सौदा

 शहर के पुराने इलाके में एक छोटी सी सिलाई की दुकान है — “राधिका बुटीक”। बाहर टंगे रंग-बिरंगे कपड़े और अंदर बैठी मैं, राधिका, मशीन चलाते हुए अक्सर खुद से बातें करती हूँ। मशीन की “ट्र-ट्र-ट्र” आवाज़ में मेरा अतीत घुला हुआ है। ये दुकान मेरे पति ने खोली थी — मेरे नाम पर, मेरे लिए। कहते थे, “राधिका, तूने जो चाहा, वो बनाकर दिखा देना, मैं तेरे साथ हूँ।” आज वो नहीं हैं, पर उनकी बातें, उनकी हँसी, उनका विश्वास — सब यहीं हैं, इस दुकान की दीवारों में।

आज सुबह एक जोड़ा आया था। देखने से ही समझ आ गया — नए-नए शादीशुदा हैं। लड़का बहुत उत्साह में था और लड़की शर्म से मुस्कुरा रही थी। लड़की को एक पीच कलर का सूट पसंद आ गया। उसने दाम पूछा तो मैंने कहा, “दो हज़ार का है।”
लड़का थोड़ा झेंप गया, बोला, “थोड़ा कम नहीं हो सकता?”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “कपड़ा अच्छा है बेटा, हाथ की कढ़ाई है, कम नहीं कर सकती।”
वो दोनों कपड़ा रखकर चले गए।

अब शाम हो चुकी है। दुकान की बत्तियाँ जल चुकी हैं। मशीन का स्विच बंद है। मैं बिल तैयार कर रही थी कि वही जोड़ा फिर से आया।
लड़के ने झिझकते हुए कहा, “मैडम, वो सूट अभी है क्या?”
मैंने कहा, “हाँ है बेटा, क्यों?”
“दरअसल हमें वो बहुत पसंद आया था। बस... दाम ज़रा ज़्यादा लगे थे।”
“आपको बहुत पसंद आया तो फिर सोच क्यों रहे हैं? कुछ खास मौके के लिए चाहिए क्या?”
लड़की ने धीरे से कहा, “जी... हमारी पहली दिवाली साथ में है।”

इतना सुनते ही मेरी उँगलियाँ ठहर गईं। जैसे किसी ने पुराने ज़ख्म पर हल्की सी उँगली रख दी हो।
मुझे याद आया — मेरी पहली दिवाली शादी के बाद।

वो पहली दिवाली थी जब हम दोनों ने अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत की थी। मेरे पति अजय सरकारी स्कूल में मास्टर थे। वेतन ज्यादा नहीं था पर दिल बहुत बड़ा था। उस दिन उन्होंने कहा था, “राधिका, चल तेरे लिए एक साड़ी ले आते हैं।”
हम बाजार गए। मुझे एक नीली सिल्क साड़ी बहुत पसंद आई। उसकी चमक में मुझे जैसे अपना भविष्य दिखाई दे रहा था। दुकानदार ने दाम बताया — पचहत्तर रुपये। अजय ने जेब टटोली, वहाँ सिर्फ साठ रुपये थे। मैंने कहा, “कोई बात नहीं, और भी साड़ियाँ देख लेते हैं।”
पर अजय के चेहरे पर उदासी आ गई। वो बोले, “नहीं राधिका, जो तुझे पसंद आई है, वही लेनी है।”

पर मैंने सख्ती से मना कर दिया, “नहीं अजय, घर में अभी बहुत खर्चे हैं। तेरे पास पैसे होंगे तो साड़ी तो क्या, पूरी दुकान खरीद लेगी तेरी बीवी।”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “तो तय रहा, एक दिन मैं तुझे अपनी दुकान दूँगा।”
मैंने हँसकर कहा, “और मैं उस दुकान का नाम रखूँगी ‘राधिका बुटीक’।”

उस दिन हम साड़ी लिए बिना लौट आए थे। मगर उस शाम उनकी आँखों में जो कसक थी, उसने उन्हें चैन से नहीं रहने दिया।
वो जब भी तनख्वाह लाते, कुछ रुपये अलग रख देते। कहते, “ये तेरी दुकान की पूँजी है।”
और सचमुच, कुछ सालों बाद जब मैंने इस दुकान की नींव रखी, तो उनके चेहरे पर वही नीली साड़ी जैसी चमक थी।

