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संदेश

**सूनी चौखट और एक माँ का संकल्प**

  अस्पताल से घर तक का वो आधे घंटे का सफर देविका को किसी अंतहीन और भयानक सज़ा की तरह लग रहा था। कार की पिछली सीट पर बैठी देविका की गोद में एक गुलाबी रंग के तौलिए में लिपटी उसकी नवजात बच्ची सो रही थी। देविका के शरीर का पोर-पोर दर्द से चीख रहा था। बारह घंटे की भयंकर प्रसव पीड़ा और उसके बाद हुए ऑपरेशन के टाँकों का दर्द अभी भी ताज़ा था। लेकिन उस शारीरिक दर्द से कहीं ज्यादा बड़ा दर्द उस खामोशी का था, जो इस कार के अंदर और उसके पति विकास के चेहरे पर पसरी हुई थी। विकास जो ड्राइविंग सीट पर बैठा था, उसने पूरे रास्ते एक बार भी पीछे मुड़कर अपनी बेटी का चेहरा तक नहीं देखा। उसकी आँखें सड़क पर थीं, लेकिन माथे पर पड़ी सिलवटें बता रही थीं कि वह किसी गहरी निराशा में डूबा है।  गाड़ी उनके पुश्तैनी घर के दरवाज़े पर आकर रुकी। देविका ने बहुत मुश्किल से अपने कांपते हुए पैरों को ज़मीन पर रखा। बच्ची को सीने से लगाए हुए वह धीरे-धीरे घर की चौखट की तरफ बढ़ी। उसकी उम्मीदों के विपरीत, दरवाज़े पर न तो कोई आम के पत्तों की बंदनवार बंधी थी, न ही कोई थाली सजी थी, और न ही परिवार का कोई सदस्य खुशी से उनका इंतज़ार क...

**ममता के दो आँचल: एक अनकही दास्तान**

  कमरे की दीवारें हल्के गुलाबी और नीले रंगों से सजी थीं। खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप उस छोटे से पालने पर पड़ रही थी, जिसे पिछले ही हफ्ते बड़े अरमानों से खरीदा गया था। पालने के पास बैठी शालिनी के हाथों में ऊन के छोटे-छोटे मोजे थे, जिन्हें वह अपनी उंगलियों से सहला रही थी। उसकी आँखों में एक तरफ माँ बनने की असीम खुशी थी, तो दूसरी तरफ एक ऐसा गहरा खौफ था, जो उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था। दस साल की लंबी प्रतीक्षा और कई डॉक्टरों के चक्कर काटने के बाद, शालिनी और उसके पति विक्रम ने सरोगेसी (किराए की कोख) का सहारा लिया था। अब बस कुछ ही हफ्तों में उनके घर वो नन्ही किलकारी गूंजने वाली थी, जिसका उन्होंने बरसों इंतजार किया था। तभी विक्रम ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर कमरे में आया। उसने शालिनी को यूं गुमसुम और चिंतित देखा तो उसके पास आकर बैठ गया। उसने शालिनी के हाथ से वो मोजे लिए और उसके माथे को चूमते हुए कहा, "क्या हुआ शालिनी? अब तो खुशियों के आने का वक्त है। घर में बच्चे की किलकारियां गूंजने वाली हैं और तुम इस तरह उदास बैठी हो? क्या सोच रही हो इतनी गहराई से?" शालिनी ने एक गहरी सांस ली...

