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अपनी पगड़ी अपने हाथ

 रमाकांत और उमाकांत दो भाई  थे।दोनों भाईयों में आपस में बहुत प्रेम था।बड़े भाई रमाकांत पढ़-लिखकर असाम में शिक्षक की नौकरी करने चले गए। उनका परिवार भी साथ रहता था।उनके माता-पिता छोटे बेटे के साथ गाँव में रहते। थे।छोटा उमाकांत गाँव में खेती-बाड़ी सँभालता था।छोटे भाई की पत्नी  कविता जबान की बहुत तेज थी।जब तब सास-ससुर का अपमान करती रहती।सास-ससुर 'अपनी पगड़ी अपने हाथ' समझकर खामोश रहतें।


रमाकांत के बच्चे जबतक छोटे थे,तबतक वे छोटे भाई की खूब आर्थिक मदद करते।बीच-बीच में अधिक पैसे भेजकर भाई को कहते -" छोटे!मैं जब ज्यादा पैसे भेजूँ,तो पिताजी के नाम जमीन लिखवा लिया करो,क्योंकि रिटायर्मेंट के बाद  मैं गाँव आकर ही रहूँगा।"

छोटा भाई रमाकांत की बातों में हाँ-में-हाँ मिलाते हुए कहता -"ठीक है भैया।सबकुछ आपके कथनानुसार ही करूँगा। बच्चों  की पढ़ाई और दूर रहने के कारण रमाकांत बहुत  कम ही गाँव आ पाते और आते भी तो जाने की जल्दी रहती थी।इस कारण वस्तुस्थिति की जानकारी उन्हें नहीं रहती।


उमाकांत  माता-पिता को भी किसी बात की जानकारी नहीं होने देता।अपनी पत्नी कविता के बहकावे में आकर उसने बड़े भाई के भेजे पैसों से पत्नी के नाम जमीन खरीद ली थी।रमाकांत की माता तो पहले ही गुजर चुकी थीं,पिता के निधन पर  जब वे गाँव  आए  थे, तब बनावटी प्यार दिखाते हुए उमाकांत सदैव भाई  के साथ ही बना रहता।गाँववालों से कभी अकेले मिलने नहीं दिया।रमाकांत भी छोटे भाई पर आँख मूँदकर विश्वास करते थे,इस कारण उन्हें कभी अपने छोटे भाई पर कोई शक नहीं था।


पिता के क्रिया-कर्म खत्म होने  पर रमाकांत ने अपने भाई से कहा -" छोटे! अपना मकान बहुत पुराना हो चुका है।मैं रिटायर्मेंट के पैसे भेजूंगा,खाली जगह पर चार कमरे बनवा लेना।दो तुम्हारे और दो मेरे!"

उमाकांत ने कहा -"  भैया!ठीक है।"


असम जाने पर रमाकांत घर बनवाने के लिए  छोटे भाई  को पैसे भेजते रहें,परन्तु घर का काम ही नहीं खत्म होता था।एक दिन झल्लाकर रमाकांत ने फोन पर कहा -"छोटे!मेरे रिटायर्मेंट के सारे पैसे खत्म हो रहें हैं और घर का काम ही खत्म नहीं हो रहा है?"

उमाकांत ने मँहगाई का रोना रोते हुए कहा -"  भैया!अब बस काम खत्म ही होनेवाला है।"


रमाकांत ने गुस्से में कहा-"छोटे!अब काम बंद कर दो।मैं कुछ दिनों बाद आ रहा हूँ।मैं खुद बाकी काम करवाऊँगा।"


कुछ दिनों बाद जब रमाकांत रिटायर्मेंट के बाद गाँव रहने आएँ ,तो घर देखकर उनके होश उड़ गए। तीन कमरे,बाथरूम, रसोई तो अच्छी तरह बन चुके थे,उन्हें छोटे भाई के दो बेटे-बहू कब्जा कर चुके थे।एक में उनका छोटा भाई रह रहा था।एक कमरा आधा-अधूरा उनके लिए छोड़ दिया था।अपने भाई की बदनीयति देखकर रमाकांत पति-पत्नी अचंभित हो उठे।उनकी पत्नी शीला ने गुस्से से तमतमाते हुए बोलना शुरु किया,परन्तु रमाकांत ने पत्नी को रोकते हुए कहा -" शीला!इन बेईमानों से मुँह मत लगो।अपनी पगड़ी अपने हाथ में है।अभी पुराने घर में सामान रखवाओ।बाद में मैं गाँव के पंचों और वकील का सहारा लूँगा।"


रमाकांत  रिश्तों में गहराती दरारों और छल-कपट से मर्माहत थे,परन्तु अपनी इज्जत का ख्याल  कर खामोश बने रहें।कुछ दिनों बाद गाँव में पंचायत  ने दोनों भाईयों की दलीलें सुनी और फैसला देते हुए कहा -"घर चूँकि रमाकांत के पैसों से बने हैं,इस कारण चारों कमरे रमाकांत के हैं।रमाकांत अगर चाहे तो एक कमरा अपने छोटे भाई को दे सकते हैं।सारी जमीन दो हिस्से में बाँटी जाएगी।उमाकांत की पत्नी के नाम की जमीन के भी दो हिस्से होंगे।"

उमाकांत के पास पंचों का फैसला मानने के सिवा कोई चारा नहीं था। उसका सर शर्म से झुक गया।बेईमानी की रेतीली  जमीन पर उसे अपने कर्मों का हिसाब तो देना ही था।


रमाकांत ने अपनी पत्नी से कहा -"शीला!तुमने देखा?अपनी पगड़ी अपने हाथ में रह गई और पंचों का न्यायपूर्ण फैसला भी हो गया!"

शीला ने मायूसी से कहा -"आपकी बात सच है,परन्तु बेईमानी के कारण आपसी रिश्तों की गर्माहट तो खत्म हो गई?

पत्नी की बात सुनकर रमाकांत की आँखों के कोर भींग उठे।

समाप्त। 

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)


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