संदीप और निखिल — दोनों कॉलेज के ज़माने से गहरे दोस्त थे। पढ़ाई खत्म होने के बाद दोनों ने अपने-अपने रास्ते चुन लिए। संदीप को सरकारी नौकरी मिल गई और निखिल ने अपने पिता की छोटी सी दुकान संभाल ली। दोनों के बीच का रिश्ता अब भी वैसा ही था — बेफ़िक्री, अपनापन और एक-दूसरे के लिए हमेशा तैयार रहने वाला।
सालों बीत गए। ज़िंदगी की रफ़्तार के साथ दोनों की दुनिया भी बदलने लगी। संदीप अब एक बड़े शहर में अफ़सर था, वहीं निखिल छोटे से कस्बे में अपनी किराने की दुकान से घर चला रहा था। पर हर त्योहार, हर जन्मदिन पर दोनों एक-दूसरे को याद करते थे।
एक दिन निखिल को पता चला कि संदीप अपने परिवार के साथ उसी शहर में एक बड़े बंगले में शिफ्ट हुआ है। उसने सोचा, "चलो, दोस्त से मिलकर आते हैं, बहुत दिन हो गए बातें किए।"
निखिल शाम को मिठाई का डिब्बा लेकर संदीप के घर पहुँचा। दरवाज़े पर नौकर खड़ा था। उसने अंदर जाकर खबर की। कुछ देर बाद संदीप की पत्नी, कृति, आईं।
"जी, आप कौन?"
"मैं निखिल... संदीप का दोस्त। कॉलेज में साथ थे," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
कृति ने ऊपर से नीचे तक उसे देखा — पुराने कपड़े, धूल भरे जूते और एक सस्ती मिठाई का डिब्बा।
"अभी वो बिज़ी हैं, ऑफिस की मीटिंग चल रही है। आप कभी और आ जाइएगा," कहकर वो वापस अंदर चली गई।
निखिल ने बस एक पल के लिए दरवाज़े की ओर देखा, फिर मुस्कुराकर कहा, "कोई बात नहीं, फिर मिल लेंगे," और धीरे-धीरे लौट गया।
घर आते-आते मिठाई का डिब्बा ठंडा हो गया था, और दिल भी।
दिन बीतते गए। निखिल की माँ बीमार रहने लगीं। दुकान का काम भी कमजोर पड़ गया। उसने कई बार बड़े दुकानदारों से उधार माँगा, पर सबने टाल दिया। आख़िर में उसने तय किया कि संदीप से मदद माँगेगा। दोस्त तो दोस्त होता है, ना?
वो अगले दिन बैंक से कुछ पुराने कागज़ लेकर संदीप के ऑफिस गया। संदीप उस वक्त अपने केबिन में बैठा था। उसे देखकर पहले तो हैरान हुआ, फिर मुस्कुराया, "अरे निखिल! तू यहाँ कैसे?"
"यार, माँ की तबियत ठीक नहीं है। थोड़ा उधार चाहिए। सोच रहा था कुछ महीनों में लौटा दूँगा।"
संदीप का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया।
"देख निखिल, मैं तेरा दर्द समझता हूँ, लेकिन अभी तो मेरा भी बहुत खर्च चल रहा है — बच्चों की फीस, होम लोन... और ऑफिस में भी कुछ प्रॉब्लम चल रही है।"
निखिल ने कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ धीमी हो गई, "ठीक है यार, कोई बात नहीं।"
संदीप ने उसका कंधा थपथपाया, "हिम्मत रख, सब ठीक हो जाएगा।"
निखिल बाहर निकल गया। बारिश शुरू हो चुकी थी। वो भीगता हुआ घर लौटा, और भीतर से कुछ बुझ सा गया।
कुछ महीनों बाद संदीप के इलाके में बाढ़ आ गई। पानी का स्तर इतना बढ़ा कि कई घरों में पानी भर गया। कृति और बच्चे बाहर फँस गए। संदीप बेचैन होकर अपने परिवार को बचाने की कोशिश कर रहा था, पर रास्ते बंद थे।
उसी समय एक नाव किनारे पहुँची। उसमें एक आदमी था, सिर पर प्लास्टिक की टोपी, शरीर पर पुराना रेनकोट। वो चिल्लाया, “संदीप! जल्दी आओ, बच्चों को नाव में बैठाओ!”
