"बहू को लगा कि वह घर से 'बेकार सामान' हटा रही है, लेकिन उसे खबर नहीं थी कि पास बैठी उसकी सात साल की बेटी चुपचाप अपनी माँ का 'भविष्य' तय कर रही है।"
घर के आंगन में बर्तनों के गिरने की आवाज़ गूंजी और उसके साथ ही सरिता की तीखी आवाज़ ने सुबह की शांति को भंग कर दिया।
"माँ जी! कितनी बार कहा है कि अगर हाथ कांपते हैं तो कांच के गिलास मत उठाया कीजिए। अब देखिए, पूरा सेट खराब हो गया। यह क्रॉकरी मैंने विशेष रूप से दिवाली के लिए मंगवाई थी। अब टूटे हुए सेट का मैं क्या करूँ?"
सामने कुर्सी पर बैठीं 75 वर्षीय गायत्री देवी सहम गईं। उनकी आँखों में मोतियाबिंद का जाला था और हाथों में पार्किंसंस की कपकपी। टूटे हुए कांच के टुकड़े उनके पैरों के पास बिखरे पड़े थे।
"माफ़ कर दे बहू... मुझे प्यास लगी थी... सोचा खुद पानी ले लूँ, तुझे आवाज़ दूँगी तो तू काम छोड़कर आएगी," गायत्री देवी ने लडखडाती आवाज़ में सफाई देने की कोशिश की।
"रहने दीजिए अपनी सफाई," सरिता ने गुस्से में झाड़ू उठाई। "दिन भर ऑफिस में खटूँ, फिर घर आकर आपकी सेवा करूँ और ऊपर से आपके फैलाए हुए रायते समेटूँ। मेरी तो ज़िंदगी ही झंड हो गई है। राहुल (पति) को भी बस ऑफिस से मतलब है, घर में क्या महाभारत चल रही है, उन्हें क्या पता।"
सरिता बड़बड़ाते हुए कांच समेटने लगी। गायत्री देवी की आँखों से दो बूंद आंसू टपक कर उनकी झुर्रियों में समा गए। वे चुपचाप अपनी लाठी टेकती हुई अपने कमरे की ओर बढ़ गईं। वह कमरा जो असल में घर का स्टोर रूम था, लेकिन जगह की कमी का हवाला देकर सरिता ने सासु माँ को वहां शिफ्ट कर दिया था। उसमें खिड़की के नाम पर बस एक रोशनदान था।
शाम को राहुल जब ऑफिस से आया, तो सरिता का मूड पहले से ही ख़राब था। चाय की मेज़ पर सरिता ने बात छेड़ी।
"राहुल, अब बहुत हो गया। माँ जी की वजह से घर में क्लेश बढ़ता जा रहा है। आज उन्होंने मेरा महंगा डिनर सेट तोड़ दिया। और वैसे भी, अब गुड़िया (उनकी 8 साल की बेटी, आरोही) बड़ी हो रही है। उसे पढ़ने के लिए अलग कमरा चाहिए। मैं सोच रही हूँ कि माँ जी को अगर हम 'वृद्धाश्रम' छोड़ आएं तो क्या बुरा है? वहाँ उनकी उम्र के लोग मिलेंगे, मन भी लगा रहेगा। यहाँ तो वो भी घुटती हैं और मैं भी।"
राहुल ने चाय का कप मेज़ पर रखा। वह अपनी माँ से प्यार करता था, लेकिन पत्नी के रोज़-रोज़ के झगड़ों से तंग आ चुका था। वह कमज़ोर पड़ गया।
"लेकिन सरिता, समाज क्या कहेगा? इकलौता बेटा हूँ मैं," राहुल ने दबी आवाज़ में कहा।
"समाज रोटी देने नहीं आता राहुल," सरिता ने तल्खी से कहा। "और हम उन्हें छोड़ नहीं रहे, बस शिफ्ट कर रहे हैं। हम हर संडे उनसे मिलने जाएंगे, पैसे देंगे। यहाँ वो अकेली पड़ी रहती हैं। वहां मेडिकल फैसिलिटी भी होगी। तुम कल ही पता करो।"
राहुल ने अनमने ढंग से सिर हिला दिया। यह सारी बातें आरोही अपने कमरे के दरवाज़े के पीछे खड़ी सुन रही थी। उसके हाथ में उसकी पसंदीदा गुड़िया थी।
अगले दिन रविवार था। सरिता घर की सफाई में लगी थी। उसने देखा कि आरोही अपने खिलौनों के साथ खेल रही है। लेकिन आज उसका खेल कुछ अजीब था।
आरोही ने अपनी सबसे पुरानी और पसंदीदा गुड़िया को लिया, जिसके बाल थोड़े उखड़ गए थे और एक हाथ टूटा हुआ था। उसने उस गुड़िया को एक गत्ते के पुराने डिब्बे में डाल दिया और ऊपर से टेप चिपकाने लगी।
सरिता को कौतूहल हुआ। वह काम छोड़कर बेटी के पास गई।
"अरे आरोही, यह क्या कर रही हो बेटा? यह तो तुम्हारी फेवरेट डॉली है न? 'पिंकी' नाम है न इसका? इसे ऐसे डिब्बे में बंद क्यों कर रही हो? दम घुट जाएगा उसका," सरिता ने हंसते हुए पूछा।
आरोही ने मासूमियत से अपनी माँ की ओर देखा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में एक अजीब सी गंभीरता थी।
"मम्मा, पिंकी अब पुरानी हो गई है। इसका हाथ भी टूट गया है। अब यह ठीक से बैठ नहीं पाती। और मुझे अब नई बार्बी डॉल्स के साथ खेलना है। पिंकी की वजह से मेरे डॉल-हाउस में जगह कम पड़ रही है।"
सरिता को लगा बच्ची है, मन भर गया होगा। उसने समझाया, "तो क्या हुआ बेटा? पुरानी है तो क्या, तुमने इसके साथ कितना खेला है। इसे साफ़ करके शेल्फ पर रख दो।"
