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ईश्वरीय न्याय

     अरे कुल कलंक,बता तो हमने क्या गुनाह किया था,जो हमे ऐसी जिल्लत दिला रहा है?

     पर बाबूजी,आखिर मैंने किया क्या है?जो मुझे आप ऐसा कह रहे हैं।

      बेशर्म हम तो मुँह से कह भी नही सकते।देख साफ सुन ले अपनी करनी को खुद भुगत,अब तेरा हमसे कोई वास्ता नही।तेरा जहां जी आये वहां रह,हमसे कोई उम्मीद मत रखना।

      शिवशंकर दयाल जी अपने नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे।उनका पुत्र वैभव प्रतिभाशाली  छात्र तो था ही,पर सबसे बड़ी बात थी उसका रुझान सामाजिकता समन्यता पर भी था, सोच भी सांस्कृतिक रुचि पर आधारित थी।वैभव की उसी के अनुरूप सोच रखने वाले निशांत से मित्रता थी।दोनो सामाजिक हित के कार्यो की चिंता करते रहते।एक दूसरे के घर आना जाना दोनो के लिये सामान्य था।निशांत की मां तो वैभव को अपना दूसरा बेटा ही मानती थी।शिवशंकर दयाल जी को वैभव की इस प्रकार की सोच और कार्य उचित नही लगते थे,उनका मानना था कि वैभव चूंकि अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका है तो उसे अपने व्यापार में रुचि लेनी चाहिये।अपनी इच्छा को उन्होंने एक दो बार वैभव के सामने कहा भी।

     उधर निशांत की बहन पल्लवी वैभव को भी भाई रूप में ही मानती थी।उसका प्रेम अपने एक सहपाठी माही से चल रहा था।पता नही किन कमजोर क्षणों में वे खुद कमजोर हो गये और अनहोनी कर बैठे।कमजोरी का परिणाम का जब पता चला तब तक माही दो वर्ष के लिये उच्च शिक्षा हेतु विदेश जा चुका था।

      पल्लवी का बढ़ता पेट दुनिया से थोड़े ही छिपता,माँ को उसने साफ साफ बता दिया।निशांत ने विदेश में गये माही से फोन पर सम्पर्क किया तो उसने इस सब से कन्नी काट ली,और दो वर्ष बाद ही भारत वापस आने को कहा।पल्लवी ने गर्भपात कराने को मना कर दिया।पूरा परिवार एक भयानक तनाव से गुजर रहा था,जिसका कोई समाधान उनके पास नही था।पल्लवी के गर्भवती होने की बात घर से बाहर निकली तो सबका शक वैभव पर ही गया।उनके घर तो आना जाना वैभव का ही था।वैभव अपनी सफाई किस किस को दे,वैसे भी अफवाह की गति इतनी तेज होती है कि साधारण मानव उससे पार नही पा सकता।अफवाह चली तो वैभव के पिता के पास भी पहुँची तो उन्हें भी लगा कि सामाजिक सेवा की आड़ में उनके बेटे ने ही जरूर ये गुल खिलाया है,और वे वैभव पर भड़क गये और उसे तिरस्कृत कर दिया।

      वैभव के सामने चुनौती थी अपने को बेगुनाह सिद्ध करने और पल्लवी के जीवन को सुधारने की।माही विदेश में था तो क्या करे? वैभव ने माही के पिता से संपर्क किया।इत्तेफाक से माही के पिता रघुवंश जी बहुत ही सुलझे विचारों के थे और उन्हें एक सामाजिक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि वैभव और निशांत ने ही आमंत्रित किया था।वे वैभव से प्रभावित भी थे।वैभव ने रघुवंश जी को माही के पिता के रूप में पाया तो वह नही समझ पा रहा था कि कैसे उनसे बात करे?फिर भी वैभव ने कहा सर आप मुझे जानते हैं, क्या जो कुछ मैं आपसे कहूँ क्या उस पर आप यकीन करेंगे? शत प्रतिशत-रघुवंश जी बोले। और वैभव ने माही और पल्लवी की पूरी बात उनके समक्ष रख दी।उन्होंने समझ लिया कि वैभव सच बोल रहा है।रघुवंश जी ने वैभव को आश्वस्त कर वापस भेज दिया।

      रघुवंश जी ने माही से संपर्क कर तुरंत भारत आने का आदेश दे दिया।माही को आना पड़ा।माही ने अपने पिता से कहा बाबूजी मैं आपके डर के कारण मैं भीरू बन गया था,अन्यथा वह भी पल्लवी से प्यार करता है और उससे शादी करने को तैयार है।

     रघुवंश जी ने दोनो की शादी पक्की कर दी।रघुवंश जी ने वैभव के पिता से भी बात कर उनकी गलतफहमी दूर कर दी।वैभव को आज विश्वास हो गया था कि वह सही था,उसकी करनी सही थी तभी तो ईश्वर ने भी उसका साथ दिया।वैभव के पिता ने भी उसे गले से लगा लिया।

बालेश्वर गुप्ता,नोयडा

मौलिक एवम अप्रकाशित।


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