सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

गला काटना- ठग लेना

  सरिता बहु यदि तुम्हे इस घर में हिस्सा चाहिए तो जैसा मैं कहता हूं वैसा ही करो..... वरना छोटे को इसका आधा हिस्सा देकर तुम गांव के घर मे अपना हिस्सा ले लो। लेकिन याद रखो मैं तुम्हे कोई पैसा नही दे पाऊंगा यदि गांव के घर मे हिस्सा चाहिए तो वंही चलकर रहना पड़ेगा 5 वर्षीय बेटे का मुंह देख दीवार के सहारे टिककर बैठी ममता का मन तो किया कि चीख चीख कर रो पड़े। बेबसी और लाचारी रोने भी कंहा देती है मन मारकर उस छोटे से हिस्से में ही समझौता करना पड़ा। पति का साथ छूटने के बाद शायद औरत का संसार मे कोई नही रह जाता। कितने अरमान से सरिता और विक्रम गांव से निकलकर शहर आये थे। उन दिनों विक्रम इंदौर की एक रेडीमेड कपड़ो की फैक्ट्री में काम करता था सरिता भी घर के पास ही बुटीक में जाने लगी।पहले पहल तो यूं ही चली जाती, कभी फॉल लगाती, तो कभी हुक बटन टांक देती। धीरे धीरे अपनी मेहनत और लगन के बल पर मशीन चलाना सीखा और फिर कपड़े सिलने लगी। सरिता को बुटीक से जो आय होती वो घर खर्च में काम आ जाती और विक्रम अपनी तनख्वाह से कुछ पैसा बैंक में जमा करता जाता। कुछ वर्षों की मेहनत के बाद विक्रम ने शहर से थोड़ी दूरी पर एक छोटा सा...

जान पर भारी पड़ा शौक़

  “ क्या कह रही हो कनक बहू… दिमाग़ ठिकाने पर तो है।”  राजबाला जी बहू की बात सुन कर चिल्लाते हुए बोली  “ मैं सच कह रही हूँ मम्मी जी… रचिता से बात कर ही रही थी कि वो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी और उसके बाद मुझे बस घास मिट्टी दिख रही थी फिर फोन ही बंद हो गया लगता है उन दोनों को जंगली जानवर खा गए।” कहते हुए कनक दहाड़े मार कर रोने लगी  राजबाला जी बेटे जयंत को कॉल लगा रही थी उसका फ़ोन नॉट रिचेबेल बता रहा था परिवार के सभी सदस्य परेशान हो रहे थे तभी रात के ग्यारह बजे दरवाज़े की घंटी बजी … सामने जयंत और रचिता के सिर पर पट्टी बँधी देख सब हैरान हो गए। जयंत रचिता को सहारा देकर सोफे पर बिठाते हुए चेहरे पर ग़ुस्से के भाव लाते हुए कहा,” आज के बाद अगर तुम अपने फ़ोटो खिंचवाने के शौक़ को लेकर जंगल में गई तो याद रखना!!”  “ तौबा करती हूँ जयंत अब ये शौक़ फिर नहीं।” सिर झुकाए रचिता ने कहा सब दोनों को हैरानी से देख रहे थे। तब जयंत ने कहा,” आज इसके फ़ोटो खिंचवाने का शौक़ दोनों की जान ले लेता… राखी बाँध कर जब इसके घर से आ रहे थे तब रास्ते में जो जंगल पड़ता है उधर मैडम फ़ोटो खिंचवाने उतर ग...

