माँ कहती थी — “बच्चे कभी बूढ़े नहीं होते, पर एक दिन वो भी अपने बच्चों के लिए बूढ़े हो जाते हैं।” तब समझ नहीं आता था कि इसका मतलब क्या है। अब समझ में आने लगा है, जब पापा मेरे सामने बैठे हैं — बिल्कुल चुप, जैसे कोई पुरानी किताब जो बहुत बार पढ़ी जा चुकी हो, पर अब कोई उसे खोलता नहीं।
पापा पहले बहुत बोलते थे। सुबह अख़बार के साथ उनकी आवाज़ घर की हर दीवार से टकराती थी — “देखो, ये सरकार क्या कर रही है!” या फिर “आज का मौसम बढ़िया है, चलो टहलने चलते हैं।” अब वो कम बोलते हैं। कभी-कभी कुछ कहना चाहते हैं पर शब्द गले में अटक जाते हैं। आँखों में एक बेचैनी होती है, जैसे कुछ याद करने की कोशिश में हों, और फिर हार मान जाते हों।
मैं काम में इतना व्यस्त रहता हूँ कि सुबह बस उनके कमरे का दरवाज़ा खोलकर देख लेता हूँ — “सब ठीक है ना पापा?”
वो बस मुस्कुरा देते हैं।
शाम को लौटता हूँ तो वही मुस्कान, वही चुप्पी।
पहले माँ होती थीं तो घर में हर समय कुछ न कुछ चलता रहता था। माँ उनके साथ बातें करतीं, उनका ध्यान रखतीं, टीवी पर उनके पसंद के पुराने गाने चलातीं। माँ के जाने के बाद घर का माहौल जैसे किसी ने अचानक “म्यूट” कर दिया हो।
आज दफ्तर से जल्दी लौट आया था। बारिश हो रही थी और मन कुछ बेचैन था। सोचा, थोड़ा वक्त पापा के साथ बिताता हूँ।
कमरे का दरवाज़ा खोला तो हल्की-सी सीलन की गंध आई। पापा खिड़की के पास कुर्सी पर बैठे बाहर देख रहे थे। उनके हाथ में माँ की पुरानी शॉल थी, जिसे वो अकसर गले में डाल लिया करते हैं — चाहे गर्मी ही क्यों न हो।
मैंने कहा, “पापा, ये शॉल अब पुरानी हो गई है, छोड़ दीजिए इसे।”
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “तेरी माँ की खुशबू आती है इसमें।”
मैं कुछ बोल नहीं पाया।
बिस्तर के पास रखी मेज पर दवाइयाँ बिखरी थीं। शायद आज उन्होंने समय पर नहीं लीं। मैं उन्हें उठाकर सेट करने लगा तो पापा बोले, “बेटा, तू इतना काम करता है, थक जाता होगा। मेरे लिए इतना मत किया कर।”
मैंने कहा, “पापा, अब आपकी देखभाल मेरा काम है।”
उन्होंने हँसकर कहा, “पहले मैं तुझे खिलाता था, अब तू मुझे खिला रहा है... हिसाब बराबर हुआ।”
उनकी वो धीमी सी हँसी सुनकर मेरे गले में कुछ अटक गया।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा, वो पुराने एलबम के पन्ने पलट रहे थे।
“ये देखो,” उन्होंने कहा, “तूने यहाँ पहली बार स्कूल की ड्रेस पहनी थी। याद है, कितना रोया था तू?”
मैं मुस्कुरा दिया, “हाँ पापा, और आप मेरी टिफिन में रोज़ आलू के पराँठे रखते थे, जिससे मैं खुश रहूँ।”
“तू अब भी वही खाता है?” उन्होंने पूछा।
“अब कौन बनाता है पापा?”
उन्होंने चुपचाप एलबम बंद कर दी।
मुझे महसूस हुआ — घर में सिर्फ एक एलबम नहीं, बहुत सी बातें भी बंद हो चुकी हैं।
रात को बारिश थम चुकी थी। मैं अपने कमरे में था, तभी पापा की खाँसी की आवाज़ आई। भागकर गया तो देखा — उन्होंने पानी गिरा दिया था और उनकी पैंट गीली थी।
मुझे देखकर घबरा गए। बोले, “माफ़ करना बेटा, मुझसे नहीं संभलता अब।”
वो कांप रहे थे, आँखों में डर था, शर्म भी।
मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी छाती पर पत्थर रख दिया हो। वही पापा जिन्होंने बचपन में मेरी सारी गंदगी साफ की थी, जिन्हें मैंने कभी थकते नहीं देखा, आज इतने असहाय लग रहे थे।
मैंने कुछ नहीं कहा, बस झुककर उनके कपड़े बदलने लगा।
उन्होंने रोके जाने की कोशिश की, “नहीं बेटा, मत कर, तेरी माँ होती तो वो कर देती, पर तू...”
