सुबह की हल्की धूप पड़ोसी के आँगन में फैली हुई थी। जानकी जी अपनी चौकी पर बैठी तुलसी को पानी दे रही थीं। चेहरे पर वही स्थायी मुस्कान, जो किसी भी मुश्किल वक़्त में भी मिटती नहीं थी। तभी उनकी पड़ोसन, विमला जी, जल्दी-जल्दी आती हुई बोलीं—
"जानकी दीदी! सुना आपने? इस बार वृंदावन में बहुत बड़ा भागवत-ज्ञान यज्ञ हो रहा है। संत पुरुष खुद प्रवचन देंगे! हम सब मोहल्ले की औरतें जा रही हैं। आप भी चलिए ना दीदी!"
जानकी जी ने पानी की लोटी नीचे रखी और मुस्कुराते हुए बोलीं,
"विमला बहन, आप सब जाओ। मैं इस बार नहीं जा पाऊँगी।"
"अरे दीदी! ये क्या बात हुई? पिछले महीने तो आप ही सबसे पहले कह रहीं थीं कि इस बार तो यज्ञ में जरूर जाना है। अब अचानक मन कैसे बदल गया?"
जानकी जी बस मुस्कुरा दीं, "कभी-कभी जाने से ज़्यादा, किसी को रहने की ज़रूरत होती है विमला बहन।"
विमला ने ज्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन उन्हें लगा — शायद जानकी जी फिर पैसों की चिंता में हैं।
कुछ दिनों बाद मोहल्ले की औरतें वृंदावन के यज्ञ में चली गईं। लौटकर वे बड़े गर्व से बताने लगीं — "दीदी! वहाँ तो माहौल ही स्वर्ग जैसा था। संत जी ने कितना अच्छा बताया कि कैसे सेवा ही भक्ति है। जो दूसरों के लिए कुछ करता है, वही सच्चा धर्म निभाता है।"
जानकी जी मुस्कुराती रहीं, "हाँ, सही कहा संत जी ने।"
विमला को फिर भी कहीं न कहीं खटक थी — जो खुद इतने धार्मिक हैं, वो ऐसे शुभ अवसर को छोड़ कैसे सकती हैं?
अगले दिन विमला जी किसी काम से जानकी जी के घर गईं। दरवाज़े पर ठिठक गईं, क्योंकि अंदर से किसी की रोने की आवाज़ आ रही थी।
"अम्मा जी... अगर आप न होतीं तो मेरा घर तो उजड़ ही जाता।"
विमला ने झाँककर देखा — उनकी कामवाली, सवित्री, जानकी जी के पाँव छू रही थी।
जानकी जी ने उसे उठाते हुए कहा, "बस-बस सवित्री, भगवान पर भरोसा रख। सब ठीक हो जाएगा।"
"अम्मा जी," सवित्री ने काँपती आवाज़ में कहा, "आपने अपने सारे पैसे मेरे बच्चे की दवाई में लगा दिए। मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि आप इतना बड़ा त्याग करेंगी।"
जानकी जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"बेटी, अगर तेरे बच्चे को राहत मिली, तो समझो मेरा यज्ञ पूरा हो गया। अब जा, दवा का समय हो गया होगा।"
उन्होंने उसके हाथ में कुछ और पैसे रखे, "ये अगले हफ़्ते की दवा के लिए हैं।"
सवित्री आँसू पोंछते हुए चली गई।
विमला कुछ देर वहीं खड़ी रह गईं। उनके कानों में अब संत का वो वाक्य गूँज रहा था — “जो दूसरों के लिए कुछ करता है, वही सच्चा धर्म निभाता है।”
उन्हें खुद पर शर्म आने लगी कि उन्होंने जानकी जी के बारे में क्या-क्या सोच लिया था।
वो अंदर आईं तो जानकी जी हँसकर बोलीं,
"अरे विमला बहन! यज्ञ की यात्रा कैसी रही? कितना अच्छा अनुभव होगा आपको!"
विमला की आँखें नम हो गईं। उन्होंने धीरे से कहा,
"दीदी, जो पुण्य हम वहाँ जाकर नहीं कमा सके, वो आपने यहीं रहकर कमा लिया। आपने तो असली यज्ञ कर लिया — दया और त्याग का।"
जानकी जी ने शांत स्वर में कहा,
"हम सबके हिस्से में अलग-अलग सेवा होती है विमला। कोई मंदिर में दीप जलाता है, कोई किसी की आँखों में उम्मीद। दोनों ही पूजा हैं। फर्क सिर्फ़ जगह का होता है, नीयत का नहीं।"
विमला उठने लगीं। जाते-जाते बोलीं,
"दीदी, अब समझ आया — पुण्य नदी में डुबकी लगाने से नहीं, किसी की आँखों से आँसू मिटाने से मिलता है।"
जानकी जी मुस्कुरा दीं,
"बिलकुल बहन, यही तो असली तीर्थ है — जहाँ इंसानियत की धारा बहती है।"
विमला के कदम भारी थे, मगर मन हल्का।
घर लौटते हुए उन्होंने मन ही मन कहा,
“संत जी का प्रवचन तो वहाँ सुना था, लेकिन उसका अर्थ आज यहाँ देखा — जानकी दीदी के घर में।”
लेखिका : विभा गुप्ता
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