती, कहती —
“पापा, आप अकेले कभी नहीं होंगे, मैं हमेशा आपके साथ रहूँगी।”
कपिल जी मुस्कुराते, “पगली… बेटी तो पराई होती है। आज है, कल नहीं। लेकिन तेरा प्यार तो हमेशा रहेगा।”
एक दिन शाम को, जब लक्ष्मी बाज़ार से लौटी, उसके हाथ में वही लाल लहंगा था — वही, जिसकी उसने हफ्तों से चाह की थी।
उसने पापा को दिखाते हुए कहा, “देखिए ना पापा, कितना सुंदर है ना?”
कपिल जी बोले, “हां बेटा, बिल्कुल तेरे जैसा।”
लक्ष्मी शरमा गई।
पर उसी शाम लक्ष्मी ने अपने पापा को एक चिट्ठी दी —
“पापा, मैं चाहती हूँ कि आप कल राजीव जी और उनकी फैमिली से ज़रूर मिलिए। उन्होंने मुझे शादी के लिए देखने की बात की है।”
कपिल जी के हाथ कांप गए।
उनके दिल में खुशी भी थी और डर भी — बेटी अब अपने घर की होने जा रही थी।
अगले दिन राजीव और उसके माता-पिता आए।
राजीव एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, शांत, सुसंस्कृत और समझदार।
लक्ष्मी और राजीव की बातचीत में मिठास थी, और कपिल जी को लगा कि भगवान ने वाकई उनकी बिटिया के लिए अच्छा साथी भेजा है।
थोड़े ही दिनों में रिश्ता तय हो गया।
घर में खुशी की लहर दौड़ गई।
रोहित ने दीदी के लिए गहनों की खरीदारी की जिम्मेदारी ली।
कपिल जी ने पुराने संदूक से लक्ष्मी की माँ का चुन्नी निकाली और कहा,
“बेटा, तेरी माँ का सपना था कि तुझे लाल जोड़े में विदा करूं। अब उसका सपना पूरा होगा।”
लक्ष्मी की आँखें नम हो गईं। उसने पापा को गले लगा लिया।
“पापा, आप रोएंगे तो मैं नहीं जाऊँगी।”
कपिल जी ने कहा, “नहीं बेटा, ये खुशी के आँसू हैं।”
शादी का दिन आया।
पूरा घर फूलों से सजा था।
लक्ष्मी अपने लाल लहंगे में, माँ की चुन्नी ओढ़े, साक्षात् देवी लग रही थी।
जब बारात आई, तो पापा की आँखें भर आईं, पर उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
“आज मेरी गुड़िया रानी रानी बन गई।”
विदाई का समय आया तो लक्ष्मी का चेहरा फीका पड़ गया।
उसने पापा के पैर छुए और बोली,
“पापा, मैं ससुराल से हर हफ्ते फोन करूंगी। आप खाना टाइम पर खाइएगा, और रोहित का ख्याल रखिएगा।”
कपिल जी ने काँपते हुए हाथों से उसका सिर सहलाया,
“जा बेटा… खुश रहना। और याद रखना, ये घर तेरा है, दरवाज़ा कभी बंद नहीं होगा।”
कुछ महीने तक सब ठीक चला।
लक्ष्मी हर हफ्ते फोन करती, कभी हँसती, कभी अपने ससुराल की बातें बताती।
पर धीरे-धीरे उसकी आवाज़ में बदलाव आने लगा।
कभी थकी-थकी, कभी टूटी हुई सी लगती।
कपिल जी पूछते, “बेटा, सब ठीक तो है ना?”
वो हँसकर कहती, “हाँ पापा, सब ठीक है।”
पर माँ का दिल तो माँ का होता है, और पापा का दिल भी वही महसूस करता है जो बेटी की आवाज़ छिपाती है।
एक दिन देर रात फोन आया —
लक्ष्मी का पति राजीव दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था।
कपिल जी और रोहित भागे-भागे अस्पताल पहुँचे।
लक्ष्मी वहीं फर्श पर बैठी थी, आँखों में डर और हाथों में भगवान की तस्वीर थी।
राजीव तीन दिन बाद ठीक तो हो गया, लेकिन उस हादसे ने लक्ष्मी को भीतर से हिला दिया था।
वो कई दिन पापा के पास रही।
उस दौरान कपिल जी ने महसूस किया कि अब उनकी बेटी बहुत परिपक्व हो चुकी है।
वो जो छोटी सी गुड़िया कभी ₹3000 के लहंगे के लिए मचलती थी, अब अपने पति के लिए सारी दुनिया छोड़ सकती थी।
कुछ महीनों बाद लक्ष्मी फिर अपने घर लौटी — इस बार गोद में एक नन्हा बच्चा लेकर।
कपिल जी की आँखें भर आईं। उन्होंने उस बच्चे को गोद में लेकर कहा,
“देख बेटा, ये तेरी मम्मी जैसी ही होगी — अपने पापा की लाडली।”
लक्ष्मी मुस्कुराई, “पापा, अब आप नाना बन गए हैं, और मैं आपकी बेटी की जगह आपकी माँ बनकर ख्याल रखूँगी।”
कपिल जी ने हँसते हुए कहा, “माँ नहीं, तू हमेशा मेरी बिटिया ही रहेगी।”
रात को जब सब सो गए, कपिल जी छत पर बैठे आसमान की ओर देखने लगे।
उन्होंने धीरे से कहा,
“हे भगवान, तूने मेरी बिटिया को हर सुख दिया, अब उसके आँसू मेरी झोली में भेज देना।”
हवा हल्की चली, जैसे किसी ने उनकी पीठ थपथपाई हो।
नीचे कमरे में लक्ष्मी अपने बच्चे के साथ सोई थी — और उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी, जो बरसों पहले पापा की गोद में थी।
कहानी का सार:
पिता का प्यार न तो शब्दों से मापा जा सकता है, न पैसों से।
वो एक एहसास है — जो बेटी के हर आँसू, हर मुस्कान, और हर जिद में छिपा होता है।
क्योंकि जब तक बेटी अपने पापा के पास है, तब तक वो सिर्फ बेटी नहीं — उनकी दुनिया होती है।
– समाप्त –
मूल लेखिका
हेमलता गुप्ता
0 टिप्पणियाँ