मैंने उनका हाथ थामा और कहा, “पापा, जब मैं छोटा था, आप भी तो मेरे साथ यही करते थे। अब मेरी बारी है।”
उनकी आँखों से आँसू बह निकले। मैंने उनका सिर अपने सीने से लगाया।
कहने लगे, “मैं बोझ बन गया हूँ ना बेटा?”
मैंने जल्दी से कहा, “नहीं पापा, आप मेरे सिर का साया हैं। बस कभी-कभी मैं भूल जाता हूँ कि आप भी थक जाते हैं।”
उनकी साँसें थोड़ी धीमी थीं। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और कंबल ओढ़ाया। वो मेरा चेहरा देख रहे थे, जैसे बरसों बाद पहली बार देख रहे हों।
“याद है बेटा,” उन्होंने कहा, “जब तू दसवीं में फेल हुआ था, सबने डाँटा था, पर मैंने तुझसे कहा था कि फेल होना गलत नहीं, कोशिश न करना गलत है।”
मैं मुस्कुराया, “हाँ पापा, उसी दिन आपने कहा था कि इंसान की असली पहचान उसके हारने पर नहीं, उठने पर होती है।”
“बस,” उन्होंने धीरे से कहा, “अब मैं थक गया हूँ, पर खुश हूँ कि तू अब भी वही है।”
उनका हाथ धीरे-धीरे मेरे हाथ से ढीला पड़ने लगा।
मैंने घबराकर उन्हें हिलाया, “पापा... पापा!”
उन्होंने आँखें खोलीं और कहा, “मत डर बेटा... मैं कहीं नहीं जा रहा, बस थोड़ा आराम कर रहा हूँ।”
मैंने पूरी रात उनके पास बैठकर बिताई।
उनकी साँसों की आवाज़ अब भी सुनाई दे रही थी — धीमी, पर स्थिर।
सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में पड़ी, तो उन्होंने आँखें खोलीं और मुस्कुराए।
“नींद आ गई पापा?” मैंने पूछा।
“हाँ बेटा,” उन्होंने कहा, “बहुत सालों बाद चैन से सोया हूँ।”
मैंने उनके सिर पर हाथ फेरा।
वो बोले, “तेरी माँ कहती थी, जब बेटा बड़ा होगा, तो तू उसके सहारे जिएगा। आज समझ आया, वो गलत नहीं थी।”
उनकी आँखों में अब कोई डर नहीं था, बस सुकून था।
उस दिन से मैंने ऑफिस का टाइम कम कर दिया।
हर सुबह उनके साथ नाश्ता करता हूँ, साथ में अख़बार पढ़ता हूँ। वो अब भी वही पुरानी बातें दोहराते हैं — “ये सरकार कुछ नहीं कर रही,” “तेरे बचपन में तो ऐसी बारिश होती थी।”
और मैं अब मुस्कुराकर सुनता हूँ।
अब उनकी बातों में मुझे झुंझलाहट नहीं होती, अपनापन महसूस होता है।
कभी-कभी लगता है, मैं फिर से बच्चा बन गया हूँ — और वो फिर से मेरे सुपर पापा।
बस फर्क इतना है कि अब मैं उन्हें सहारा देता हूँ, जैसे उन्होंने मुझे दिया था।
ज़िंदगी का ये चक्र पूरा हो गया —
जहाँ एक दिन उन्होंने मुझे चलना सिखाया था,
आज मैं उन्हें थामे धीरे-धीरे उनके आख़िरी रास्ते पर साथ ले जा रहा हूँ।
और यकीन मानिए, इस सफ़र में मैंने जाना —
माँ सही कहती थीं,
“बच्चे कभी बूढ़े नहीं होते, पर एक दिन वो अपने बच्चों के लिए बूढ़े हो जाते हैं।”
लेखक : विनय कुमार मिश्रा
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