बिंदास

 चाची क्या हो रहा, चाय साय हो गई,

नहीं रे अभी तो उठी हूं अब शुरू करूंगी धीरे धीरे सारे काम झाड़ू बहाडू बर्तन चौंका फिर पूजा कमरा साफ़ करके बर्तन धोना,तब न नहाना होगा।

इतनी जल्दी कहां चाय नसीब होती है ।

पर तू बता कहां सुबह सुबह निकल पड़ा।

कुछ नहीं चाची बस यूंही मन बहुत घबरा रहा था तो सोचा चलो सुबह की ताजी हवा खा आता हूं , तुम तो जानती हो कहते हुए तैरते आंसुओ को आंखों में समेट  उन्हीं के काम में हाथ बंटाने लगा।

अच्छा सुनो मैं झाड़ू बर्तन पोंछा कर देता हूं ,तुम जाकर नहा लो जाके जल्दी से पूजा करके अदरक वाली चाय बनाओ।

आज चाय पीने का मन है।बहुत दिन हो गए , तुम्हारे हाथ की चाय पिएं

कहते हुए हाथ से झाडू छीन लिया और जबरन उन्हें नहाने  भेज दिया।

लौटकर आई तो घर एकदम चमाचम चमक रहा था।

और वो पूजा करने चली गई।

ऐसा तकरीबन साल भर से चल रहा

कोई रिश्ता न होते हुए भी एक अजीब रिश्ता कायम हो गया दोनों के बीच।

होता भी क्यों न उसके कोई न इनके कोई

बस दोनों ही एक दूसरे का सहारा हैं।

हुआ यूं की बचपन में ही मां बाप किसी हादसे का शिकार हो गए , पालन पोषण दादी बाबा ने किया पर वो भी कब तक करते ।

उम्र पूरी हुई तो वो भी चल बसे फिर क्या  तमाम प्रापट्री का अकेला वारिश होके रह गया जवान हुआ तो सब कुछ उसी के नाम अपने आप हो गया।

पर ऐसे में वो खुद को संभाल पाता कि एक भयानक रोग से ग्रसित हो गया जिसका अंत बड़ा दुखद ।

पर इसकी इच्छा शक्ति और आत्मबल इतना  कि कोई कह नहीं सकता  उसे कोई बीमारी भी है।

सबसे बड़ी बात की बुजुर्गों से लगाव बहुत


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