सुबह की पहली किरण कमरे में आई तो किरण ने आँखें खोलीं। माँ मंदिर में दीया जला रही थी। हवा में अगरबत्ती की खुशबू और घी के दीपक की लौ लहरा रही थी। किरण की शादी को अभी सिर्फ़ सात दिन हुए थे और आज उसका पहला पगफेरा था। माँ के चेहरे पर बेटी को देखने की खुशी थी, लेकिन जैसे ही उनकी नज़र किरण के चेहरे पर पड़ी, वो ठिठक गईं।
वो वही किरण थी, जो बचपन से ही सबकी जान थी — हँसने वाली, बोलने वाली, हर बात पर मज़ाक करने वाली। मगर आज उसके चेहरे पर एक अनजान सन्नाटा था। उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे और मुस्कान जैसे कहीं पीछे छूट गई थी।
माँ ने धीरे से पूछा, “थक गई होगी ना बेटा, ससुराल का काम बहुत होता है।”
किरण ने बस सिर हिला दिया — बिना कोई जवाब दिए।
दिन भर मोहल्ले की औरतें आती रहीं, नई बहू को देखने, उपहार देने, मिठाई खिलाने। हर कोई कहता, “वाह, कितनी सुंदर लग रही है हमारी किरण।”
लेकिन माँ का दिल हर मुस्कान के पीछे की बेचैनी पढ़ रहा था।
शाम को जब सब चले गए, तब माँ ने दरवाज़ा बंद किया और बेटी के पास बैठ गईं।
“अब बता बेटा, कैसे हैं सब लोग? ससुराल वाले ठीक हैं ना?”
किरण ने धीमे स्वर में कहा, “हाँ माँ, सब अच्छे हैं।”
“और रवि?” माँ ने धीरे से पूछा।
किरण ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी आँखों में आँसू भर आए।
माँ ने बेटी का हाथ पकड़ लिया, “किरण, तू मुझसे कुछ छुपा रही है। मैं तेरी माँ हूँ, तेरे चेहरे की हर लकीर पढ़ सकती हूँ। क्या हुआ है बेटा?”
किरण अब खुद को रोक न सकी। वो माँ की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
“माँ… रवि मुझसे प्यार नहीं करता।”
माँ जैसे पत्थर की मूर्ति बन गईं। कुछ पल वो कुछ कह ही न सकीं।
“क्या?” उन्होंने थरथराते होंठों से पूछा।
किरण ने बीच-बीच में सिसकियों के बीच कहा, “उसने कहा कि शादी उसने अपनी माँ की ज़िद पर की है। वो किसी और से प्यार करता है, पर उसकी प्रेमिका उसके परिवार को पसंद नहीं थी, इसलिए उससे शादी नहीं हो पाई। और अब उसने कहा है कि मेरी ज़िंदगी मेरे मन की, उसकी ज़िंदगी उसके मन की। बस… बाहर दुनिया के सामने हमें एक जोड़ा बनकर रहना है।”
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
“बेटा, तूने उसे कुछ कहा?”
“कहा था माँ… मैंने उससे पूछा कि अगर मुझसे शादी करनी ही नहीं थी तो क्यों की? तो उसने हँसते हुए कहा — ‘क्योंकि तुम्हारे जैसे घर की लड़की कोई सवाल नहीं करती। जो मिलेगा, चुपचाप स्वीकार करेगी। मैं अपनी ज़िंदगी जी लूंगा, तुम अपनी।’”
किरण का गला भर आया, “माँ, उसने मुझे अपना कमरा तक नहीं दिया। कहता है, यह मेरा निजी स्पेस है। हम साथ रहते हैं, लेकिन अजनबियों की तरह। बस खाने की टेबल पर कुछ औपचारिक बातें और फिर खामोशी।”
माँ की सांसें भारी हो गईं। वो कुछ देर तक चुप रहीं, फिर बोलीं,
“बेटा, शादी दो लोगों का संग है, एक का समझौता नहीं। अगर उसने तुझे सिर्फ़ अपने घर की शोभा समझकर रखा है, तो वो रिश्ता नहीं, सौदा है। और मेरी बेटी सौदे की चीज़ नहीं है।”
किरण ने माँ का हाथ कसकर पकड़ा, “पर माँ, मैं क्या करूँ? लोग क्या कहेंगे? आपने और पापा ने इतनी इज़्ज़त से मेरी शादी की है…”
माँ ने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया,
“इज़्ज़त किसी झूठे रिश्ते में नहीं, अपने आत्मसम्मान में होती है। अगर वो तुझे सम्मान नहीं दे सकता, तो तू क्यों उस घर की दीवारों में दम तोड़े?”