संदीप ने ध्यान से देखा — वो निखिल था।
वो बिना कुछ सोचे दौड़ा, अपने बच्चों को नाव में बिठाया, कृति को संभाला। रास्ते में पानी बहुत तेज़ था। नाव कई बार डगमगाई, पर निखिल ने हिम्मत नहीं हारी। उसने बच्चों को अपनी गोद में बैठाया, और कृति को ढाढ़स दिया।
किसी तरह सब सुरक्षित किनारे पहुँचे। संदीप ने राहत की साँस ली, पर जब मुड़कर देखा — निखिल नहीं था।
वो घबरा गया। लोगों के बीच दौड़ा, चिल्लाया, “निखिल कहाँ है?”
किसी ने बताया कि नाव पलटते वक्त उसने किसी बच्चे को बचाने के लिए छलाँग लगाई थी।
थोड़ी देर बाद लोगों ने उसे बाहर निकाला। वो बेहोश था, पर साँस चल रही थी। डॉक्टर ने कहा, “थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन अब ख़तरा टल गया है।”
अगले दिन अस्पताल में संदीप बैठा था। उसकी आँखों से आँसू थम नहीं रहे थे।
निखिल ने कमजोर आवाज़ में कहा, “तू तो हमेशा कहता था ना, दोस्ती ज़रूरत पर नहीं निभाई जाती। बस याद रह गई थी वो बात।”
संदीप उसके हाथ पकड़कर बोला, “निखिल, मैंने बहुत बड़ी गलती की है। उस दिन तू जब मेरे घर आया था, मैं अंदर ही था... पर मैंने कृति को कहने दिया कि मैं बिज़ी हूँ।”
निखिल ने बस हल्की सी मुस्कान दी, “अब तो वक्त ने सब बराबर कर दिया यार... तू मुझे माफ़ कर दे अगर मैं तुझे परेशान कर गया था।”
संदीप ने कहा, “माफ़ी तो मुझे माँगनी चाहिए। तूने जो किया, वो सिर्फ़ दोस्त नहीं, भाई ही कर सकता है।”
निखिल कुछ दिनों में ठीक हो गया। बाढ़ के बाद संदीप ने उसे घर बुलाया।
कृति ने खुद दरवाज़ा खोला, उसके पाँव छूए और कहा, “उस दिन की शर्मिंदगी आज तक दिल में थी। आपने हमारे परिवार को बचाया है, हम ये एहसान कभी नहीं भूल सकते।”
संदीप ने उसकी दुकान फिर से बनवाने की पूरी जिम्मेदारी ली। निखिल की माँ के इलाज का खर्च भी खुद उठाया।
धीरे-धीरे दोनों परिवार फिर से वैसे ही करीब हो गए जैसे पुराने दिनों में थे।
एक दिन जब निखिल ने अपना पुराना कर्ज़ लौटाने की बात छेड़ी, तो संदीप हँस पड़ा,
“कर्ज़? कौन सा कर्ज़? तूने मेरा परिवार लौटाया है यार, इस दुनिया में इससे बड़ी कोई कीमत नहीं।”
निखिल ने कहा, “फिर भी, दोस्ती का हक़ बराबरी का ही होता है।”
संदीप ने उसका हाथ थामा और बोला,
“बराबरी? अब हम सिर्फ़ दोस्त नहीं, भाई हैं।”
दोनों की आँखें नम हो गईं।
वो शाम देर तक बरामदे में बैठे बातें करते रहे —
उन दिनों की, जब उनके पास पैसे नहीं थे, पर दिल बहुत अमीर था।
लेखिका : विभा गुप्ता
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