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संदेश

ईश्वरीय न्याय

      अरे कुल कलंक,बता तो हमने क्या गुनाह किया था,जो हमे ऐसी जिल्लत दिला रहा है?      पर बाबूजी,आखिर मैंने किया क्या है?जो मुझे आप ऐसा कह रहे हैं।       बेशर्म हम तो मुँह से कह भी नही सकते।देख साफ सुन ले अपनी करनी को खुद भुगत,अब तेरा हमसे कोई वास्ता नही।तेरा जहां जी आये वहां रह,हमसे कोई उम्मीद मत रखना।       शिवशंकर दयाल जी अपने नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे।उनका पुत्र वैभव प्रतिभाशाली  छात्र तो था ही,पर सबसे बड़ी बात थी उसका रुझान सामाजिकता समन्यता पर भी था, सोच भी सांस्कृतिक रुचि पर आधारित थी।वैभव की उसी के अनुरूप सोच रखने वाले निशांत से मित्रता थी।दोनो सामाजिक हित के कार्यो की चिंता करते रहते।एक दूसरे के घर आना जाना दोनो के लिये सामान्य था।निशांत की मां तो वैभव को अपना दूसरा बेटा ही मानती थी।शिवशंकर दयाल जी को वैभव की इस प्रकार की सोच और कार्य उचित नही लगते थे,उनका मानना था कि वैभव चूंकि अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका है तो उसे अपने व्यापार में रुचि लेनी चाहिये।अपनी इच्छा को ...

अपनी करनी पार उतरनी

  कविता अपनी करनी के कारण काँच की तरह टूटकर बिखर चुकी है। निराशा औरअवसाद का अँधेरा उसकी जिन्दगी में घर कर चुका है।उसकी आँखों में जब-तब दर्द की लहर आ गुजरती है,जिसे मुश्किल से छुपाकर होठों पर मुस्कान ला पाती है।दूसरी बार भी आई.वी.एफ असफल होने पर  कविता के आँखों के आँसुओं का बाँध टूट गया था।वह बहुत  देर तक पति पंकज की बाँहों में सिसकती रही। जीवन में सफलता की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ती कविता को अपना कैरियर छोड़कर किसी अन्य बात की रत्तीभर भी चिन्ता नहीं थी।एक-दो बार उसके पति पंकज ने कहा भी था -" कविता!बहुत हो चुका।अब हमें परिवार बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए!" पति की बातों पर बिफरते हुए कविता ने कहा -" पंकज!तुम्हें पता है कि अगले साल मेरा प्रमोशन होनेवाला है।दफ्तर की सबसे ऊँची कुर्सी पर पहुँचने का मेरा ख्वाब पूरा होगा और तुम चाहते हो कि ऐसे समय में मैं मातृत्व के बंधन में जकड़ जाऊँ?" कविता से बहस न करते हुए  पंकज खामोश हो गया।कविता पूर्व में दो बार एबाॅर्शन करा चुकी थी।उसे तरक्की में मातृत्व बंधन -सा महसूस होता था।अगले साल कविता का प्रमोशन हो गया।उसने खुशी में पार्टी रखी थी।उसके...

स्वर्ग यहां-नरक यहां

  दीपावली की लंबी छुट्टी मिली थी स्वाति को।ऊपर से बेटी भी आ रही थी।उसके आ जाने से त्योहार की भागदौड़ नहीं करनी पड़ती थी स्वाति को। आते ही फरमान जारी हो गया उसका"मम्मी,इस बार दीवाली में कांजीवरम साड़ी ही पहनना पड़ेगा।पापा के दिए झुमके भी निकाल दूंगी।मैं भी पायल पहन ही लूंगी।सारे काम समय से निपटा लेना इस बार।दादा(बड़ा भाई)जब पटाखा फोड़े तो तुम्हें भी देखना है।"स्वाति की बक-बक सुन स्वाति हूं हूं करती जा रही थी।जानती थी,यह अड़ियल मानेगी तो नहीं।पापा की कमी यही पूरी करती है।जैसे उन्हें शौक था पत्नी को सजी-धजी देखना,वैसे ही इसे भी है।दो दिन के अंदर घर की कायापलट कर दी थी बेटी(शिखा)ने।दादी की साड़ी,भाई का कुर्ता पायजामा और अपनी लांग स्कर्ट सुबह से निकाल कर रख लिया था। स्वाति ने रात के खाने के लिए पालक पनीर और चिली मशरूम भी बना लिया था शाम को ही।पालक पनीर दादी और पोती का फेवरिट और चिली मशरूम पोते का। संध्या बाती के समय करीने से सारे दिए सजा-सजाकर भाई को पकड़ाती हुई शिखा स्वाति को तैयार होने की चेतावनी भी दिए जा रही थी।इस दिन बंगाली लोग काली पूजा करते हैं।स्वाति के घर से काफी दूर होती...

*सारथी*

  आखिर रामदीन और उसकी पत्नी यशोदा की तपस्या पूरी हो ही गयी।आज उनका बेटा शेखर शहर में एक बड़े अफसर के रूप में नियुक्त हो गया था।उसकी पढ़ाई लिखाई के लिये रामदीन और यशोदा ने क्या क्या पापड़ नही बेले।यशोदा ने बरतन और झाड़ू पोछे के लिये चार घर पकड़ लिये थे,रामदीन एक भट्टे पर मजदूरी करता ही था।भगवान ने बस एक ही औलाद उन्हें दी थी।शेखर नाम रखा था उन्होंने।रामदीन की हार्दिक इच्छा थी कि उनका बेटा उनकी तरह मजदूरी न करे।अधिक तो उसे पता नही था,बस सोचता, बेटा और कुछ भी नही तो कही कम से कम बाबू तो बन ही जाये।यही आकांक्षा रामदीन को सोने नही देती।         शेखर पढ़ाई लिखाई में होशियार निकला।प्रथम श्रेणी में पास होते रहने के कारण फीस भी माफ रही,बाद में वजीफा भी मिलने लगा।शेखर की पढ़ाई लिखाई में रुचि और उसका रिजल्ट कार्ड देख रामदीन का सीना चौड़ा हो जाता।शेखर भी अपने पिता की आकांक्षा को भी समझता था और उनके द्वारा उसके लिये अपना सबकुछ झोंकने को भी समझता था।इसी कारण वह भी रात दिन मेहनत करता ताकि पिता के सपने को पूरा कर सके।         ...