मशीन की आवाज़, कपड़े की खुशबू, और उनकी याद — सब मिलकर इस दुकान को ज़िंदा रखते हैं।
लेकिन पिछले साल वो अचानक चले गए।
अब हर सुबह जब मैं दुकान खोलती हूँ, तो दरवाज़े के पास रखी उनकी कुर्सी को देखती हूँ — जहाँ बैठकर वो ग्राहक से मुस्कुराते हुए कहते थे, “राधिका की सिलाई शहर में सबसे बढ़िया है।”

मेरी आँखें नम थीं, पर सामने वो जोड़ा खड़ा था — बिल्कुल हमारी ही तरह। लड़का उसी मासूमियत से लड़की की खुशी ढूँढ रहा था, जैसे अजय मेरे लिए करते थे।

मैंने खुद को संभाला और पूछा, “कपड़ा पैक कर दूँ?”
लड़की ने कहा, “नहीं मैम, रहने दीजिए। अगली बार ले लेंगे।”
वो जाने लगे, तभी मैंने पुकारा, “रुकिए बेटा!”

मैंने धीरे से कहा, “आपने जो सूट पसंद किया था, उस पर आज से दशहरा ऑफ़र लगा है। अब वो सिर्फ बारह सौ का है।”
स्टाफ मेरी ओर देखने लगा, “मैम! कौन-सा ऑफ़र? आज तो कोई स्कीम नहीं है।”
मैंने उसकी ओर देखा और मुस्कुराई, “अरे हाँ, लगता है मैंने अभी-अभी ऑफ़र शुरू किया है।”

लड़की की आँखें चमक उठीं। लड़के ने पर्स से पैसे निकालकर दिए और बोला, “धन्यवाद मैम! आपने हमारी दिवाली सच में खास बना दी।”

वे दोनों जैसे ही दुकान से बाहर निकले, मेरे सामने अजय की तस्वीर टंगी थी — फूलों से सजी हुई।
मैंने तस्वीर की ओर देखा और कहा, “देखो अजय, किसी और की दिवाली हमने भी तो रोशन की।”

स्टाफ अब भी मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मैं किसी नुकसान में पड़ गई हूँ।
पर उसे क्या मालूम, कभी-कभी घाटा सिर्फ पैसों में नहीं गिना जाता। कुछ सौदे ऐसे होते हैं जहाँ आत्मा को सुकून मिलता है, और वही सबसे बड़ी कमाई होती है।

मैंने फिर मशीन चालू की। “ट्र-ट्र-ट्र” की आवाज़ फिर कमरे में गूँजने लगी। पर इस बार वो आवाज़ मुझे खालीपन नहीं, अपनापन दे रही थी।
कपड़े की तहों में अजय की याद थी, सुई की नोक पर उनका वादा, और धागे के हर छोर पर उनका नाम।

उस रात मैं देर तक दुकान में बैठी रही। बाहर सड़क की लाइटें जल चुकी थीं। हर गुजरती गाड़ी की हेडलाइट से तस्वीर की शीशे पर रोशनी पड़ती, और ऐसा लगता जैसे अजय मुस्कुरा रहे हों — वही उनकी पुरानी मुस्कान, जिसमें जीवन का पूरा अपनापन था।

धीरे-धीरे सब सामान समेटकर मैंने शटर गिराया। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। आसमान में कुछ पटाखों की आवाज़ें गूँज रही थीं। लोग दिवाली की तैयारी में व्यस्त थे।

मैंने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा,
“अजय, तुम्हारी अधूरी साड़ी की जगह मैंने आज किसी और का सूट पूरा कर दिया। शायद यही तुम्हारा सपना था — कि कोई और वो मायूसी न महसूस करे, जो हमने कभी महसूस की थी।”

घर लौटते हुए मन में एक अजीब-सी शांति थी।
कभी-कभी किसी अनजान जोड़े की खुशी में अपने बीते हुए प्रेम की झलक मिल जाती है।
और वही झलक, ज़िंदगी के सारे अकेलेपन को एक पल के लिए भर देती है —
जैसे किसी टूटी चूड़ी में फिर से रंग लौट आए हों।

विनय कुमार मिश्रा


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