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**ममता के दो आँचल: एक अनकही दास्तान**

 कमरे की दीवारें हल्के गुलाबी और नीले रंगों से सजी थीं। खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप उस छोटे से पालने पर पड़ रही थी, जिसे पिछले ही हफ्ते बड़े अरमानों से खरीदा गया था। पालने के पास बैठी शालिनी के हाथों में ऊन के छोटे-छोटे मोजे थे, जिन्हें वह अपनी उंगलियों से सहला रही थी। उसकी आँखों में एक तरफ माँ बनने की असीम खुशी थी, तो दूसरी तरफ एक ऐसा गहरा खौफ था, जो उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था। दस साल की लंबी प्रतीक्षा और कई डॉक्टरों के चक्कर काटने के बाद, शालिनी और उसके पति विक्रम ने सरोगेसी (किराए की कोख) का सहारा लिया था। अब बस कुछ ही हफ्तों में उनके घर वो नन्ही किलकारी गूंजने वाली थी, जिसका उन्होंने बरसों इंतजार किया था।


तभी विक्रम ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर कमरे में आया। उसने शालिनी को यूं गुमसुम और चिंतित देखा तो उसके पास आकर बैठ गया। उसने शालिनी के हाथ से वो मोजे लिए और उसके माथे को चूमते हुए कहा, "क्या हुआ शालिनी? अब तो खुशियों के आने का वक्त है। घर में बच्चे की किलकारियां गूंजने वाली हैं और तुम इस तरह उदास बैठी हो? क्या सोच रही हो इतनी गहराई से?"


शालिनी ने एक गहरी सांस ली। उसकी आँखों के किनारे भीग चुके थे। उसने विक्रम की तरफ देखा और एक कांपती हुई आवाज़ में अपने मन का वह डर बयां कर दिया जो कई रातों से उसे सोने नहीं दे रहा था। "विक्रम, मैं सोच रही थी कि बच्चे के जन्म के बाद हम उस औरत... मतलब कावेरी (सरोगेट मदर) से सारे रिश्ते तोड़ लेंगे। हम कानूनी और सामाजिक रूप से इस बच्चे के माता-पिता हैं, इसलिए हम इस बच्चे को कभी कावेरी से नहीं मिलने देंगे। और सबसे बड़ी बात, हम अपने बच्चे को जिंदगी में कभी ये नहीं बताएंगे कि उसे नौ महीने किसी और ने अपनी कोख में रखा था।"


विक्रम यह सुनकर थोड़ा हैरान हुआ। उसने शालिनी के कंधे पर हाथ रखते हुए बहुत ही शांत स्वर में पूछा, "अरे, तुम अचानक ऐसा क्यों कह रही हो? यह भी भला कोई छिपाने जैसी बात है? कावेरी ने हमारे लिए जो त्याग किया है, वो बहुत बड़ा है। उसने हमारी सूनी गोद भरने के लिए नौ महीने की पीड़ा सही है।"


"यही तो डर है मेरा विक्रम!" शालिनी की आँखों से अब आंसू बहने लगे थे। "अगर कल को हमारे बच्चे को ये पता चला कि मैं उसकी जन्मदात्री नहीं हूँ, तो क्या वो मुझसे उतना ही प्यार करेगा? क्या उसके और मेरे बीच माँ के प्यार और इस ममता का बंटवारा नहीं हो जाएगा? मैं अपने बच्चे के प्यार को, उसके हिस्से की ममता को किसी और औरत के साथ नहीं बांट सकती विक्रम। वो सिर्फ मेरा बच्चा है।" शालिनी की आवाज़ में एक माँ का अधिकार और एक औरत की गहरी असुरक्षा साफ छलक रही थी।


