दुर्लभ अपने हाथ में एक अटैची और बैग लिये जल्दी-जल्दी प्लेटफॉर्म पर चल रहा था। उसके साथ थी एक युवा महिला — पर्णिका। दोनों के चेहरों पर घबराहट और जल्दबाजी साफ़ झलक रही थी। दुर्लभ बार-बार घड़ी देख रहा था और पर्णिका ने चेहरे पर दुपट्टा कसकर बाँध रखा था, मानो किसी की नज़र से बचना चाहती हो।
“जल्दी चलो, पर्णिका… ट्रेन छूट जाएगी,” दुर्लभ ने कहा।
“हाँ… बस दो कदम और,” वह बोली।
वे दोनों डिब्बे के पास पहुँचे ही थे कि पीछे से एक तेज़ आवाज़ गूंजी —
“दुर्लभ!!”
दुर्लभ के पैर जैसे थम गए। उसने पलटकर देखा — उसकी पत्नी तृप्ति वहाँ खड़ी थी। चेहरा तमतमाया हुआ, आँखों में आँसू और होठों पर रोष का कंपन।
वह आगे बढ़कर बोली —
“कहाँ भाग रहे हो? हमें छोड़कर? भूल गए वो सात फेरे जो समाज और परिवार के सामने लिये थे? भूल गए वो वचन, वो कसमें जो हमारे बीच थीं?”
दुर्लभ बुरी तरह चौंक गया। वह बड़बड़ाया,
“तुम यहाँ कैसे आई?”
“ईश्वर ने सब दिखा दिया मुझे… जब से बदलने लगे थे ना तुम, तब से मुझे समझ आ गया था। पर आज, आज मैं तुम्हें इस हालत में जाने नहीं दूँगी।”
भीड़ धीरे-धीरे इकट्ठी होने लगी थी। दुर्लभ झल्लाया,
“बस बहुत हुआ तृप्ति! अब तुमसे मेरा कोई लेना-देना नहीं। तुम कुलटा औरत हो, जिसने मेरा घर बरबाद कर दिया। तुम्हारे कारण मेरा जीना मुश्किल हो गया!”
तृप्ति की आँखों से आँसू छलक पड़े, पर उसने आवाज़ ऊँची की —
“मैं कुलटा? और तुम क्या हो? एक धोखेबाज़, जो अपनी पत्नी को छोड़कर किसी और के साथ भागने चला है? शर्म आनी चाहिए तुम्हें, दुर्लभ! आज पूरा स्टेशन देखेगा, कौन कुलटा है!”
पर्णिका, जो अब तक चुप थी, तिलमिला उठी —
“बस कीजिए आप! हमें किसी से डर नहीं। हम चोरी नहीं कर रहे, हमने सच्चे दिल से प्यार किया है। हमें कोई नहीं रोक सकता।”
तृप्ति ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा —
“प्यार? पराए घर की नींव तोड़कर, किसी की ज़िंदगी बर्बाद करके जो रिश्ता बनाया जाता है, वो प्यार नहीं पाप कहलाता है।”
दुर्लभ झुँझलाकर बोला —
“मुझे तुझसे बहस नहीं करनी तृप्ति, हट जा मेरे रास्ते से। अभी ट्रेन निकल जाएगी!”
“तो निकल जाने दो,” तृप्ति ने सीना तानते हुए कहा,
“जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुम ये पाप नहीं करोगे।”
लोग अब तमाशबीन हो चुके थे। मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगे। कोई कह रहा था —
“बीवी सही बोल रही है, आदमी धोखेबाज़ है।”
तो कोई कह रहा था —
“दोनों औरतें पागल हैं, स्टेशन पर तमाशा कर रही हैं।”
पर दुर्लभ ने सब्र खो दिया। उसने तृप्ति को जोर से धक्का दिया, “हट जा मेरे रास्ते से वरना अंजाम ठीक नहीं होगा!”
तृप्ति पीछे लुढ़क गई, पर अगले ही पल उठ खड़ी हुई।
“अब मारोगे भी मुझे?”