नाजों पली

  कॉलोनी के पार्क मे सुबह आसपास के काफी लोग आया करते थे । ज्यादातर बड़े बूढ़े वहाँ थोड़ा घूम कर बतियाने लगते , जवान दौड़ लगाते या व्यायाम करते और बच्चे साइकिल चलाते या कुछ ना कुछ खेल खेलते ।  ऐसे ही एक सुबह बड़े बूढ़े आपस मे बतिया रहे थे । उनमे कुछ 70-80 साल के भी थे और कुछ ऐसे थे जो रिटायरमेंट के नजदीक थे।  " शर्मा जी छोटी बिटिया के लिए कोई रिश्ता बताइये ना जिससे हम निफराम हो गंगा नहा कर आ जाये !" मिस्टर वर्मा एक दूसरे व्यक्ति से बोले।  " हाँ भाई रिटायरमेंट नजदीक है उससे पहले ये काम हो जाये तो अच्छा है !" दूसरे व्यक्ति जो वर्मा जी के साथ ही काम करते थे और उनकी ही उम्र के थे बोले।  " कैसा लड़का चाहिए तुम्हे अपनी बिटिया के लिए ?" शर्मा जी ने पूछा। " शर्मा जी बिटिया बैंक मे नौकरी करती है , छोटी है इसलिए बहुत नाज़ो से पाला है हमने उसे तो लड़का ऐसा हो जो अच्छा कमाता हो , पत्नी को बराबर का सम्मान देता हो वो क्या है ना हमारी बिटिया को सुनना पसंद नही । अब भई पढ़ी लिखी कमाऊं लड़कियां कहाँ सुनती है आजकल !" वर्मा जी आखिरी लाइन बोलते हुए ठहाका लगा पड़े ।  " देखिये...

निर्णय

  श्रद्धा ने राहुल को बहुत समझाया था, जल्दबाजी में कोई निर्णय मत लो।  मगर जैसे राहुल पर कोई भूत सवार था। वह श्रद्धा की कोई बात नहीं मान रहा था। श्रद्धा समझा-समझा कर थक चुकी थी। वह बिल्कुल नहीं चाहती थी कि राहुल जल्दबाजी में कोई भी निर्णय ले और फिर पछताए।  श्रद्धा और राहुल दोनों बहुत अच्छे मित्र थे । स्कूली पढ़ाई से लेकर कॉलेज और उसके बाद एक ही कंपनी में जॉब लगभग 12 वर्षों का उनका साथ था। साथ रहते-रहते कब अच्छे मित्र से और ही करीबी रिश्ते की और बढ़ चले पता ही ना चला।  दोनों को जॉब करते हुए 2 वर्ष हो चुके थे। श्रद्धा चाहती थी कि अब उन्हें शादी का निर्णय ले लेना चाहिए।   राहुल को उसके इस निर्णय से कोई एतराज नहीं था। मगर दोनों के मध्य एक समस्या आन खड़ी हुई थी। राहुल के सर पर जॉब छोड़कर छोड़कर नया स्टार्ट अप करने का भूत सवार था। श्रद्धा उसे पिछले कई महीनो से यह समझाने का प्रयास कर रही थी इस स्टार्टअप के लिए जॉब मत छोड़ो। स्टार्टअप चाहते ही हो तो जॉब के साथ-साथ करो। कहीं ना कहीं श्रद्धा को यह स्टार्ट अप सफल होगा इसमें संशय था। उसने राहुल को कई कारण बताए थे मगर राहुल ए...

चटपटी बात

  शहर के बीचोंबीच एक पुराना मोहल्ला था — तंग गलियाँ, छतों पर सूखते कपड़े, और हर नुक्कड़ पर बैठी गॉसिप की यूनियन। वहाँ की क्वीन थी – श्यामा चाची , जिनका काम था हर छोटी बात को बड़ी बनाकर पेश करना, यानी हर बात में भरपूर नमक-मिर्च लगाना। एक दिन मोहल्ले के शर्मा जी सुबह-सुबह टैक्सी लेकर निकले। बात बस इतनी थी कि उन्हें अपने रिश्तेदार को स्टेशन से लाना था। लेकिन श्यामा चाची की नजरें सब पर रहती थीं। उन्होंने खिड़की से देखा और आँखें चौड़ी कर लीं। दोपहर तक ख़बर फैल चुकी थी – “शर्मा जी कोई गुप्त ऑपरेशन के सिलसिले में शहर से बाहर जा रहे हैं!” शाम होते-होते चाची ने इसका मसालेदार संस्करण बना दिया – “सुनो-सुनो! शर्मा जी की बहू मायके चली गई है, और वो वकील से मिलने निकले थे!” दूसरे दिन मोहल्ले की महिलाओं ने शर्मा जी की पत्नी को घेर लिया – “बहन जी, सब ठीक तो है? सुना है घर में कुछ अनबन चल रही है?” बेचारी शर्मा अंटी तो चकरा ही गईं। तीसरे दिन शर्मा जी खुद सामने आए और बोले, “भाइयों, मैं तो बस स्टेशन गया था। आप लोग तो मुझे कोर्ट-कचहरी तक पहुँचा दिए!” श्यामा चाची हँसते हुए बोलीं, “अरे भैया, बातें तो बाते...

