हर घर में इज़्ज़त होती है,

 “ए जी, सुनते हैं, शर्मा जी की बहू कल फिर किसी के साथ कार में बाज़ार में घूमती दिखी थी।”

मीना अपने पति अरविंद से बोली, जो अख़बार पढ़ रहे थे।

अरविंद ने अख़बार से सिर उठाया और बोले, “मीना, तुम्हें हर किसी के घर में झाँकने की इतनी फुर्सत कहाँ से मिल जाती है? कभी किसी के बेटे पर, तो कभी किसी की बहू पर उंगली उठा देती हो। अपनी ज़िंदगी में थोड़ा ध्यान दो।”

मीना मुस्कुरा कर बोली, “अरे मैं तो बस बता रही थी, आजकल की लड़कियाँ तो हद पार कर रही हैं, ज़रा-ज़रा सी आज़ादी मिली नहीं कि बिगड़ जाती हैं। हमारी पीढ़ी होती थी — नज़रों में शर्म, दिल में संकोच। और देखो अब — कोई मर्यादा ही नहीं रही।”

अरविंद ने अख़बार मोड़ा और बोले, “तुम्हें याद है, तुम भी तो यही बातें तब कहती थीं जब गुप्ता जी की बेटी नीता की शादी टूटी थी? सबको बताया था कि वो किसी के साथ भाग गई है। बाद में पता चला था कि लड़के वालों ने दहेज मांगा था। दूसरों की ज़िंदगी में ज़हर घोलने से क्या मिलता है तुम्हें?”

मीना ने आँखें तरेरीं, “हद है! हर बात में मुझे ही दोष दे देते हो। मैं तो बस सच्चाई बताती हूँ।”

अरविंद ने अख़बार फिर खोल लिया, “तुम्हारी सच्चाई नहीं, तुम्हारी आदत है मीना — दूसरों की ज़िंदगी में मीन-मेख निकालने की।”

मीना को बात चुभ गई। वह बड़बड़ाते हुए रसोई में चली गई, लेकिन मन में फिर से वही अहंकार उमड़ा — “मुझे क्या, लोग क्या करते हैं। मुझे तो बस अपनी राय देनी होती है।”

मीना के घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। अरविंद का अच्छा कारोबार था, एक प्यारी बेटी थी रिया, जो कॉलेज में पढ़ती थी। घर में सुख-सुविधाएँ थीं, मगर मीना की आदत थी कि वो दूसरों की तुलना करती रहती —
“देखो ना, वो शर्मा की बहू तो कॉलेज गई थी, अब नाक ऊँची कर घूमती है। और गुप्ता की बेटी — न जाने किस-किस से मिलती है।”

हर रोज़ गली की औरतें जब शाम को छत पर या चौखट के पास मिलतीं, तो मीना उनके बीच सबसे ज़्यादा बोलने वाली होती।
“तुम लोगों ने कल मिश्रा की बहू को देखा? पार्लर जा रही थी, दो घंटे में लौटी। पता नहीं कौन-कौन से रूप रखती है वो…”
और बाकी औरतें हँस देतीं।

लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।

समय बीता, रिया कॉलेज के दूसरे साल में आ गई। अब वह भी अपने दोस्तों के साथ ग्रुप प्रोजेक्ट करती, कभी कॉलेज के बाद कॉफी शॉप चली जाती, कभी देर से लौटती।
मीना को यह सब अखरता, पर उसे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा था।

एक दिन मोहल्ले की अनीता बोली, “मीना जी, कल आपकी बेटी को देखा मैंने, वो किसी लड़के के साथ बाइक पर जा रही थी।”
मीना के चेहरे का रंग उड़ गया।
“क्या बकवास कर रही हो? मेरी बेटी ऐसा नहीं कर सकती!”

“अरे मैंने खुद देखा अपनी आँखों से,” अनीता बोली, “आप चाहो तो पूछ लो उससे।”

मीना का दिल घबराने लगा। शाम को रिया लौटी, तो उसने तुरंत पूछा, “रिया, तू आज फिर देर से क्यों आई? वो कौन लड़का था जिसके साथ तू बाइक पर थी?”

