धूप से तपते रास्ते पर एक पुराना बस अड्डा था — वहीँ पर मनमीत अपने पुराने बैग के साथ बैठा था। चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में उम्मीद थी। आज शहर में उसका इंटरव्यू था — विदेश जाने के लिए। यही उसके जीवन का सबसे बड़ा मौका था। गाँव में गरीबी की वजह से घर की दीवारें भी जैसे टूटे सपनों की गवाही दे रही थीं।
उसका गाँव छोटा था, लेकिन वहाँ के लोग दिल के बड़े थे। उन्हीं में से एक था मानव — मनमीत से सात साल छोटा, पर दोनों का रिश्ता भाइयों जैसा था। मानव शहर में एक दवा कंपनी में छोटा-सा काम करता था, अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ किसी तरह गुज़र-बसर कर रहा था।
मनमीत जब इंटरव्यू देने शहर आया तो उसे देखकर मानव की आँखें चमक उठीं,
“अरे मनमीत भैया! इतने साल बाद मिले हो, ज़रूर कोई बड़ी बात है?”
मनमीत ने बताया कि उसका चयन हो गया है, बस मेडिकल करवाना बाकी है। पर मेडिकल की फीस चार हज़ार रुपये थी — और यही रकम उसके और उसके सपनों के बीच दीवार बनकर खड़ी थी।
“भैया, मैं क्या बताऊँ, पास में किराए भर के ही पैसे हैं। सोच रहा था मेडिकल कहाँ से करवाऊँ…”
मानव ने बिना सोचे कहा,
“रुकिए, आज का दिन दीजिए। कल तक पैसे का इंतज़ाम कर दूँगा। आप यहीं रहिए मेरे साथ।”
शाम तक मानव ने अपने दो दोस्तों से उधार लेकर पैसे जुटाए। अगले दिन मनमीत का मेडिकल हुआ, और महीने भर बाद उसका वीज़ा भी आ गया।
मनमीत के विदेश जाने के बाद जीवन बदल गया। पहले साल में ही उसने मानव को पैसे भेज दिए — चार हज़ार से कहीं ज्यादा, साथ ही धन्यवाद का एक छोटा-सा पत्र:
“भाई, ये सिर्फ़ पैसे नहीं, मेरा जीवन हैं। अगर उस दिन तुम न होते तो शायद मैं आज यहाँ न होता।”
वक़्त अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता गया।
मनमीत की ज़िंदगी अब समृद्ध थी — बड़ा घर, गाड़ी, बच्चे और नाम। जबकि मानव की ज़िंदगी अब भी उसी जगह पर थी — जहाँ हर महीने की तनख्वाह खत्म होते ही घर का राशन भी खत्म हो जाता।
सालों बाद गाँव में मानव की बड़ी बेटी की शादी तय हुई। पूरे गाँव में खबर फैल गई, लेकिन मानव के माथे पर चिंता की लकीरें थीं। दहेज का इंतज़ाम नहीं था, और बारात के खाने तक के पैसे भी मुश्किल से जुटे थे।
उसी वक्त मनमीत अपने परिवार के साथ गाँव आया। उसने मानव को गले लगाते हुए कहा,
“कितना समय बीत गया, भाई… और अब तेरी बेटी की शादी! देखना, सब बहुत अच्छा होगा।”
मानव ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर चेहरे की चिंता छिपी न रह सकी।
“क्या करूँ मनमीत… बेटी की शादी है, पर हाथ खाली हैं।”
मनमीत कुछ पल चुप रहा, फिर बोला,
“भाई, मेरा एक सपना है। अगर तू पूरा कर दे तो मैं ज़िंदगीभर तेरा ऋणी रहूँगा।”
“अरे पगले, ऐसा क्या सपना है जो मैं पूरा कर सकता हूँ?” मानव ने आश्चर्य से पूछा।
मनमीत बोला,
“मेरे दो बेटे हैं, कोई बेटी नहीं। मैं चाहता हूँ कि मेरी भी एक बेटी की डोली उठे… अगर तू इजाज़त दे तो मैं तेरी बेटी का कन्यादान करूँ।”
मानव की आँखें नम हो गईं। उसने कुछ पल सोचा, फिर कहा,
“अगर तू इसे अपना सौभाग्य मानता है तो मुझे भी गर्व होगा कि मेरी बेटी का कन्यादान तू करेगा।”
शादी का दिन आया — और पूरा गाँव गवाही देने खड़ा था। मनमीत ने हर रस्म निभाई — मेहंदी से लेकर विदाई तक। उसने बेटी को अपने हाथों से गहने पहनाए, विदाई के वक्त उसे गले लगाते हुए कहा,
“बेटी, अब तू मेरे लिए भी उतनी ही प्यारी है जितनी अपने पिता के लिए।”
जब बारात रवाना हुई, तो गाँव के बुज़ुर्ग फुसफुसाने लगे,
“मनमीत तो बड़ा आदमी बन गया है, लेकिन उसके भीतर अब भी वही इंसान बसता है।”
रात को सब सो चुके थे। मनमीत आँगन में बैठा आसमान की ओर देख रहा था। चाँदनी की हल्की रोशनी में उसे वो पुराना बस अड्डा याद आया — जहाँ से उसकी ज़िंदगी बदली थी।
वो बुदबुदाया,
“आज जो कुछ भी हूँ, वो उन्हीं चार हज़ार रुपयों की वजह से हूँ… वो मदद नहीं, भाईचारे की नींव थी।”
मानव उसके पास आया और बोला,
“तूने बहुत बड़ा काम किया, मनमीत।”
मनमीत ने मुस्कुराकर कहा,
“नहीं भाई, मैंने कुछ नया नहीं किया। उस दिन तूने बुरे वक्त में मेरा साथ दिया था। आज बस वक्त ने मुझे मौका दिया, अपनी बारी निभाने का।”
मानव की आँखों से आँसू बह निकले।
“सच कहा तूने… जो बुरे वक्त में साथ दे, वही असली अपना होता है।”
दोनों देर तक खामोश बैठे रहे — उस चाँदनी रात में, जहाँ दोस्ती, कर्ज़ और एहसान के सारे मायने खोकर सिर्फ़ मानवता बची रह गई थी।
वक़्त ने दिखा दिया था —
जो वक्त पर काम आए, वही सबसे अमीर होता है — चाहे जेब खाली ही क्यों न हो।
लेखक : अमित रत्ता
0 टिप्पणियाँ