आग में घी डालना

  "प्ररेणा तुम हमेशा किताबों में क्यों घुसी रहती हो??  कभी-कभी घर के कामों में भी हाथ बटा दिया करो दिन भर कॉलेज में रहो और जब घर आओ तो क़िताब लेकर बैठ जाओ, घर के काम के लिए  मैं और तुम्हारी बड़ी बहन तो है ही बस तुम महारानी की तरह बैठ कर राज करो" प्रेरणा की मां सरला जी ने  व्यंग्यात्मक लहजे में कहा| "मां मैं आ रही हूं!! कुछ लिख रही थी, बस खत्म हो गया है" प्रेरणा ने जल्दी से कहा और लिखना बंदकर अपनी मां के पास आ गई। "क्या काम है मां??" उसने मुस्कुराते हुए पूछा| "मेरा सर फोड़ना है फोड़ दे " सरला जी ने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा| "मां आप प्रेरणा पर क्यों चिल्ला रहीं हैं ये तो चिकना घड़ा है इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा इसे तो कलेक्टर बनना है ये घर का काम क्यों करेंगी पिताजी ने इसे सिर पर चढ़ा लिया है इसलिए ये आपकी बात नहीं सुनती " प्रेरणा की बड़ी बहन कुसुम ने व्यंग से कहा कुसुम ने अपनी मां के गुस्से को और भड़का दिया इस समय उसने आग में घी डालने का काम किया। अपनी बहन की बात सुनकर प्रेरणा को भी गुस्सा आ गया जबकि वो बहुत शांत स्वभाव की है। आज अपनी ...

क्या किसी का दुःख किसी और की खुशी छीनकर कम होता है?

  घर में हँसी-खुशी का माहौल था। रिटायर्ड मास्टर रामकिशन जी का छोटा बेटा रोहित और उसकी पत्नी कविता पाँच साल बाद माता-पिता बनने वाले थे। घर में सब कुछ नया सा लग रहा था — आने वाले मेहमान के स्वागत की तैयारी हर कमरे में झलक रही थी। बड़ी बहू मीना, जो दस साल से शादीशुदा थी लेकिन अब तक संतान सुख से वंचित थी, वह भी पूरे दिल से इस आने वाले बच्चे के लिए खुश थी। या शायद... वो खुश दिखने की कोशिश कर रही थी। बड़ी बहू मीना का स्वभाव सीधा-सादा था, लेकिन सास विमला देवी को उसकी हर बात में कमी दिखती। जबकि रोहित और कविता आते ही घर के लाड़ले बन गए थे। कविता पढ़ी-लिखी, स्मार्ट और बातों की तेज़ थी — वही विमला देवी को बहुत पसंद आई थी। धीरे-धीरे घर का संतुलन बदलने लगा। जब कभी भी मीना कुछ कहती, तो विमला देवी उसे डाँट देतीं — “तू तो बस दूसरों की खुशियों में खलल डालना जानती है। कुछ अच्छा बोलना आता भी है?” और कविता, जो सास के हर ताने पर मीठी मुस्कान दे देती, सबका मन जीत लेती। कभी-कभी मीना सोचती — क्या मेरा सीधापन मेरी गलती है? दिन बीतते गए, और कविता का गर्भ बढ़ता गया। घर में हर दिन पूजा, टोने, और खुशियों की ब...