फोन की घंटी अचानक बजी तो **नेहा** उस वक्त रसोई में थी। उसने हाथ पोंछते हुए फोन उठाया — उधर से **जीजा जी** की आवाज़ थी, “नेहा… तुम्हारी दीदी को दिल का दौरा पड़ा है… हालत गंभीर है।”
नेहा के हाथ से फोन लगभग छूट गया। उसकी साँस रुक सी गई। उसके सामने बरसों पुरानी यादों का सैलाब उमड़ पड़ा।
तीन साल पहले तक नेहा और उसकी दीदी **रीमा** एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं सकती थीं। बचपन से ही दोनों में गहरा लगाव था। रीमा उससे पाँच साल बड़ी थी, मगर हमेशा उसे अपनी बेटी की तरह संभालती रही। माँ के जाने के बाद तो रीमा ने घर की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर ले ली थी।
जब रीमा की शादी हुई थी, तो नेहा ने खुद हाथों से उसकी साड़ी चुनी थी, हाथों पर मेहंदी लगाई थी। और फिर जब बारात आई, तो नेहा ही थी जो सबसे ज़्यादा रो रही थी। रीमा ने जाते वक्त कहा था, “अब से तू मेरी आधी ज़िंदगी है नेहा, तू खुश रहे, तो मैं खुश रहूँगी।”
लेकिन वक़्त के साथ सब कुछ बदल गया।
शादी के बाद रीमा शहर के दूसरे छोर पर चली गई। जीजा जी बड़े उद्योगपति थे, पर उनका परिवार परंपराओं में बँधा हुआ था। वहाँ नेहा को कभी खुलकर अपनापन नहीं मिला।
पहली बार जब वह दीदी से मिलने गई, तो रीमा ने तो खुशी से गले लगा लिया, मगर घर के बाकी लोग ठंडे भाव से पेश आए। जीजा जी के पिता ने बस इतना कहा, “लड़कियों को ससुराल वालों के यहाँ बार-बार आना शोभा नहीं देता।”
उस दिन नेहा को बहुत बुरा लगा। लेकिन दीदी के चेहरे पर मुस्कान देखकर उसने चुप्पी साध ली।
फिर वक़्त बीतता गया। दीदी के यहाँ एक बेटी हुई — **सिया**। उस वक्त नेहा की शादी भी हो चुकी थी। उसके पति **सौरभ** सरकारी कॉलेज में प्राध्यापक थे, शांत स्वभाव के, समझदार।
शादी के बाद भी नेहा ने रिश्ते निभाने की कोशिश की। त्योहारों पर मिठाई लेकर दीदी के घर जाती, पर हर बार वही अजीब सी ठंडक, वही दूरी।
एक बार रक्षा बंधन पर जब वह पहुँची, तो दीदी ने तो उसे प्यार से गले लगाया, मगर जीजा जी ने बस औपचारिकता निभाई। खाना तक उन्होंने अलग मेज पर परोसा।
शाम को जब नेहा लौटने लगी, तो दीदी ने कुछ पैसे और साड़ी देते हुए कहा,
“ले जा नेहा, इसे याद के तौर पर रख ले।”
नेहा के हाथ काँप उठे, “दीदी, मैं लेने नहीं, बाँधने आई थी।”
रीमा की आँखें भी नम हो गईं, पर ससुराल के दबाव में वो कुछ कह न सकीं।
नेहा लौटते वक्त सोचती रही — “रिश्ते क्या इतने कमजोर हो जाते हैं कि सम्मान और प्यार दिखाने की भी जगह नहीं बचती?”
इसके बाद उसने तय कर लिया कि जब तक कोई ज़रूरत न पड़े, वह अब खुद से उस घर नहीं जाएगी।
फिर एक दिन फोन आया — जीजा जी का।
उनकी आवाज़ में बेचैनी थी।
“नेहा, तुम्हारी दीदी बहुत बीमार हैं… अचानक तबियत बिगड़ गई है, अस्पताल में जगह नहीं मिल रही।”
नेहा का दिल धड़क उठा।
“क्या? अस्पताल में जगह नहीं?”
