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*सारथी*

 आखिर रामदीन और उसकी पत्नी यशोदा की तपस्या पूरी हो ही गयी।आज उनका बेटा शेखर शहर में एक बड़े अफसर के रूप में नियुक्त हो गया था।उसकी पढ़ाई लिखाई के लिये रामदीन और यशोदा ने क्या क्या पापड़ नही बेले।यशोदा ने बरतन और झाड़ू पोछे के लिये चार घर पकड़ लिये थे,रामदीन एक भट्टे पर मजदूरी करता ही था।भगवान ने बस एक ही औलाद उन्हें दी थी।शेखर नाम रखा था उन्होंने।रामदीन की हार्दिक इच्छा थी कि उनका बेटा उनकी तरह मजदूरी न करे।अधिक तो उसे पता नही था,बस सोचता, बेटा और कुछ भी नही तो कही कम से कम बाबू तो बन ही जाये।यही आकांक्षा रामदीन को सोने नही देती।

        शेखर पढ़ाई लिखाई में होशियार निकला।प्रथम श्रेणी में पास होते रहने के कारण फीस भी माफ रही,बाद में वजीफा भी मिलने लगा।शेखर की पढ़ाई लिखाई में रुचि और उसका रिजल्ट कार्ड देख रामदीन का सीना चौड़ा हो जाता।शेखर भी अपने पिता की आकांक्षा को भी समझता था और उनके द्वारा उसके लिये अपना सबकुछ झोंकने को भी समझता था।इसी कारण वह भी रात दिन मेहनत करता ताकि पिता के सपने को पूरा कर सके।

          ईश्वर ने उन सबकी सुनी,शेखर की मेहनत भी रंग लायी और उसने बैंक की प्रोबेशन ऑफीसर प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त कर ली।शेखर की नियुक्ति पास के शहर के बैंक ने असिस्टेंट मैनेजर की पोस्ट पर  भी हो गयी। अब शेखर घर पर अवकाश के दिन ही आ पाता था।

      एक रविवार को शेखर से  सहकर्मियों ने उससे दावत मांगी,तो उसने उन्हें अपने शहर के फ्लैट मे ही आमंत्रित कर लिया।पिता को रविवार को घर न आ पाने की सूचना दे दी।रामदीन के मन मे विचार आया कि जिंदगी भर उनका तो हाथ ही फैला रहा है, आज बेटा इस लायक हुआ है कि वह दावत दे रहा है, रामदीन का मन गद गद हो गया।उसके मन मे विचार आया कि वह भी अपने बेटे के रुतबे को अपनी आंखों से देखे,सो बिना शेखर को बताये रामदीन शहर पहुंच गया।बेटे के घर पहुंचकर उसने अंदर गहमा गहमी देखी,बाहर खिड़की से झांककर से झांका तो अंदर संगीत की लहरी चल रही थी, उस पर शेखर के साथी झूम रहे थे।रामदीन अपने बेटे पर गर्व महसूस कर रहा था।

       रामदीन अंदर जाने के लिये जैसे ही दरवाजे की ओर बढ़ा उसे झटका सा लगा।उसके मन मे आया ठीक है बेटा अफसर बन गया,उनकी मुराद पूरी हो गयी,पर वह तो मजदूर ही है, उसका पहनावा भी वैसा ही है, यदि वह अंदर गया तो शेखर को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी,उसने पहले सुना भी था ऐसी स्थिति में बच्चे अक्सर अपने बाप को पहचानने से भी मना कर देते हैं या अपना नौकर ही बता देते हैं।ऐसी स्थिति आयी तो वह क्या करेगा,उस अपमान को कैसे सहन कर पायेगा।बेटे के स्नेह का भ्रम भी टूट जाएगा।ऐसे गहरे जख्म को लेकर कैसे जी पायेगा।भ्रम बना रहे इसलिये अच्छा है वह अंदर न जाकर गांव ही लौट जाये। नम आंखों के साथ रामदीन के पावँ बाहर गेट की ओर बढ़ चले।

       बापू---कहाँ जा रहे हो,बिना मिले ऐसे ही? चौंक कर रामदीन ने देखा यह तो शेखर की आवाज थी,पता नही उसकी निगाह उस पर पड़ गयी थी।उसके कदम रुक गये।रामदीन बोला बेटा बस ऐसे ही आ गया था,तू चिंता मत कर,अपने साथियों के पास जा,मैं  गांव वापस जा रहा हूँ। बापू आओ मेरे साथ,शेखर ने तो अपने बापू का हाथ पकड़ कर उन्हें अंदर ही लिवा लाया और अपने सब साथियों से बोला,सुनो भाइयो ये मेरे बापू हैं, इनकी तपस्या के बल पर ही मैं आज हूँ।

      अवाक सा रामदीन कभी अपने शेखर के चेहरे को देख रहा था तो कभी वहां उपस्थित शेखर के साथियों को।रामदीन को कुछ सूझ ही नही रहा था कि वह क्या कहे,बस उसकी आँखों से आंसू जरूर बह रहे थे।शेखर ने पिता के आँसुओं को देख पिता को अपनी बाहों में समेट लिया,बापू क्या मैंने गलत कहा?सात जन्म तक भी बापू तेरा ऋण नही चुका सकता।

     रामदीन को लग रहा था कि वह हवाई रथ पर सवार है और उस रथ का सारथी है उसका बेटा शेखर।

बालेश्वर गुप्ता,नोयडा

मौलिक एवं अप्रकाशित


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