विक्रम ने शालिनी के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। वह अपनी पत्नी की इस मानसिक उलझन को बहुत अच्छी तरह समझ रहा था। उसने बहुत ही प्यार और धैर्य से समझाते हुए कहा, "शालिनी, मेरी जान, तुम खुद को क्यों इस असुरक्षा में डाल रही हो? सच्चाई तो सच्चाई होती है, और सत्य कभी किसी से नहीं छुपता। आज नहीं तो कल, जब बच्चा बड़ा होगा, तो किसी न किसी माध्यम से, किसी रिश्तेदार या बाहर वाले से उसे यह बात पता चलेगी ही। जब उसे यह बात किसी और से पता चलेगी, तो उसे लगेगा कि उसके अपने माता-पिता ने उसे धोखे में रखा। इससे कहीं ज्यादा अच्छा यह है कि हम ही अपनी संतान को समय आने पर सबकुछ पहले ही साफ-साफ बता दें।"


"तो क्या वो मुझे अपनी असली माँ मानेगा?" शालिनी ने सुबकते हुए पूछा।


विक्रम के चेहरे पर एक बहुत ही सौम्य और गहरी मुस्कान आ गई। "शालिनी, क्या तुम देवकीनंदन और यशोमति मैया के लाल कृष्ण को भूल गई हो? भगवान कृष्ण को जन्म किसने दिया था? देवकी माता ने। लेकिन आज भी जब दुनिया में वात्सल्य और ममता का सबसे बड़ा उदाहरण दिया जाता है, तो किसका नाम लिया जाता है? यशोदा मैया का। यशोदा ने कृष्ण को अपनी कोख में नहीं रखा था, लेकिन उन्होंने अपनी रातों की नींदें, अपना प्यार और अपना सर्वस्व कान्हा पर न्योछावर कर दिया था। क्या कृष्ण के मन में देवकी के लिए प्यार कम था? नहीं। और क्या यशोदा की ममता में कोई कमी आई? बिल्कुल नहीं।"


विक्रम की इन बातों ने शालिनी के दिल में उठ रहे तूफान को अचानक शांत सा कर दिया। 


विक्रम ने अपनी बात जारी रखी, "सच का बंटवारा नहीं होता शालिनी, और न ही ममता कभी बंटती है। जो रातों को जागकर उसे लोरी सुनाएगी, जो उसके घुटनों के बल चलने पर खुश होगी, जो उसके बीमार पड़ने पर बिना खाए-पिए उसके सिराहने बैठी रहेगी—वही उसकी असली माँ होगी। कावेरी ने उसे कोख दी है, यह उसका अहसान है, लेकिन तुम उसे जीवन दोगी, संस्कार दोगी। हमारा बच्चा बहुत खुशनसीब होगा जिसे एक नहीं, बल्कि दो माताओं का आशीर्वाद मिलेगा।"


शालिनी को लगा जैसे उसके मन पर छाया हुआ कोई बहुत घना कोहरा छंट गया हो। यशोदा और देवकी के उस उदाहरण ने उसके भीतर की असुरक्षा को जड़ से खत्म कर दिया था। उसने अपने आँसू पोंछे और विक्रम को कसकर गले लगा लिया। "आप सही कह रहे हैं विक्रम। मैं कितनी स्वार्थी हो गई थी। ममता को किसी कोख या किसी सच की बेड़ियों में नहीं बांधा जा सकता।"


कुछ हफ्तों बाद जब अस्पताल में बच्चे की पहली किलकारी गूंजी, तो शालिनी की बाँहों में उसका पूरा संसार था। कावेरी दूसरे बेड पर लेटी हुई थी, उसकी आँखों में भी एक अजीब सी शांति थी। शालिनी अपने नवजात बच्चे को लेकर धीरे-धीरे कावेरी के पास गई। उसने वो बच्चा कावेरी के पास लिटा दिया और उसके माथे को चूम कर बोली, "तुम्हारा यह कर्ज मैं जिंदगी भर नहीं उतार सकती। तुमने इसे जन्म दिया है, लेकिन मैं वचन देती हूँ कि मैं इसे वो प्यार दूँगी कि दुनिया भी देखेगी।" उस कमरे में मौजूद हर आँख नम थी। सच छुपने से नहीं, बल्कि सच को गले लगाने से ही एक खूबसूरत और पवित्र रिश्ते का जन्म हुआ था।


दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या शालिनी का वह डर स्वाभाविक था? क्या आज के दौर में भी यशोदा और देवकी का उदाहरण रिश्तों की अहमियत को सही से समझा पाता है? अपने विचार और भावनाएं हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।


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