“अरे सुनो लता! बड़ी खुशखबरी है — हमारी सोनल की शादी तय हो गई है!”
फ़ोन के उस पार से आवाज़ आई — शकुंतला देवी का स्वर उत्साह से कांप रहा था।
“सच, दीदी?” लता बोली, “कब है शादी?”
“अगले महीने के पहले हफ़्ते में! सब तैयारी शुरू कर दी है। ज़रा सोचो, मेरी सोनल अब दुल्हन बनेगी!”
फ़ोन रखकर शकुंतला देवी देर तक मुस्कुराती रहीं। आँखों में खुशी के साथ पुरानी यादों का समंदर उमड़ आया।
उन्हें याद आया जब उनकी शादी के कुछ साल बाद पहला बच्चा हुआ था — बेटा दीपक। सारा घर खुशियों से भर गया था। पर जब सबने बेटे के लिए बधाइयाँ दीं, शकुंतला देवी के दिल में एक छोटी सी टीस उठी — “काश, बेटी होती।”
उनके पति ओमप्रकाश ने हँसते हुए कहा था,
“अरे क्यों चिंता करती हो? बेटा-बेटी दोनों एक समान होते हैं।”
पर शकुंतला ने धीरे से कहा था,
“हाँ, पर बेटियों की खिलखिलाहट से ही घर में असली रौनक आती है।”
क़िस्मत को शायद उनकी यह बात सुननी नहीं थी। दीपक के तीन साल बाद जब दूसरा बच्चा हुआ, वो भी बेटा था — मनीष।
लोग कहते, “बहुत भाग्यशाली हो, दो-दो बेटे हैं।”
पर शकुंतला मुस्कुराकर रह जातीं। भीतर कहीं एक खालीपन था — वह छोटी-सी गुड़िया जिसे वो लाल फ्रॉक पहनातीं, बालों में रिबन बांधतीं, बाज़ार से झुमके और गुड़िया खरीदतीं — वो कहीं नहीं थी।
वो जब भी मोहल्ले की औरतों को अपनी बेटियों के साथ बाज़ार जाते देखतीं, तो उनकी आँखों में हल्की सी नमी तैर जाती।
एक दिन ओमप्रकाश ने कहा,
“तुम हर वक्त उदास रहती हो। देखना, जब ये दोनों बड़े होंगे, तब उनकी बेटियाँ तुम्हारे सारे अरमान पूरे करेंगी।”
शकुंतला मुस्कुरा दी थीं, “तब तक तो मैं बूढ़ी हो जाऊँगी।”
ओमप्रकाश ने कहा, “अरे नहीं, दादी भी तो माँ जैसी होती है। बस इंतज़ार करना।”
सालों बीत गए। दोनों बेटे बड़े हुए। दीपक पिता के व्यवसाय में जुड़ गया और मनीष ने इंजीनियरिंग पास करके सरकारी नौकरी पा ली।
शकुंतला को अब ज़िंदगी की रफ़्तार थोड़ी थमी सी लगती थी, पर दिल में वही अधूरी चाह अब भी धड़कती थी।
फिर एक दिन दीपक की शादी हुई। कुछ महीनों बाद दीपक की पत्नी ने बेटे को जन्म दिया। घर में खुशियाँ छा गईं, पर शकुंतला को मन में फिर वही टीस हुई — “फिर से बेटा।”
उन्होंने बस भगवान से यही कहा,
“हे देवी माँ, इस बार कोई नन्ही सी बिटिया भेज दो।”
और भगवान ने सुन ली।
मनीष की शादी के डेढ़ साल बाद जब उसकी पत्नी ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया, तो शकुंतला की खुशी का ठिकाना न रहा।
“मेरी बिटिया आ गई!” वो चिल्लाईं, “अब मैं अपने सारे अरमान पूरे करूंगी।”
उसी दिन उन्होंने बाज़ार जाकर गुलाबी फ्रॉक, छोटे-छोटे क्लिप, पायल और खिलौने खरीदे।
जब नन्ही सोनल पहली बार उनकी गोद में आई, तो उन्होंने कहा,
