शिकायत

 शाम के पाँच बजे का समय था। रसोई से प्याज तड़के की खुशबू फैल रही थी। भाभी कविता थकान के बावजूद रसोई में जुटी थीं। सुबह से बुखार था, फिर भी घर में सबके आने की तैयारी कर रही थीं। आज ननद रीना मायके आ रही थी — शादी के बाद पहली बार।

दरवाज़े की घंटी बजी, और रीना अंदर आई। माँ ने प्यार से गले लगाया, “आ गई बेटा! कैसी है तू?”
रीना मुस्कुराई, “मैं ठीक हूँ मम्मी, पर भूख लगी है, जल्दी कुछ खाने को दो।”

थोड़ी देर में कविता थाली लेकर आई। गरम फुलके, मटर-पनीर की सब्ज़ी और खीर रखी थी।
रीना ने एक निवाला खाया और चेहरा बनाते हुए बोली —
“भाभी, ये कैसा खाना बनाया है आपने? ज़रा भी स्वाद नहीं है। आपको जरा भी खाना बनाना नहीं आता क्या? हद है! पता नहीं भैया कैसे झेल रहे हैं आपको।”

कविता का चेहरा उतर गया। फिर भी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली —
“दीदी, माफ़ कीजिएगा… आज तबीयत कुछ ठीक नहीं थी, ऊपर से मम्मी जी भी घर पर नहीं थीं। हो सकता है खाना वैसा न बना हो जैसा आप चाहती हैं।”

रीना ने व्यंग्य भरे लहजे में कहा —
“बस, बस रहने दो भाभी। बहाने सब जानती हूँ मैं। ननदों को देख कर भाभियों की तबियत ही खराब हो जाती है!”

इतना कहकर वह हँस पड़ी, पर कमरे में सन्नाटा छा गया।

तभी पीछे से आवाज़ आई —
“बिलकुल सही कहा तूने बेटा! ननदों को देखकर भाभियों की तबियत खराब हो जाती है…
पर फिर भी कुछ भाभियाँ तबियत खराब होने के बावजूद ननदों का सत्कार कर देती हैं। जबकि कुछ ननदें तो ससुराल से भागकर मायके चली आती हैं ताकि उन्हें अपनी सास-ससुर की सेवा न करनी पड़े!”

यह सुनकर रीना चौंक गई। उसकी माँ सुधा देवी दरवाज़े पर खड़ी थीं, चेहरे पर सख़्ती और आँखों में ठहराव था।

“मम्मी, आप मुझे ताना दे रही हैं क्या?” रीना गुस्से में बोली।
सुधा देवी शांत स्वर में बोलीं —
“नहीं बेटा, मैं तो बस सच्चाई बयान कर रही हूँ। तेरी भाभी की तबियत सच में खराब थी, फिर भी उसने तेरे लिए खाना बनाया। और तू? तू तो ननद के मायके आने की खबर सुनते ही अपने मायके भाग आई।”

रीना का चेहरा लाल पड़ गया।
“ओह, तो मेरी सास ने कर दी आपसे शिकायत? वो लोग वैसे ही हैं! इसीलिए तो मैं वहाँ रहना नहीं चाहती। एक मेरी ननद है, उसे बैठे-बैठे सब चाहिए। पता नहीं आपने कैसे परिवार में मेरी शादी कर दी! उधर देखिए भाभी के मजे हैं — सास तो उनकी साइड ले रही है!”

कविता ने चुपचाप सिर झुका लिया, जबकि सुधा देवी के सब्र का बाँध अब टूटने को था।
“तेरी सास ने कुछ नहीं कहा बेटा,” उन्होंने सख़्त आवाज़ में कहा,
“मैं खुद जानती हूँ तू कब यहाँ आती है। जब-जब तेरी सास-ससुर की कोई ननद घर जाती है, तब-तब तू ससुराल छोड़ मायके चली आती है। और आज जो तेरी ज़ुबान भाभी और ससुराल के लिए जहर उगल रही है, वो भूल मत — यही ज़हर एक दिन तुझे रिश्तों से खाली कर देगा।

मायका सिर्फ़ माँ से नहीं होता, बेटा, माँ के बाद भाभी से होता है। और ससुराल सिर्फ़ पति से नहीं होता, ससुरालवालों से होता है। लेकिन तू दोनों जगह से भाग रही है। एक दिन ऐसा आएगा कि न तेरा मायका रहेगा न ससुराल।”

रीना सन्न रह गई।
“मम्मी, आप आज मेरे खिलाफ़ क्यों बोल रही हैं?” उसने हैरान होकर कहा।

सुधा देवी की आँखों में अब दृढ़ता थी —
“मैं तेरे खिलाफ़ नहीं बोल रही, बेटा, मैं सच्चाई बोल रही हूँ। मुझे ये बात पहले ही कह देनी चाहिए थी, पर तब सोचा — तू खुद समझ जाएगी। लेकिन अब लगता है, समझाना ही पड़ेगा।

तू अपने घर की जिम्मेदारियों से भाग रही है। शादी का मतलब सिर्फ़ सजना-सँवरना नहीं होता, रिश्ते निभाना भी होता है। जब तू अपनी ननद को नहीं झेल सकती, तो तेरी सास भी तुझ पर कैसे गर्व करेगी?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।
रीना की आँखों में अब आँसू थे, पर अहंकार अब भी बाकी था।
“तो क्या अब मुझे यहाँ आने की मनाही है?” उसने धीमे स्वर में कहा।

सुधा देवी ने ठंडे स्वर में कहा —
“नहीं, मनाही नहीं, बस अब शर्त है। तू यहाँ तभी आएगी जब तेरे सास-ससुर को इस बात से कोई आपत्ति न हो। और याद रख, अगर तू अपनी ननद से भाग कर यहाँ आई, तो तेरी भाभी भी मायके आने से परहेज़ करेगी। जब तू रिश्ते निभाना नहीं जानती, तो वो क्यों निभाए?”

कविता ने मुँह उठाया। उसे भी उम्मीद नहीं थी कि माँ इतनी सख़्ती से बोलेंगी।
रीना कुछ देर तक माँ की आँखों में देखती रही। उन आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि ममता भरी सीख थी।
फिर बिना कुछ बोले वो अपने कमरे में गई, बैग उठाया और धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ी।

सुधा देवी ने उसे जाते देखा और कहा —
“बेटा, नाराज़ नहीं हूँ तुझसे। पर अब वक्त आ गया है कि तू ये समझे — मायका तब तक अपना होता है जब तक तेरा व्यवहार रिश्तों को जोड़ता है। एक दिन अगर तू खुद सब तोड़ देगी, तो फिर तुझे कोई घर नहीं कहेगा अपना।”

रीना के कदम ठिठक गए। उसकी आँखों से आँसू ढुलक पड़े। उसने माँ के पाँव छूते हुए कहा —
“मम्मी, माफ कर दीजिए। शायद मैं ही गलत थी। अब मैं सब ठीक करूँगी।”

सुधा देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा —
“जा बेटी, घर वही होता है जहाँ तू रिश्ते संभालती है। भागकर नहीं, निभाकर जीना सीख।”

रीना अपने आँसू पोंछते हुए बाहर निकली।
कविता ने देखा, तो उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
उस दिन पहली बार रीना ने जाना कि “माँ की डाँट” भी कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सीख होती है —
जो रिश्ते जोड़ना सिखा जाती है।

आपकी दोस्त

संगीता अग्रवाल


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