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**एक छत, अनेक रिश्ते: पति या पूरी ससुराल?**

 *शादी से पहले हर लड़की सपनें बुनती है कि बड़े शहर में पति के साथ आज़ादी की ज़िंदगी जिएगी, पर क्या होता है जब उसी पति के भीतर सास, ननद और जेठानी का अक्स नज़र आने लगे? यह कहानी उस अनकहे सच की है, जो हर बंद दरवाज़े के पीछे कहीं न कहीं सांस लेता है...*


"दीदी, मुझे तो समझ ही नहीं आता कि मैं क्या करूँ! बाहर से देखने में इतने शांत और सुलझे हुए लगते हैं तुम्हारे जीजाजी, पर घर के अंदर आते ही इनका एक अलग ही रूप सामने आ जाता है।" काव्या ने फोन पर अपनी बड़ी बहन नीता से झुंझलाते हुए कहा।


नीता ने हंसते हुए पूछा, "अरे, अब क्या नया फरमान जारी कर दिया विकास ने?"


"नया क्या दीदी, यह तो रोज़ का ही नाटक है। जो बनाकर सामने रख दो, उसमें कोई न कोई कमी निकालनी ही है। सुबह अगर मेहनत करके परांठे बनाऊँ, तो कहते हैं कि आज तो मुझे कुछ हल्का खाना था, पोहा क्यों नहीं बनाया? और जिस दिन पोहा बना दूँ, उस दिन कहेंगे कि ऑफिस जाने वाले इंसान को नाश्ते में कुछ पेट भरने वाला देना चाहिए। खाने को लेकर इतने नखरे तो शायद कोई सास भी न करती हो।" काव्या की आवाज़ में खीझ साफ झलक रही थी।


उसने आगे कहा, "और सिर्फ खाने की बात होती तो मैं सह भी लेती। ऑफिस पहुँचते ही इनके जासूसी वाले फोन शुरू हो जाते हैं। 'क्या कर रही हो? फोन क्यों व्यस्त था? दरवाज़े पर कौन आया था?' दीदी, मुझे तो ऐसा लगता है जैसे मैं किसी शहर के फ्लैट में नहीं, बल्कि किसी जेल में रह रही हूँ। जब भी वीकेंड पर कहीं बाहर घूमने जाने का कहो, तो इनका एक ही रटा-रटाया जवाब होता है कि 'पूरा हफ्ता काम करके और ट्रैफिक में गाड़ी चलाकर मेरी कमर टूट गई है, अब मुझे कहीं नहीं जाना, घर पर ही आराम करना है।'"


काव्या जब अपनी शादी से पहले की बातें याद करती, तो उसे खुद पर हंसी आती थी। जब विकास के साथ उसका रिश्ता तय हुआ था, तो वह कितनी खुश थी। उसे लगता था कि सास-ससुर, ननद, देवरानी-जेठानी की रोज़-रोज़ की चिकचिक से दूर, वह एक बड़े शहर में अपने पति के साथ आज़ाद परिंदे की तरह रहेगी। अपने हिसाब से घर सजाएगी, अपने हिसाब से जिएगी। लेकिन यहाँ तो उल्टा ही हो गया था। ईश्वर ने उसे जो 'पैकेज' दिया था, उसमें विकास के भीतर ही सास की टोका-टाकी, ननद की जासूसी और ससुर का अनुशासन सब कुछ एक साथ समाहित कर दिया था। "व्यक्ति एक, रूप अनेक" वाली कहावत विकास पर बिल्कुल सटीक बैठती थी। 


और इन सब के ऊपर से, गाँव से काव्या की सासू माँ का फोन आ जाता। वो बड़े ही प्यार से कहतीं, "बहू, मैंने तुझे अपने जिगर का टुकड़ा सौंपा है। मेरा विकास बहुत सीधा है, उसे कुछ कहना नहीं आता। तू उसका बहुत ध्यान रखना।" सासू माँ की ये बातें सुनकर काव्या मन ही मन कुढ़ती थी कि 'आपका सीधा-सादा बेटा यहाँ मेरे लिए पूरी ससुराल बनकर बैठा है।'


दिन ऐसे ही बीत रहे थे। काव्या के मन में विकास के प्रति एक दूरी सी बनने लगी थी। उसे लगने लगा था कि विकास एक शक्की और हावी होने वाला पति है, जिसे काव्या की खुशी से कोई मतलब नहीं है। 


लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने काव्या के सोचने का नज़रिया पूरी तरह बदल दिया।