“अब इस घर में सचमुच रौनक आ गई।”
सोनल जब चलने लगी तो उसकी पायल की झंकार पूरे घर में गूंजने लगी। शकुंतला हर दिन उसके लिए कुछ नया बनातीं — कभी गुड़िया का स्वेटर, कभी उसके बालों के लिए नया रिबन।
सालों बाद जब सोनल कॉलेज जाने लगी, तो शकुंतला उसे देखते ही मुस्कुरा उठतीं। उन्हें लगता, जैसे वो खुद अपनी अधूरी इच्छाओं को सोनल में पूरा होते देख रही हैं।
एक दिन सोनल बोली,
“दादी, मैं एयर होस्टेस बनना चाहती हूँ। दुनिया घूमना है मुझे।”
शकुंतला ने मुस्कुराते हुए कहा,
“जा बेटी, जी ले अपने सपने। जब बेटी के सपने पूरे होते हैं, तो माँ का मन भी सुकून पाता है।”
सोनल ने ट्रेनिंग ली, नौकरी मिली, और उसने आसमान को अपना घर बना लिया।
तीन साल में उसने बहुत कुछ देखा — कई देशों में घूमी, आत्मनिर्भर बनी, और फिर एक दिन घर लौटकर बोली,
“दादी, मुझे एक अच्छा साथी मिल गया है — मयंक नाम है उसका, हमारी ही कंपनी में काम करता है।”
शकुंतला की आँखों में आँसू थे।
“तो अब मेरी बिटिया दुल्हन बनेगी!”
शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। शकुंतला हर रस्म में खुद शामिल होतीं। कभी हल्दी घोलतीं, कभी मेहंदी बनातीं, कभी गीत गातीं —
“मेरी लाडो प्यारी, आज दुल्हन बन जाएगी…”
वो सोनल के हाथों में मेहंदी लगाती हुई बोलीं,
“देख बेटा, जब तू पैदा हुई थी, तभी मैंने सोच लिया था कि तुझे अपनी बिटिया की तरह सजाऊंगी, सिंगारूंगी। आज वो दिन आ गया।”
सोनल ने मुस्कुराकर कहा,
“दादी, आप तो मेरी माँ से भी ज़्यादा खुश लग रही हैं।”
“अरे बेटा, तू नहीं जानती। तेरे लिए मैं उन अरमानों को जी रही हूँ जो कभी पूरे नहीं हुए थे।”
शादी के दिन जब सोनल लाल जोड़े में मंडप पर आई, तो शकुंतला की आँखें नम हो गईं।
पंडित जी के मंत्रों के बीच उन्होंने भगवान से कहा,
“अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस इस बच्ची का घर हमेशा खुशियों से भरा रहे।”
रसमें पूरी हुईं। बारात रवाना हुई। सोनल ने दादी के पैर छुए और बोली,
“दादी, मैं जहाँ भी रहूँगी, आपकी हर सीख याद रखूँगी।”
शकुंतला ने उसे सीने से लगाते हुए कहा,
“बेटी, अब तो मेरे सारे अरमान पूरे हो गए। अब बस एक ही दुआ — तू जहाँ भी रहे, वहाँ हर दिन खुशियों की छम-छम बजे।”
गाड़ी धीरे-धीरे दूर चली गई।
सावन की हवा में पायल की वही झंकार अब भी सुनाई दे रही थी —
मानो वो कह रही हो,
“देखो दादी, आपकी बिटिया उड़ चली, पर आपके सपने अपने साथ ले गई है।”
शकुंतला बरामदे में बैठी मुस्कुराईं। आँखों में आँसू थे, लेकिन दिल में सुकून था।
उन्हें लगा — जिन अरमानों को उन्होंने उम्रभर दबाए रखा, वो आज फूलों की तरह खिल उठे हैं।
विभा गुप्ता
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