“हाँ, कोरोना की वजह से हर जगह मना कर दिया गया है। हालत गंभीर है।”
नेहा ने बिना देर किए कहा, “आप चिंता मत कीजिए, मैं कुछ करती हूँ।”
उसने सौरभ की ओर देखा, “हमें रीमा दीदी को बचाना है।”
सौरभ ने तुरंत अपने संपर्कों से बात की। कॉलेज के माध्यम से शहर के सरकारी अस्पताल के मुख्य चिकित्सक से संपर्क किया। कुछ घंटे की दौड़-धूप के बाद उन्हें एक बिस्तर मिल गया।
रात के साढ़े ग्यारह बजे जब एम्बुलेंस रीमा को लेकर अस्पताल पहुँची, तो नेहा और सौरभ पहले से वहाँ मौजूद थे।
डॉक्टरों ने कहा, “आप लोग सही समय पर पहुँचे हैं, थोड़ी भी देरी होती तो मुश्किल हो जाती।”
तीन दिन तक नेहा अस्पताल में ही रही। न खाना, न नींद। बस दीदी के लिए प्रार्थना।
हर सुबह ICU के बाहर खड़ी होकर पूछती,
“डॉक्टर साहब, कैसी हैं दीदी?”
“अभी हालत स्थिर है,” जवाब मिलता।
चौथे दिन डॉक्टर ने कहा, “अब डर की कोई बात नहीं।”
नेहा ने पहली बार राहत की साँस ली।
जब रीमा को होश आया, तो सबसे पहले उसने देखा — नेहा खड़ी थी, आँखों में आँसू, चेहरे पर मुस्कान।
“तू… तू यहाँ?” उसने धीमे से कहा।
“हाँ दीदी, मैं कहाँ जाने वाली थी?”
रीमा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने नेहा का हाथ पकड़कर कहा,
“मुझे माफ़ कर दे नेहा… मैं चाहकर भी तुझसे दूर हो गई थी। ससुराल वालों की बातें सुनकर खुद को रोक नहीं पाई। पर अब समझ आई है कि अपनों से बड़ा कोई नहीं।”
नेहा ने सिर झुकाकर कहा,
“दीदी, वक्त हर चीज़ सिखा देता है। बस अब आप ठीक हो जाइए, बाकी सब बातें बाद में।”
जब अस्पताल से छुट्टी मिली, तो जीजा जी ने सौरभ से हाथ जोड़कर कहा,
“आप दोनों ने जो किया, वो शायद हम कभी न कर पाते। अब समझ आया, रिश्ते सिर्फ़ नाम से नहीं, भावनाओं से चलते हैं।”
रीमा ने नेहा को गले लगाते हुए कहा,
“आज महसूस हुआ, बहन सिर्फ़ बचपन का रिश्ता नहीं होती, वो ज़रूरत के वक्त भगवान का रूप होती है।”
सौरभ मुस्कुराए और बोले,
“जीवन में संकट सबसे बड़ा शिक्षक होता है। ये हमें सिखाता है कि कौन अपना है और कौन केवल नाम का।”
रीमा ने कहा,
“हाँ सौरभ जी, अब मैं जानती हूँ — रिश्तों की पहचान वक़्त ही कराता है। जो कठिन समय में साथ खड़े रहें, वही सच्चे अपने हैं।”
नेहा मुस्कुराते हुए बोली,
“दीदी, ये वक्त हमारी कसौटी था, और हमने इसे पार कर लिया।”
घर लौटते वक्त सिया ने आकर नेहा का हाथ थामा,
“मासी, आप मेरी सुपरहीरो हो।”
नेहा ने हँसते हुए कहा,
“नहीं बेटा, सुपरहीरो तो तेरी माँ है — जिसने ज़िंदगी से हार नहीं मानी।”
शाम ढल चुकी थी। सूरज की आख़िरी किरणें आकाश में बिखर रही थीं।
नेहा ने पीछे मुड़कर देखा — रीमा के चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान लौट आई थी, वही जो बरसों पहले उसके विवाह के दिन थी।
उसने मन ही मन कहा —
“रिश्तों को वक्त चाहिए, पर जब वो सच्चे हों, तो लौटकर ज़रूर आते हैं।”
उस रात नेहा की आँखों में नींद नहीं थी, मगर मन में संतोष था।
कभी-कभी ज़िंदगी हमें वही सबक सबसे कठिन हालात में सिखाती है —
**कि सच्चे रिश्ते वे नहीं जो हर खुशी में साथ हों, बल्कि वे हैं जो वक्त पर काम आएँ और दिल से अपना कर्तव्य निभाएँ।**
लेखिका- डॉ बीना कुण्डलिया
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