किरण ने पहली बार माँ को इतने दृढ़ स्वर में बोलते देखा। वो वही माँ थीं जो हमेशा कोमल थीं, कभी ऊँची आवाज़ में भी नहीं बोलीं। लेकिन आज उनके शब्दों में आग थी।
माँ उठीं, अलमारी से कपड़े निकाले, और बोलीं,
“तू यहाँ रहेगी बेटा। जब तक वह आदमी तेरे रिश्ते की कीमत नहीं समझता, तू उसके घर वापस नहीं जाएगी। और अगर वो समझ ही नहीं सकता, तो मैं खुद उसे बता दूँगी कि मेरी बेटी खिलौना नहीं है।”
किरण ने काँपती आवाज़ में कहा, “माँ, वो गुस्से में आ जाएगा…”
माँ ने उसकी बात बीच में काट दी,
“जिसे अपने अपराध का एहसास ही नहीं, उसके गुस्से से क्या डरना? आज मैं माँ नहीं, एक बेटी की ढाल हूँ।”
उस रात किरण ने चैन की नींद सोई — कई दिनों बाद। माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए सोचा — कितनी लड़कियाँ होंगी जो ऐसे रिश्तों में चुपचाप सड़ती हैं, सिर्फ़ समाज के डर से।
अगले दिन सुबह रवि का फोन आया।
“किरण कब लौट रही है? मेहमानों के सामने क्या कहूँगा?”
माँ ने फोन उठाया और शांत स्वर में बोलीं,
“उसे अब लौटने की ज़रूरत नहीं।”
रवि हड़बड़ा गया, “क्या मतलब? आप लोग समाज में मेरी इज़्ज़त खराब कर देंगे!”
माँ बोलीं, “इज़्ज़त किसी की भावनाओं को रौंदकर नहीं बनती बेटा। अगर तूने शादी को सिर्फ़ दिखावे का रिश्ता बनाया है, तो मेरी बेटी अब उस नाटक का हिस्सा नहीं बनेगी।”
फोन के उस पार सन्नाटा था। फिर रवि बोला,
“आप गरीब लोग क्या समझेंगे, रिश्तों की मजबूरियाँ क्या होती हैं…”
माँ ने जवाब दिया, “हम गरीब हैं, मगर ज़मीरदार हैं। अपनी बेटी को बिकने नहीं देंगे।”
किरण ने ये सब सुना, और उसके अंदर जैसे कुछ टूटकर फिर से जुड़ गया। उसने पहली बार खुद को आईने में देखा — बिना आँसुओं के, बिना झुकाव के।
अगले कुछ दिनों में मोहल्ले में बातें फैल गईं, लोग आए, ताने दिए —
“बेटी को समझाओ, ससुराल ही औरत का घर होता है।”
माँ हर किसी को एक ही जवाब देतीं,
“घर वहाँ होता है जहाँ सम्मान हो। और मेरी बेटी का घर मेरा दिल है।”
किरण ने सिलाई सीखनी शुरू की। धीरे-धीरे उसने घर में छोटा सा बुटीक खोल लिया। उसकी मेहनत और आत्मविश्वास देखकर मोहल्ले की औरतें भी उसके पास आने लगीं।
माँ जब कभी उसके पास बैठतीं, कहतीं, “देखा बेटा, तू टूटी नहीं, तू खिल गई।”
कई महीनों बाद रवि खुद उनके घर आया।
कहने लगा, “किरण, चलो घर चलते हैं। समाज में लोग बातें बना रहे हैं।”
किरण ने शांत स्वर में कहा,
“कौन सा घर, रवि? वो जो दीवारों से बना है या वो जो सिर्फ़ दिखावे का है?”
रवि झेंप गया।
“तुम समझ नहीं रही, मैं मजबूर था।”
किरण ने कहा, “नहीं रवि, मैं अब बहुत कुछ समझने लगी हूँ।
मजबूरी वो होती है जो दूसरों का दिल न तोड़े।
जो खुद के लिए किसी को रुला दे, वो स्वार्थ होता है, प्यार नहीं।”
रवि के पास कोई जवाब नहीं था।
वो चुपचाप चला गया — हमेशा के लिए।
सालों बाद जब किरण के बुटीक का नाम शहर में मशहूर हुआ, तो एक इंटरव्यू में उससे पूछा गया,
“आपकी प्रेरणा कौन है?”
किरण मुस्कुराई और बोली,
“मेरी माँ — जिन्होंने मुझे सिखाया कि औरत अगर चाह ले तो किसी भी अंधेरे से उजाला बना सकती है।”
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
उस रात माँ ने दीये के सामने हाथ जोड़कर कहा,
“भगवान, तूने मेरी बेटी को ताकत दी… अब बाकी बेटियों को भी हिम्मत देना।”
दीया लौ की तरह लहरा उठा — जैसे उसकी प्रार्थना सुन ली गई हो।
माँ मुस्कुराईं, और कमरे के अंदर से किरण की आवाज़ आई —
“माँ, चाय बना दूँ?”
“हाँ बेटा,” माँ बोलीं, “चाय नहीं, जीत की मिठास बना।”
और माँ की आँखों में वही चमक लौट आई — जो उन्होंने बरसों पहले अपनी बेटी के चेहरे पर देखी थी।
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