**एक छत, अनेक रिश्ते: पति या पूरी ससुराल?**

  *शादी से पहले हर लड़की सपनें बुनती है कि बड़े शहर में पति के साथ आज़ादी की ज़िंदगी जिएगी, पर क्या होता है जब उसी पति के भीतर सास, ननद और जेठानी का अक्स नज़र आने लगे? यह कहानी उस अनकहे सच की है, जो हर बंद दरवाज़े के पीछे कहीं न कहीं सांस लेता है...* "दीदी, मुझे तो समझ ही नहीं आता कि मैं क्या करूँ! बाहर से देखने में इतने शांत और सुलझे हुए लगते हैं तुम्हारे जीजाजी, पर घर के अंदर आते ही इनका एक अलग ही रूप सामने आ जाता है।" काव्या ने फोन पर अपनी बड़ी बहन नीता से झुंझलाते हुए कहा। नीता ने हंसते हुए पूछा, "अरे, अब क्या नया फरमान जारी कर दिया विकास ने?" "नया क्या दीदी, यह तो रोज़ का ही नाटक है। जो बनाकर सामने रख दो, उसमें कोई न कोई कमी निकालनी ही है। सुबह अगर मेहनत करके परांठे बनाऊँ, तो कहते हैं कि आज तो मुझे कुछ हल्का खाना था, पोहा क्यों नहीं बनाया? और जिस दिन पोहा बना दूँ, उस दिन कहेंगे कि ऑफिस जाने वाले इंसान को नाश्ते में कुछ पेट भरने वाला देना चाहिए। खाने को लेकर इतने नखरे तो शायद कोई सास भी न करती हो।" काव्या की आवाज़ में खीझ साफ झलक रही थी। उसने आगे कहा, ...

रिश्ते का नामकरण

    उजाड़ से रेलवे स्टेशन पर अकेली बैठी लड़की को मैंने पूछा तो उसने बताया कि वह अध्यापिका बन कर आई है । रात को स्टेशन पर ही रहेगी । प्रात;वहीं से ड्यूटी पर उपस्थित होगी । मैं गाँव में अध्यापक लगा हुआ था ।पहले घट चुकी एक –दो घटनाओं के बारे में मैंने उसे जानकारी दी ।       "आपका रात को यहाँ ठहरना उचित नहीं है । आप मेरे साथ चलें ,मैं किसी के घर में आपके ठहर  ने का प्रबंध कर देता हूँ ।"जब हम गाँव से गुजर रहे थे तो मैंने इशारा कर बताया –मैं इस  चौबारे में रहता हूँ ।       "अटैची जमीन पर रख वह बोली –थोड़ी देर आपके कमरे में ही ठहर जाते हैं । मैं हाथ –मुँह धोकर कपड़े बदल लूँगी ।" बिना किसी वार्तालाप के हम दोनों  कमरे में आ गए ।       "आपके साथ और कौन रहता है ?"       "मैं अकेला ही रहता हूँ ।"       "बिस्तर तो दो लगे हुये हैं ।"       "कभी –कभी मेरी  माँ आ जाती हैं ।"   ...

बिंदास

  चाची क्या हो रहा, चाय साय हो गई, नहीं रे अभी तो उठी हूं अब शुरू करूंगी धीरे धीरे सारे काम झाड़ू बहाडू बर्तन चौंका फिर पूजा कमरा साफ़ करके बर्तन धोना,तब न नहाना होगा। इतनी जल्दी कहां चाय नसीब होती है । पर तू बता कहां सुबह सुबह निकल पड़ा। कुछ नहीं चाची बस यूंही मन बहुत घबरा रहा था तो सोचा चलो सुबह की ताजी हवा खा आता हूं , तुम तो जानती हो कहते हुए तैरते आंसुओ को आंखों में समेट  उन्हीं के काम में हाथ बंटाने लगा। अच्छा सुनो मैं झाड़ू बर्तन पोंछा कर देता हूं ,तुम जाकर नहा लो जाके जल्दी से पूजा करके अदरक वाली चाय बनाओ। आज चाय पीने का मन है।बहुत दिन हो गए , तुम्हारे हाथ की चाय पिएं कहते हुए हाथ से झाडू छीन लिया और जबरन उन्हें नहाने  भेज दिया। लौटकर आई तो घर एकदम चमाचम चमक रहा था। और वो पूजा करने चली गई। ऐसा तकरीबन साल भर से चल रहा कोई रिश्ता न होते हुए भी एक अजीब रिश्ता कायम हो गया दोनों के बीच। होता भी क्यों न उसके कोई न इनके कोई बस दोनों ही एक दूसरे का सहारा हैं। हुआ यूं की बचपन में ही मां बाप किसी हादसे का शिकार हो गए , पालन पोषण दादी बाबा ने किया पर वो भी कब तक करते । उम्र ...