नवंबर की एक सर्द शाम थी। विकास ऑफिस से लौटा तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकावट और मायूसी थी। उसने बिना कुछ कहे अपना बैग सोफे पर रखा और सीधे बेडरूम में जाकर लेट गया। काव्या ने सोचा कि आज फिर कोई नया नखरा होगा। वह चाय लेकर कमरे में गई, तो देखा विकास ने आँखें बंद कर रखी हैं और उसका शरीर बुखार से तप रहा है। 


काव्या घबरा गई। उसने तुरंत ठंडे पानी की पट्टियां रखीं और विकास के सिरहाने बैठ गई। रात के करीब दो बज रहे थे। बुखार की तपन में विकास अर्ध-बेहोशी की हालत में कुछ बड़बड़ा रहा था। काव्या ने कान पास किए तो वह कह रहा था, "काव्या... दरवाज़ा अच्छे से बंद किया है न? शहर बहुत खराब है... मुझे डर लगता है जब तुम घर में अकेली होती हो। मैं ऑफिस में काम नहीं कर पाता... मेरा मन घर पर ही लगा रहता है।" 


काव्या सन्न रह गई। जो फोन कॉल्स उसे जासूसी और शक लगते थे, वो असल में एक पति की फिक्र और डर था। विकास अपनी पत्नी को लेकर इस बड़े और अनजान शहर में असुरक्षित महसूस करता था।


थोड़ी देर बाद विकास फिर बड़बड़ाया, "माँ... आज आपके हाथ की दाल ढोकली खाने का मन है। बाहर का खा-खाकर पेट खराब हो गया है... यहाँ कोई आपके जैसा खाना नहीं बनाता।"


काव्या की आँखों से आंसू छलक पड़े। उसे समझ आ गया कि खाने में कमियां निकालने वाला विकास कोई अक्खड़ पति नहीं था, बल्कि अपनी माँ के हाथों के स्वाद को तरसता हुआ एक बेटा था, जो शहर की इस भागदौड़ में अपने घर की वो गर्माहट ढूँढ रहा था। ऑफिस की राजनीति, ईएमआई का बोझ और एक छोटे शहर से आकर बड़े शहर में खुद को साबित करने की जद्दोजहद ने विकास को अंदर से थका दिया था। छुट्टी वाले दिन वह बाहर इसलिए नहीं जाना चाहता था क्योंकि वह सच में टूट चुका होता था, उसे सिर्फ अपने घर के सुकून की तलाश होती थी।


काव्या ने विकास का हाथ अपने हाथों में ले लिया और फूट-फूट कर रोई। उसने विकास को गलत समझा था। वह विकास के भीतर एक हावी होने वाली ससुराल ढूँढ रही थी, जबकि असल में वह तो एक थका हुआ इंसान था, जो अपनी पत्नी में माँ की ममता और एक दोस्त का सहारा ढूँढ रहा था।


अगली सुबह जब विकास का बुखार कुछ कम हुआ, तो उसे रसोई से दाल ढोकली की खुशबू आई। वह हैरान होकर बाहर आया। डाइनिंग टेबल पर खाना परोसा हुआ था और काव्या मुस्कुराते हुए उसका इंतज़ार कर रही थी। 


"काव्या, यह सब?" विकास ने अचरज से पूछा।


काव्या ने आगे बढ़कर विकास का हाथ पकड़ा और उसे कुर्सी पर बिठाते हुए कहा, "सासू माँ ने मुझे अपना जिगर का टुकड़ा सौंपा है, तो उसकी फरमाइशें पूरी करना तो मेरा फर्ज़ है न! विकास, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारे ऑफिस के तनाव और तुम्हारी फिक्र को तुम्हारी पाबंदियां समझ बैठी।"


विकास की आँखें भी भर आईं। उसने काव्या के हाथ को चूम लिया। "नहीं काव्या, गलती मेरी है। मैं अपनी उलझनें और अपना डर तुम्हें बता नहीं पाया और अनजाने में तुम पर चिड़चिड़ाने लगा।"


उस दिन के बाद से उनके घर का माहौल बदल गया। विकास ने अपनी परेशानियां काव्या से बांटनी शुरू कीं और काव्या ने उसके नखरों के पीछे छुपे प्यार को समझना सीख लिया। अब काव्या को विकास में कोई सास या ननद नज़र नहीं आती थी, बल्कि एक सच्चा जीवनसाथी नज़र आता था, जिसके साथ वह हर चुनौती का सामना करने को तैयार थी।


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