अरे कुल कलंक,बता तो हमने क्या गुनाह किया था,जो हमे ऐसी जिल्लत दिला रहा है? पर बाबूजी,आखिर मैंने किया क्या है?जो मुझे आप ऐसा कह रहे हैं। बेशर्म हम तो मुँह से कह भी नही सकते।देख साफ सुन ले अपनी करनी को खुद भुगत,अब तेरा हमसे कोई वास्ता नही।तेरा जहां जी आये वहां रह,हमसे कोई उम्मीद मत रखना। शिवशंकर दयाल जी अपने नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे।उनका पुत्र वैभव प्रतिभाशाली छात्र तो था ही,पर सबसे बड़ी बात थी उसका रुझान सामाजिकता समन्यता पर भी था, सोच भी सांस्कृतिक रुचि पर आधारित थी।वैभव की उसी के अनुरूप सोच रखने वाले निशांत से मित्रता थी।दोनो सामाजिक हित के कार्यो की चिंता करते रहते।एक दूसरे के घर आना जाना दोनो के लिये सामान्य था।निशांत की मां तो वैभव को अपना दूसरा बेटा ही मानती थी।शिवशंकर दयाल जी को वैभव की इस प्रकार की सोच और कार्य उचित नही लगते थे,उनका मानना था कि वैभव चूंकि अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका है तो उसे अपने व्यापार में रुचि लेनी चाहिये।अपनी इच्छा को ...
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