रचना हमेशा से ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीती आई थी। पिता बड़े बिज़नेस मैन थे, घर में नौकर-चाकरों की कमी नहीं थी। शादी भी उसने अपने ही जैसे अमीर घर में की थी। उसके पति का खुद का बड़ा कारख़ाना था, जहाँ सैकड़ों लोग काम करते थे।
रचना को अपने पैसे और रुतबे पर बहुत घमंड था। उसे लगता था कि दुनिया में वही सबसे ऊपर है, और बाकी सब लोग उसकी बराबरी तो क्या, उसके सामने खड़े होने के भी लायक नहीं हैं।
उसके घर में काम करने वाली कमली एक गरीब लेकिन ईमानदार और मेहनती औरत थी। सुबह-सुबह आकर झाड़ू-पोंछा करती, बर्तन माँजती और खाना बनाने में मदद करती। चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती, चाहे कितना भी काम हो या तकलीफ़। मगर रचना को कमली का खुश रहना भी अखरता था।
अक्सर वो उसे डांट देती,
“अरे कमली! तुमसे काम ठीक से होता नहीं। बर्तन में दाग रह जाते हैं, और बोलती हो कि सब कर लिया। लगता है अब तुम्हें छुट्टी देनी पड़ेगी!”
कमली बस इतना कहती,
“मेमसाहब, माफ कर दो, अगली बार गलती नहीं होगी।”
एक दिन सुबह कमली का चेहरा उतरा हुआ था। वो धीमी आवाज़ में बोली,
“मेमसाहब, मेरा पति बहुत बीमार है। डॉक्टर ने कहा है कि तुरंत इलाज कराना पड़ेगा। प्लीज़ पाँच हजार रुपये दे दीजिए, अगले महीने की पगार से काट लेना।”
रचना अखबार पढ़ते हुए बोली,
“क्या? पाँच हजार! मेरे पास इतने फालतू पैसे नहीं हैं। और वैसे भी, तुम्हारे पति का मुझसे क्या लेना-देना? जाओ, जैसे चाहो देखो।”
कमली की आँखों में आँसू आ गए। उसने धीरे से कहा,
“पैसे मत दीजिए मैडम, लेकिन इतना मत कहिए। मैं बहुत मुश्किल में हूँ।”
रचना ने गुस्से में कहा,
“मुझे ड्रामा मत दिखाओ कमली! तुम जैसे लोग तो हमेशा पैसे के बहाने बनाते हो। काम करो और चुप रहो।”
कमली चुपचाप चली गई।
रात में उसने अपना मंगलसूत्र बेच दिया, और उसी पैसे से अपने पति का इलाज करवाया। किस्मत अच्छी थी, उसका पति बच गया।
दिन बीतते गए। कमली फिर रोज़ रचना के घर काम करने आने लगी, लेकिन अब उसके दिल में रचना के लिए एक चुप दर्द था। वो हर बार उसे सलाम करती, मगर मन ही मन सोचती कि पैसा न सही, थोड़ी हमदर्दी तो मिलनी चाहिए थी।
एक दिन सुबह से रचना घर पर नहीं आई थी। शाम तक भी कोई खबर नहीं। कमली ने सोचा, “अभी तक मेमसाहब नहीं लौटीं, फोन करके पूछती हूँ।”
उसने कॉल किया, पर रचना का फोन नहीं उठा। तभी उसी नंबर से कॉल वापस आया।
“हैलो, आप कौन बोल रही हैं?”
कमली बोली, “जी मैं रचना जी के घर से बोल रही हूँ, कौन बोल रहा है?”
“मैडम का एक्सीडेंट हो गया है। वो सिटी हॉस्पिटल में एडमिट हैं।”
कमली का दिल धड़क उठा। उसने बिना कुछ सोचे तुरंत ऑटो पकड़ा और हॉस्पिटल पहुँच गई।
रचना बेहोश थी, पूरे शरीर पर चोटें थीं। डॉक्टर ने बताया, “अब हालत स्थिर है, होश आने में थोड़ा समय लगेगा।”
कमली ने रातभर अस्पताल में ही बैठकर उसकी देखभाल की। ड्रिप की बोतलें बदलीं, डॉक्टर को बुलाया, और उसके पास चुपचाप बैठी रही।
सुबह जब रचना को होश आया, तो सबसे पहले उसकी नज़र कमली पर पड़ी।
“अरे… कमली, तुम यहाँ?”
कमली ने नम्रता से कहा,
“जी मेमसाहब, आपको एक्सीडेंट हुआ था, इसलिए आ गई।”
रचना की आँखों से आँसू बह निकले।
“मैंने तुझसे बहुत बुरा कहा था कमली, और तू फिर भी यहाँ मेरी देखभाल कर रही है? क्यों?”
कमली ने धीमी आवाज़ में कहा,
“मेमसाहब, आप बड़ी हैं, गलती कोई भी कर सकता है। मैं बस इंसानियत के नाते आई हूँ। और हाँ, गरीब लोग भी दिल रखते हैं — पैसों से नहीं, भावनाओं से काम करते हैं।”
रचना ने हाथ पकड़ लिया,
“कमली, माफ़ कर दो मुझे। मैंने तेरे साथ बहुत गलत किया। मैं अपने पैसे और रुतबे के नशे में यह भूल गई कि इंसान की असली पहचान उसके दिल से होती है, रंग-रूप या अमीरी-गरीबी से नहीं।”
कमली ने मुस्कुराते हुए कहा,
“माफी मत मांगिए, बस इतना ध्यान रखिए कि अगर कभी कोई दुख में हो, तो उसे ताने न दीजिए। पैसा देना ज़रूरी नहीं होता, पर शब्दों में भी दया होनी चाहिए। दुख का वक्त निकल जाता है, पर कटु शब्द हमेशा रह जाते हैं।”
रचना रो पड़ी।
“हाँ कमली, तू बिल्कुल सही कहती है। शायद आज ये हादसा इसलिए हुआ, ताकि मैं अपनी गलती समझ सकूँ।”
रचना के पति और परिवार वाले भी आ गए। उन्होंने देखा कि कमली ने रातभर एक पल भी नींद नहीं ली थी।
कुछ दिनों बाद जब रचना घर लौटी, तो उसका व्यवहार बिल्कुल बदल चुका था। अब वो अपने नौकरों से “अरे-ओ” कहकर नहीं, नाम लेकर बात करती।
वो अब हर गरीब की मदद करने लगी, और सबसे बड़ी बात — उसने अपने घर में किसी भी कामवाली को नीचा दिखाना छोड़ दिया।
एक दिन कमली ने हँसते हुए कहा,
“मेमसाहब, अब तो आप बिल्कुल बदल गई हैं।”
रचना ने मुस्कुरा कर कहा,
“हाँ कमली, भगवान ने मुझे बहुत कुछ दिया था, पर इंसानियत देना मैं भूल गई थी। अब समझ गई हूँ — पैसे का घमंड नहीं, दिल का बड़ा होना ही असली दौलत है।”
कमली की आँखों में गर्व था, और रचना के दिल में सच्चा पछतावा।
उस दिन के बाद से रचना हर उस इंसान से विनम्रता से पेश आने लगी, जिसे कभी वह “छोटा” समझती थी।
क्योंकि अब उसे समझ आ गया था —
इंसान की हैसियत उसकी जेब से नहीं, उसके व्यवहार से पहचानी जाती है।
रंजीता पाण्डेय
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