पंचिंग बैग

  बेटा घर में घुसते ही बोला :- "मम्मी कुछ खाने को दे दो यार बहुत भूख लगी है..!! यह सुनते ही मैंने कहा :- "बोला था ना ले जा कुछ कॉलेज, सब्जी तो बना ही रखी थी..!! बेटा बोला :- "यार मम्मी अपना ज्ञान ना अपने पास रखा करो..!! अभी जो कहा है वो कर दो बस और हाँ, रात में ढंग का खाना बनाना पहले ही मेरा दिन अच्छा नहीं गया है..!! कमरे में गई तो उसकी आंख लग गई थी..!! मैंने जाकर उसको जगा दिया कि कुछ खा कर सो जाए..!! चीख कर वो मेरे ऊपर आया कि जब आँख लग गई थी तो उठाया क्यों तुमने.? मैंने कहा :- तूने ही तो कुछ बनाने को कहा था..!! वो बोला :- "मम्मी एक तो कॉलेज में टेंशन ऊपर से तुम यह अजीब से काम करती हो, दिमाग लगा लिया करो कभी तो..!! तभी घंटी बजी तो बेटी भी आ गई थी..!! मैंने प्यार से पूछा :- "आ गई मेरी बेटी कैसा था दिन.?" बैग पटक कर बोली :- "मम्मी आज पेपर अच्छा नहीं हुआ" मैंने कहा :- "कोई बात नहीं, अगली बार कर लेना" मेरी बेटी चीख कर बोली :- "अगली बार क्या रिजल्ट तो अभी खराब हुआ ना, मम्मी यार तुम जाओ यहाँ से..!! तुमको कुछ नहीं पता" मैं उसके कमरे ...

जोरू का गुलाम

  ’’रामलाल तुम अपनी बीबी से इतना क्यों डरते हो?’’मैने अपने घरेलू नौकर से पूछा।। ’’मै डरता नही मैडम उसकी कद्र करता हूँ उसका सम्मान करता हूँ।’’उसने जबाव दिया। मैं हंसी और बोली-’’ ऐसा कया है उसमें। ना सूरत ना पढी लिखी।’’ जबाव मिला-’’ कोई फर्क नही पडता मैडम कि वो कैसी है पर मुझे सबसे प्यारा रिश्ता उसी का लगता है।’’ ’’जोरू का गुलाम।’’मेरे मुँह से निकला।’’और सारे रिश्ते कोई मायने नही रखते तेरे लिये।’’मैने पूछा। उसने बहुत इत्मिनान से जबाव दिया- ’’मैडम जी माँ बाप रिश्तेदार नही होते। वो भगवान होते हैं। उनसे रिश्ता नही निभाते उनकी पूजा करते हैं। भाई बहन के रिश्ते जन्मजात होते हैं , दोस्ती का रिश्ता भी मतलब का ही होता है। आपका मेरा रिश्ता भी दजरूरत और पैसे का है पर, पत्नी बिना किसी करीबी रिश्ते के होते हुए भी हमेशा के लिये हमारी हो जाती है अपने सारे रिश्ते को पीछे छोड़कर। और हमारे हर सुख दुख की सहभागी बन जाती है आखिरी साँसो तक।’’ मै अचरज से उसकी बातें सुन रही थी। वह आगे बोला-’’मैडम जी, पत्नी अकेला रिश्ता नही है, बल्कि वो पूरा रिश्तों की भण्डार है। जब वो हमारी सेवा करती है हमारी देख भाल करती है...