रिया ने चौंककर कहा, “माँ, वो मेरे कॉलेज का दोस्त है। ग्रुप प्रोजेक्ट पर काम चल रहा था, इसलिए उसने छोड़ दिया।”

“हूँ, दोस्त? लड़के अब दोस्त भी बनने लगे हैं?” मीना की आवाज़ में व्यंग्य था।
रिया ने धीरे से कहा, “माँ, आजकल लड़के-लड़कियाँ साथ पढ़ते हैं, साथ काम करते हैं। इसमें गलत क्या है?”

“गलत यही है कि लोग बातें बनाएँगे! कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा?”

रिया ने गुस्से में कहा, “लोगों के सोचने की चिंता आप ही करती हैं माँ, बाकी सब जीते हैं अपनी ज़िंदगी।”

मीना का चेहरा तमतमा गया। उसने चिल्लाकर कहा, “रिया, ज़्यादा ज़ुबान मत चलाओ, मैं माँ हूँ तेरी!”
रिया बिना कुछ बोले कमरे में चली गई।

उस रात मीना बहुत बेचैन रही।
अगले दिन सुबह वह फिर मोहल्ले में बैठी थी कि कुछ औरतें बात कर रही थीं —
“सुना है, मीना की बेटी आजकल किसी लड़के के साथ घूमती है। बड़ी बातें करती थी अपनी परवरिश की, अब खुद भुगते।”
मीना का चेहरा पीला पड़ गया। वही शब्द, वही ताने जो कभी वह दूसरों पर कसा करती थी, अब उसके लिए इस्तेमाल हो रहे थे।

घर लौटी तो उसका सिर झुक गया। अरविंद ने देखा और बोले,
“क्या हुआ, आज गुमसुम क्यों हो?”
मीना ने आँसू भरे स्वर में कहा, “लोग मेरी बेटी के बारे में बातें कर रहे हैं।”
अरविंद ने शांत स्वर में कहा, “तो क्या तूने बाकी लोगों की बेटियों के बारे में कभी कम बातें की थीं? आज वही लौटकर तेरे पास आई हैं। मीना, यही दुनिया है — जो दूसरों की इज़्ज़त उछालता है, एक दिन अपनी इज़्ज़त का तमाशा देखता है।”

मीना फूट-फूटकर रो पड़ी, “मुझे समझ नहीं आता मैंने ऐसा क्यों किया। मैं तो सोचती थी मैं सच्चाई बोलती हूँ, पर वो सच्चाई नहीं थी, दूसरों की जिंदगी में दखल थी।”

अरविंद बोले, “सच्चाई वही होती है जो इंसान खुद में झाँककर बोले। दूसरों पर कीचड़ उछालने से कोई साफ़ नहीं होता, बस खुद गंदा होता जाता है।”

वो दिन मीना की जिंदगी का मोड़ था।
अब जब भी पड़ोस की औरतें दूसरों के घर की बात करतीं, वो उठकर कहती, “भाई, छोड़ो न, किसी की बेटी, बहू या बेटा क्या करता है, ये उसका घर जानता है। हम क्यों अपना वक्त इन बातों में गँवाएँ?”

धीरे-धीरे लोग समझ गए कि अब मीना गपशप नहीं करती। वो अब हर बात पर कहती,
“पहले खुद को देखो, फिर किसी और को।”

रिया ने भी अपनी माँ में ये बदलाव देखा।
एक दिन बोली, “माँ, अब आपको दूसरों की बातें करते नहीं देखती।”
मीना मुस्कुराई, “हाँ बेटा, अब समझ गई हूँ — शब्द कभी-कभी तीर से भी ज़्यादा घाव करते हैं। दूसरों की बेटी पर की गई बात किसी दिन अपनी बेटी तक लौट आती है।”

रिया ने माँ को गले लगाया।
मीना ने मन ही मन सोचा —
“काश मैंने ये बात पहले समझी होती, तो आज ये शिकन मेरे चेहरे पर न होती।”

अब जब भी कोई मोहल्ले में किसी की आलोचना करता, तो मीना बस इतना कहती —
“हर घर में इज़्ज़त होती है, उसे बचाना सीखो, मिटाना नहीं।”

और उस दिन से मीना सचमुच बदल गई थी —
दूसरों की जिंदगी में झाँकने के बजाय उसने अपनी बेटी की जिंदगी को समझना शुरू कर दिया था।

    विभा गुप्ता


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