सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को

 आजकल आए दिन मन्दिरों में बाबाओं के प्रवचन और धार्मिक उपदेश चलते रहते हैं।सावन मास में तो इन   ढ़ोंगी बाबाओं और साधुओं की संख्या कुकुरमुत्ते के छत्तों की तरह अनायास असंख्य हो जाती है। कुछ दिनों से मेरी पड़ोसन बगल मुहल्ले के मन्दिर में प्रवचन सुनने जाया करती थी।वहाँ से आकर प्रवचन के बारे में तल्लीन भाव से बताते हुए मुझे कहती -" बहन! मेरी बात मानकर एक दिन तुम भी मन्दिर  चलो।वहाँ मन्दिर में एक माता जी आईं हैं।उनका प्रवचन बहुत  ही मनमोहक और शिक्षाप्रद होता है!"


वास्तविक रूप से तो मैं नास्तिक नहीं हूँ,परन्तु  बचपन से ही पिताजी के कठोर अनुशासन के कारण इन तरह के विषयों में हम भाई-बहनों की रुचि कभी नहीं रही।पतिदेव भी इन बातों को पसन्द नहीं करते थे।फिर भी पड़ोसन की बात का मान रखने के लिए एक दिन मैं उनके साथ मन्दिर चली गई। वहाँ पर एक गौरवर्णी  लम्बे कद की महिला,गले में रुद्राक्ष की माला पहने,ललाट पर हल्दी-कुंमकुम का लेप लगाए आँखें बन्द किए हुए प्रवचन दे रही थी।सभी भक्त गण हाथ जोड़कर भक्ति में लीन होकर तन्मयता से  उसे सुन रहे थे।उसे देखकर प्रतीत हो रहा था मानो वर्षों की उसकी साधना नूर बनकर उसके चेहरे से टपक रही थी।परन्तु प्रवचन खत्म होने पर जब पड़ोसन ने उससे मिलवाया ,तो मैंने उसे पहचान लिया।वह औरत मेरे ही गाँव की थी,जिसने गाँव में अपने ससुरालवालों की जिन्दगी हराम कर रखी थी।पति ने उससे तंग आकर आत्महत्या कर ली थी।सभी के साथ  दुर्व्यवहार के कारण गाँववालों ने उसे गाँव से निकाल दिया था।वही औरत आज माताजी बनकर शहर में सदुपदेश दे रही है और लोगों को ठगकर खूब पैसे कमा रही है!!उसे देखकर मैंने मन-ही-मन सोचा कि शायद ऐसे ही लोगों पर 'सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को' कहावत सटीक बैठती है!

समाप्त। 

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)


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