अपनी पगड़ी अपने हाथ

  रमाकांत और उमाकांत दो भाई  थे।दोनों भाईयों में आपस में बहुत प्रेम था।बड़े भाई रमाकांत पढ़-लिखकर असाम में शिक्षक की नौकरी करने चले गए। उनका परिवार भी साथ रहता था।उनके माता-पिता छोटे बेटे के साथ गाँव में रहते। थे।छोटा उमाकांत गाँव में खेती-बाड़ी सँभालता था।छोटे भाई की पत्नी  कविता जबान की बहुत तेज थी।जब तब सास-ससुर का अपमान करती रहती।सास-ससुर 'अपनी पगड़ी अपने हाथ' समझकर खामोश रहतें। रमाकांत के बच्चे जबतक छोटे थे,तबतक वे छोटे भाई की खूब आर्थिक मदद करते।बीच-बीच में अधिक पैसे भेजकर भाई को कहते -" छोटे!मैं जब ज्यादा पैसे भेजूँ,तो पिताजी के नाम जमीन लिखवा लिया करो,क्योंकि रिटायर्मेंट के बाद  मैं गाँव आकर ही रहूँगा।" छोटा भाई रमाकांत की बातों में हाँ-में-हाँ मिलाते हुए कहता -"ठीक है भैया।सबकुछ आपके कथनानुसार ही करूँगा। बच्चों  की पढ़ाई और दूर रहने के कारण रमाकांत बहुत  कम ही गाँव आ पाते और आते भी तो जाने की जल्दी रहती थी।इस कारण वस्तुस्थिति की जानकारी उन्हें नहीं रहती। उमाकांत  माता-पिता को भी किसी बात की जानकारी नहीं होने देता।अपनी पत्नी कविता के बहकावे में...

*करनी अपनो की*

      भैय्या, आप तो नौकरी में बाहर ही रहते हो,चाचा अब रहे नही,तो इस खेती बाड़ी को कौन देखेगा?       हां-हाँ ये बात तो है,कुछ सोचना तो पड़ेगा।        भैय्या, आप यदि इजाजत दे  तो आपकी जमीन को मैं बो और काट लूंगा।आपकी दोनो बेटियों की शादियों की जिम्मेदारी हमारी।आपके कारण हमारा भी काम चल जायेगा।           रविन्द्र को अपने चचेरे भाई धर्मबीर के प्रस्ताव में कोई बुराई नजर नही आयी।जमीन रविन्द्र बेचना भी नही चाहते थे,और देखभाल कर नही सकते थे।दोनो बेटियों की शादियों से निश्चिंतता भी कोई कम बड़ी बात तो थी नही।रविन्द्र वैसे भी चचेरा भाई था,घर की बात थी,सो रविन्द्र जी ने धर्मबीर को अपनी जमीन पर जुताई बुआई की अनुमति दे दी।अविश्वास की कोई  बात थी नही,सो कोई लिखत पढ़त भी करने की  दोनो ओर से जरूरत नही समझी गयी।          रविन्द्र का अच्छा बड़ा मकान जो सब सुविधाओ से युक्त था,गाँव मे स्थित था,सो वह साल में एक दो बा...

बालभोज

  बालदिवस है कुछ खास करो वरिष्ठ शिक्षक रामप्रसाद जी ने बालदिवस आयोजन की मीटिंग शुरू होते ही उपस्थित छात्र प्रतिनिधियों की तरफ देखते हुए कहा। जी सर ... वो ...हम लोग भोज का आयोजन करना चाहते हैं जिसे हम बच्चे ही बनाएंगे छात्र प्रतिनिधि रोहित ने जल्दी से अपनी बात रखी। बहुत बढ़िया प्रस्ताव है सावित्री मैडम ने उत्साह से कहा। लेकिन उसमें एक दिक्कत आ रही है मैम नेहा ने जल्दी से कहा। क्या दिक्कत है बताओ मैने संस्था प्रधान और मीटिंग हेड के बतौर पूछा। मैडम सारे बच्चे पैसे नहीं दे रहे हैं कुछ के पास है ही नहीं और कुछ देना ही नहीं चाहते हैं रोहित ने खुल कर बताया। हुंह सब बहानेबाजी है अभिभावकों की सारे विद्यार्थियों को रुपए देने ही पड़ेंगे ऐसा क्या खजाना मांगा जा रहा है कौन कौन नहीं दे रहा है मुझे बताओ सबक सिखाता हूं  रामप्रसाद सर एकदम नाराज़ हो गए। हां सब विद्यार्थियों को देना पड़ेगा देना ही चाहिए सभी शिक्षक समवेत स्वर में कह उठे नहीं तो दंड दिया जाएगा आखिर भोजन भी तो करेंगे सब। मीटिंग में कोलाहल तेज हो गया और पैसा नहीं देने वाले छात्रों के नाम लिखे जाने लगे। सुनिए  मेरा भी एक प्रस्ता...