आज रुक्मणि देवी,, संध्या की सास की तेहरवी थी ,,, संध्या की आँखों में आंसू बह रहे थे ,,, सोच रही थी इतना प्यार शायद मेरी मम्मी ने भी नहीं किया ,, जितना मेरी सास – माँ
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ने। आज से 20 साल पहले का दृश्य उसकी आँखों आ गया ,,, जब वो अपने मायके को छोड़ कर ससुराल की देहलीज पर आ गयी थी ,,, माँ ने आरती उतारी और बड़े प्यार से अंदर ले आयी ,,, बेटे रघु की पत्नी बन कर आयी थी संध्या। साथ में ननद पूजा और देवर राहुल भी बड़े खुश थे। ससुर जी की भी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। सब बड़े खुश थे।
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संध्या के मन में कितने ही सवाल कितनी ही शंकाये थी ,, सास कैसी होगी ? कहीं तंग तो नहीं करेगी ? हमारे समाज में विभिन तरह की भ्रांतिया फैली हुई है। सास के मन में बहु के लिए ,,, बहु के मन में सास के लिए । अगर हम यह भ्रांतिया एक तरफ कर एक नए सदस्य की तरह स्वागत करे ,, अपने परिवार में शामिल करने का अवसर दे,, तो शायद सभी के घर में सुकून हो।
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वो दिन याद कर रही थी संध्या जब पहली रसोई थी ,,, उसे बहुत डर लग रहा था ,,, सब्जी में नमक तेज हो गया तो सासु माँ ने आते की गोलिया बनाकर उसकी मदद की ,,, मुझे तो रोना आ गया था क्या करू ? तभी माँ ने मेरी मदद की कोई और होती तो बतंगड़ बना देती। पड़ोस की औरत रुक्मणि को उकसाने आती थी ,, उन्होंने उनको बुरी तरह डांटा आप अपना घर सम्भालिये मेरे घर में झाँकने की जरुरत नहीं। वो कह रही थी शुरू से ही बहु को दबा कर रखेगी तभी बहु सीधी रहेगी। पूजा थोड़ी नकचढ़ी थी ,, राहुल भी मीनमेख निकलने वाला। ससुर धर्मपाल बाहर से सख्त अंदर से नरम ,,, अखरोट की तरह... लेकिन सभी संध्या को बहुत चाहते थे
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एक बार रघु के ताऊ के बेटा रमन आया हुआ था ,,, "संध्या जरा पानी लाना ,,, संध्या जरा चाय लाना ,,, संध्या तौलिया देना ,,," हर काम संध्या को कहता। माँ ने देखा हर काम संध्या को कहता,, उसके साथ गन्दी निगाह भी डालता ,,, एक दिन माँ ने देखा संध्या चाय ले कर आयी उसका हाथ पकड़ने की कोशिश कर रहा था ,,
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कान खोल कर सुन ले लल्ला आ तो तूने संध्या को छुआ आइंदा ऐसा किया तो घर में मत घुसना। वो दिन आज का दिन रमन ने शर्म के मारे घर में घुसने की हिम्मत नहीं की। "अम्मा रमन आपके खानदान का खून है ,,, आपने ऐसा क्यों किया ,, मेरी जैसी परायी बेटी के लिए ? " "बेटी पहली बात तो तू मेरी अपनी बेटी पूजा से भी ज्यादा प्यारी है ,, पूजा तो छोड़ कर चली जाएगी ,, मुझे तुम्हारे साथ रहना है। और एक बात में तुझसे बताना चाहती हूँ ,, जो आज तक मेने किसी को नहीं बताई ,, मेरे जेठ ने मेरी इज्जत से खिलवाड़ किया तो मेरी सास ने मेरा मुँह बंद करवा दिया था "बेटी मेरे खानदान की इज़्ज़त का सवाल है , पी जा इस जहर को मेरे लिए,,, मेरे परिवार को बिखरने से बचाले । तब मेने सोच लिया था अपनी बहु की में पूरी रक्षा करुँगी ,, जो जो जुल्म मेने सही उसके साथ कभी न होने दूंगी।
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रघु अमेरिका गया नौकरी के लिए ,,, वहां उसने गौरी चमड़ी वाली से शादी की ,,, उसने वहां की नागरिकता के लिए शादी की ,,, "उस दिन राजू का फ़ोन आया माँ बाबूजी मेने यहाँ शादी कर ली है ,,, तलाक के पेपर भेज रहा हूँ ,,, संध्या से कहना हस्ताक्षर करदे ,,, उसे मायके छोड़ आइये। संध्या को पता लगा तो रो रो कर बुरा हाल था ,,, "मेरा आखिर क्या कसूर था ? "कुछ नहीं तुम्हारा कोई कसूर नहीं" गले लगाते हुए माँ ने कहा था। बाबूजी ने जवाब दिया "आज से तू हमारे लिए मर गया ,,, अपनी अर्थी का अधिकार भी छीनते है ,, न ही जायदाद में तुम्हारा कोई हक़ रहेगा।
