मेरा शहर अब मेरा गाँव बन गया है।

 सुबह की ठंडी हवा बालकनी में झूल रही थी। नीचे पार्क में लोग टहल रहे थे, कोई अखबार लेकर बैठा था, तो कोई फोन पर बिज़नेस की बातों में मशगूल था। इस बीच, मेरे बाउजी गार्ड से हालचाल पूछ रहे थे —

“का भइया, आज भी ड्यूटी पर अकेले? ठंड में कुछ गर्म पी लो... चाय भेज दूँ क्या?”

गार्ड हँसते हुए बोला, “नहीं बाबूजी, आप ही बहुत हैं हमारे लिए।”

मैं खिड़की से यह सब देख रहा था और मन में हल्की-सी बेचैनी थी।
मुझे यहाँ आए तीन महीने हुए थे, और साथ में माँ-बाउजी भी गाँव से आए थे। लेकिन अब लगने लगा था — शायद ये फ़ैसला गलत था।

शुरुआती दिनों में बच्चे बहुत खुश थे। “दादी गाँव की कहानियाँ सुनाओ,” “दादाजी खेत कैसे जोते थे?” पर अब उनकी बातों में वो अपनापन नहीं था। अब बच्चों के लिए दादा-दादी “पुराने ज़माने” के लोग बन गए थे।

कल ही की बात है, जब माँ नीचे पार्क में गईं और गुप्ता जी की नवजात बच्ची के लिए सोहर गाने लगीं। सब लोग मुस्कुरा रहे थे, लेकिन मेरे बच्चों को यह ‘अजीब’ लगा।

रात को बेटा बोला, “डैड, आप मम्मी को समझाइए ना, इस तरह के गाने सबके सामने... प्लीज़! यहाँ कोई ऐसा नहीं करता।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस गहरी साँस ली।

फिर, कुछ दिन बाद, सिन्हा अंकल के बेटे ने मेडिकल एग्ज़ाम पास किया। बाउजी ख़ुश होकर मिठाई लेकर नीचे पार्क में बाँटने चले गए।
घर लौटे तो बच्चों ने कहा, “अब तो प्लीज़ बंद करिए ये सब दिखावा!”

मैंने झल्लाकर कहा, “तुम लोगों को समझ नहीं आता, ये दिखावा नहीं, खुशी बाँटना है!”
पर वो चुप रहे। और उसी चुप्पी में मेरे दिल के भीतर कुछ टूट गया।

उस रात बाउजी ने धीरे से कहा,
“बेटा, गाँव लौट चलें? लगता है यहाँ हम फालतू हो गए हैं।”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। अगले ही दिन टिकट बुक करवा दिया।
मन भारी था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि बच्चों की बातों का बुरा ज़्यादा लगा या अपने खुद के फैसले का।

ट्रेन तीन घंटे बाद थी। हम सब लिफ्ट से नीचे उतरे।
पार्किंग की तरफ बढ़े ही थे कि कुछ अनोखा हुआ।

सोसायटी के लोग एक-एक कर नीचे आ गए थे।
गार्ड, सफाई वाला, मिसेज़ गुप्ता, सिन्हा अंकल, सब के सब।

गार्ड के हाथ में फूलों का गुलदस्ता था।
“बाबूजी, आप हमें ऐसे छोड़कर मत जाइए।”

सफाई वाला आगे बढ़ा,
“माई, आप नहीं रहेंगी तो कौन हाल पूछेगा हम गरीबों का?”

सिन्हा अंकल की आवाज़ काँप रही थी,
“भैया, आपकी मिठाई की मिठास आज भी मेरे बेटे की सफलता में बसी है।”

मिसेज़ गुप्ता अपनी छोटी बच्ची को गोद में लिए आईं,
“माँ जी, आपने जो सोहर गाया था, अब वो बच्ची आपके बिना सो नहीं पाती।”

माँ ने बच्ची को गोद में लिया, उसके गाल पर हाथ फेरा,
“अरे, कमजोर है रे... दुनो टाइम तेल लगाना। एगो रुपया है जी, छुट्टा?”
बाउजी ने जेब टटोली, और माँ को सौ का नोट देते हुए कहा,
“ले, छुट्टा नहीं है।”
माँ ने बच्ची को लगाकर सौ रुपये दे दिए।

“इसे बोलना, जब बड़ी हो जाए, तो दादी के पास गाँव आए।”

वहाँ खड़े सबकी आँखें भीग चुकी थीं।

तभी पीछे से आवाज़ आई — मेरे बच्चों की।
“दादी... आप हमारे एग्जाम में पास होने की मिठाई नहीं बाँटोगी?”
“हाँ दादी, मत जाओ ना... हमारी प्रॉमिस।”

माँ-बाउजी ठिठक गए। बाउजी ने मेरी ओर देखा — उनकी आँखें भीग चुकी थीं।
मैं मुस्कुराया,
“सब इन नालायकों की गलती है, एक बार नहीं रोका, तो मैंने टिकट काट दी।”

बाउजी हँसे,
“तो फिर फाड़ दो टिकटें।”

मैंने जेब से टिकट निकाली और वहीं फाड़ दी।
सोसायटी के लोग तालियाँ बजाने लगे।
बच्चे दौड़कर माँ-बाउजी से लिपट गए।

उस शाम, मैंने पहली बार महसूस किया —
शहर में भी गाँव बस सकता है।
शर्त सिर्फ़ इतनी है कि हम रिश्तों को ‘औपचारिकता’ नहीं, ‘अपनापन’ बनने दें।

माँ मुस्कुरा रही थीं,
बाउजी गार्ड से कह रहे थे,
“चल भइया, आज मिठाई बाँटते हैं... हमारे शहर ने आज गांव की तरह दिल जीत लिया है।”

उस दिन मुझे सच में लगा —
मेरा शहर अब मेरा गाँव बन गया है।

लेखक : विनय कुमार मिश्रा


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