“हाँ! क्योंकि तुम मेरे लिए अब बोझ बन चुकी हो।”
और वह हाथ उठाने ही वाला था कि तृप्ति ने झट से उसका हाथ पकड़ लिया और ज़ोर से कहा —
“अब ये हाथ सिर्फ एक बार उठाना, उसके बाद तू खुद देखेगा कि तृप्ति क्या कर सकती है।”
पर्णिका ने बीच में बोलना चाहा,
“बस करो तुम दोनों! लोग हँस रहे हैं।”
लेकिन तृप्ति अब चुप नहीं रहने वाली थी —
“हँसने दो दुनिया को! आज मैं सबको बता दूँगी कि ये आदमी, जो समाज में शरीफ बनने का दिखावा करता है, अंदर से कितना गंदा है। ये वही इंसान है जो अपने वादों को पैसे और दिखावे के लिए बेच देता है।”
दुर्लभ की आँखों में गुस्सा और झेंप दोनों थे। उसने आवेश में आकर तृप्ति को थप्पड़ मार दिया।
प्लेटफॉर्म पर सब चौंक गए।
तृप्ति भी पीछे नहीं हटी। उसने भी उसी ज़ोर से उसे दो तमाचे जड़ दिए।
“ये लो जवाब तुम्हारे प्यार और मर्दानगी का!”
भीड़ अब शोर मचाने लगी — “अरे रोकिए! पुलिस को बुलाइए!”
पर्णिका ने दुर्लभ का हाथ पकड़ा और चिल्लाई — “चलो यहाँ से!”
दुर्लभ ने कोशिश की, पर तृप्ति ने उसकी बाँहें पकड़ लीं —
“अब भागकर कहाँ जाएगा? ये समाज देखेगा तेरा असली चेहरा!”
उसी वक्त ट्रेन की सीटी बजी। इंजन हिला, डिब्बे धीरे-धीरे सरकने लगे।
पर दुर्लभ अब भी तृप्ति के शिकंजे में था। दोनों के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई।
पर्णिका चिल्लाई —
“छोड़ दो उसे! तुम पागल औरत हो!”
“हाँ, पागल हूँ,” तृप्ति चीखी, “क्योंकि मैं अपनी शादी बचाने की कोशिश कर रही हूँ जबकि तुम उसे लूटने आई हो!”
दोनों औरतें एक-दूसरे पर शब्दों के तीर चला रही थीं। दुर्लभ दोनों के बीच झगड़ते हुए खुद भी संतुलन खो बैठा।
तभी पुलिस पहुँच गई। एक कांस्टेबल ने डाँटते हुए कहा —
“बस करो! क्या तमाशा बना रखा है स्टेशन पर?”
उन्होंने तीनों को अलग किया और पुलिस चौकी ले गए।
लोग आपस में बातें करने लगे —
“कौन सही है, कौन गलत?”
“बीवी सही है, आजकल आदमी ही बिगड़ गए हैं।”
“अरे नहीं, दोनों औरतें एक जैसी हैं। आदमी बेचारा फँस गया।”
लेकिन सच्चाई यह थी — तीनों अपने-अपने स्वार्थ और गुस्से में रिश्तों की मर्यादा खो चुके थे।
पुलिस चौकी में बैठकर तृप्ति का चेहरा शांत था। उसने कहा,
“साहब, मैं कोई मुकदमा नहीं करना चाहती। बस इतना चाहती हूँ कि इसे समझ में आए कि धोखा किसी का नहीं, खुद का नुकसान करता है।”
पर्णिका चुप थी। उसकी आँखों में भी पछतावे की हल्की झलक थी।
दुर्लभ ने सिर झुका लिया।
शायद उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस प्रेम को पाने के लिए वो भाग रहा था, उसने उसे दुनिया के सामने बेइज़्ज़त कर दिया।
प्लेटफॉर्म पर फिर वही हलचल थी, लेकिन वहाँ खड़ी भीड़ के बीच अब उस हंगामे की गूँज एक सबक बनकर रह गई थी —
किसी का घर जलाकर कोई अपना सुख नहीं बना सकता, और जो रिश्ते छल से बनाए जाते हैं, वे अंत में सिर्फ तमाशा बनकर रह जाते हैं।
मुकुन्द लाल
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