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बाबूजी को तनहा कमरे मे फफक फफक कर रोते देखा था ,,, वो कितना टूट गए थे। जिस बाप का बुढ़ापे का सहारा ऐसे छीन जाये वो केसा हो सकता है ? तब राहुल ने कहा था आप चिंता न कीजिये बाबूजी , माँ मत रोइये ,,,भाभी आप भी शांत हो जाईये।
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संध्या के मम्मी पापा आये थे बेटी चलो वापिस हमारे घर हम तुम्हारी दूसरी शादी कर देंगे ,,, जब रघु ही नहीं रहा तो तुम क्या करोगी यहाँ रहकर। "नहीं मम्मी अब यही मेरा घर है ,, आप ने ही तो कहा लड़की एक बार ससुराल गयी फिर वहां से उसकी अर्थी निकलती है । संध्या ने अपने मम्मी पापा को इंकार कर दिया।
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पूजा भी शादी लायक हो चली थी ,,, उसको एक लड़के साहिल से प्यार था जो पिछले 3 साल से कॉलेज में साथ साथ थे। साहिल अच्छे घर से था ,,, सरकारी नौकरी में अध्यापक था ,, देखने में अच्छा था उसकी शादी कर दी गयी ,,, "भाभी अगर रघु भैया भी होते तो कितना अच्छा होता ? " संध्या की आँखे भर आयी ,, रोना छूट गया,, अभी 2 साल भी नहीं हुए शादी को ,, वो ना शादीशुदा थी ,, ना डिवोर्सी और ना ही विधवा। पूजा भी अपने ससुराल चली आयी ,, बड़ी खुश थी वहां।
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राहुल MBA की पढाई करने बंगलौर चला गया। एक दिन अचानक 5 साल बाद ,रघु अमेरिका से वापिस आया ,,, फटेहाल सा था। बाबूजी ने तो घर में घुसने से ही मना कर दिया ,, "अब क्या लेने आया है यहाँ ? " "मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई बाबूजी ,, मुझे माफ़ करदो। " मुझे उस गोरी ने धोखा दिया मेरा सारा पैसा लूट लिया ,,, मरवा डालती ,,, बड़ी मुश्किल से जान बचा कर आया हूँ। रो रोकर रघु ने माँ बाबूजी के पैर पकड़ लिए। तब माँ बोली "पैर पकड़ने है तो संध्या के पकड़,, तू उसका सबसे बड़ा अपराधी है ,,, अगर उसने तुझे माफ़ कर दिया तो ठीक वरना तुम्हारी इस घर में कोई जगह नहीं। संध्या भावविभोर हो रोये जा रही थी ,,, बरसो की आग बर्फ बन पिंघल रही थी। आज उसका चाँद विदेशी धरती से स्वदेश आया था। भारतीय नारी की यही महानता है वो एक बार जिसे अपना नाथ मान ले वो हमेशा के लिए अपने मन मंदिर में बसा लेती है।
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रोते रोते रघु संध्या के पाँव में झुकने लगा ,,, तब संध्या ने रघु के हाथ पकड़ लिए दोनों एक दूसरे को देखकर रोते रहे। "मेने इन्हे माफ़ किया माँ बाबूजी,,,कहकर रघु के कन्धे पर सर रख दिया।
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तुम्हारा दिल कितना महान है बेटी तब बाबूजी ने कहा। रघु ने यही मैनेजर की नौकरी कर ली और अगले तीन सालो में संध्या के आँगन में 2 फूल भी खिल गए।
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राहुल की भी शादी हो गयी थी। संध्या वर्तमान में लोट आयी ,, उस से बाबूजी का दर्द नहीं देखा जा रहा था ,, वो अभी तक एक भी आंसू नहीं बहा पाए थे ,,
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राहुल, पूजा , मेरे दोनों बच्चो सोनू और मोनू भी कोशिश कर चुके थे पर दादा जी बोलने का नाम नहीं ले रहे थे ,, उन्हें यकीं ही नहीं हो रहा था की रुक्मणि अब नहीं रही ,, संध्या ने बाबूजी को हौसला दिया ,, तब उनका आंसुओ का बांध टूट गया ,, सैलाब बहार आ गया। "बेटी क्या हम भूल पाएंगे उसको " "नहीं बाबू जी वो बहुत अच्छी थी ,, बल्कि है हम सबके साथ है ,, हमेशा रहेंगी। हरिद्वार सभी अस्थि विसर्जन को गए तो संध्या ने कहा माँ अगले जनम मुझे अपनी कोख से जनम देना
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