आरोही ने जो जवाब दिया, उसने सरिता के पैरों तले ज़मीन खींच ली।
"नहीं मम्मा," आरोही ने सपाट लहज़े में कहा। "मैं प्रैक्टिस कर रही हूँ। कल मैंने सुना था आप पापा से कह रही थीं कि दादी अब बूढ़ी हो गई हैं, उनके हाथ कांपते हैं, वो चीज़ें तोड़ देती हैं और जगह घेरती हैं। इसलिए उन्हें ओल्ड-एज होम भेजना है। मम्मा, मैं देख रही थी कि ओल्ड-एज होम कैसा होता है। यह डिब्बा पिंकी का ओल्ड-एज होम है।"
सरिता के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।
आरोही रुकी नहीं, वह बोलती गई, "मम्मा, जब आप बूढ़ी हो जाओगी, आपके हाथ कांपेंगे और आप मुझसे काम नहीं कर पाओगी, तो मुझे भी तो आपको भेजने की प्रैक्टिस होनी चाहिए न? मैं नहीं चाहती कि तब मुझे रोना आए। इसलिए मैं अभी से पिंकी को दूर भेजकर आदत डाल रही हूँ। पापा कहते हैं न कि बच्चे वही सीखते हैं जो बड़े करते हैं।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। घड़ी की टिक-टिक सरिता के कानों में हथौड़े की तरह बजने लगी।
सात साल की बच्ची ने अनजाने में सरिता को भविष्य का वो आईना दिखा दिया था, जिसमें उसकी अपनी तस्वीर बेहद बदसूरत नज़र आ रही थी। सरिता ने देखा कि आरोही उस डिब्बे को घसीटकर स्टोर रूम की तरफ ले जा रही है—ठीक वैसे ही जैसे सरिता ने गायत्री देवी को धीरे-धीरे घर के मुख्य हिस्से से हटाकर कोने में धकेल दिया था।
सरिता को चक्कर आने लगा। वह वहीं फ़र्श पर बैठ गई। उसे अपनी आँखों के सामने अपना बुढ़ापा नज़र आने लगा। उसे दिखा कि उसके हाथ कांप रहे हैं, उसे प्यास लगी है, और आरोही उसे डांट रही है—"मम्मा, पानी खुद नहीं पी सकतीं? सब गिरा दिया।" और फिर आरोही उसे किसी अनजान जगह छोड़कर आ रही है, यह कहते हुए कि "मम्मा, मुझे स्पेस चाहिए।"
डर की एक ठंडी लहर सरिता की रीढ़ में दौड़ गई। क्या वह अपनी बेटी को यही संस्कार दे रही है? क्या वह अपने लिए ही खाई खोद रही है?
उसे याद आया कि गायत्री देवी ने कभी उसे अपनी बेटी से बढ़कर माना था। जब सरिता की डिलीवरी हुई थी, तो इन्हीं कांपते हाथों ने महीनों तक सरिता के गंदे कपड़े धोए थे, उसके लिए गर्म खाना बनाया था और रातों को जागकर आरोही को लोरी सुनाई थी। तब तो ये हाथ नहीं कांपे थे? तब तो ये 'बोझ' नहीं थीं?
सरिता की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वह उठी और दौड़कर आरोही के पास गई। उसने डिब्बे से टेप नोचकर निकाला और गुड़िया को बाहर निकालकर छाती से लगा लिया।
"नहीं बेटा... नहीं," सरिता रो पड़ी। "हम पिंकी को कहीं नहीं भेजेंगे। और दादी को भी नहीं। दादी घर की नींव हैं, और नींव कभी घर से बाहर नहीं निकाली जाती।"
आरोही समझ नहीं पाई कि माँ क्यों रो रही है, लेकिन उसने माँ के आंसू पोंछे।
सरिता सीधे स्टोर रूम की तरफ भागी। दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर गायत्री देवी अपनी पुरानी संदूकची पर बैठी, एक पुरानी एल्बम देख रही थीं। उसमें राहुल के बचपन की तस्वीरें थीं।
सरिता ने देखा कि माँ जी की आँखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर एक शांत भाव था—त्याग का भाव। शायद उन्हें भनक लग गई थी कि उन्हें घर से निकाला जा रहा है।
सरिता दौड़कर गई और गायत्री देवी के घुटनों पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगी।
"माँ जी... मुझे माफ़ कर दीजिये। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अंधी हो गई थी। मुझे लगा था मैं घर साफ़ कर रही हूँ, पर मैं तो अपना ही भविष्य काला कर रही थी।"
गायत्री देवी हड़बड़ा गईं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से सरिता का सिर सहलाया। "अरे क्या हुआ पगली? क्यों रो रही है? मैंने कुछ कहा क्या? अगर उस गिलास के लिए रो रही है, तो छोड़ न, मैं अपनी पेंशन से नया मंगवा दूँगी।"
सास के इन शब्दों ने सरिता को और भी शर्मिंदा कर दिया। जो सास अपमान सहकर भी बहू के आंसू पोंछ रही है, उसे वह बोझ समझ रही थी?
"नहीं माँ जी," सरिता ने सिसकते हुए कहा। "गिलास नहीं, मेरा अहंकार टूट गया है। आप कहीं नहीं जा रही हैं। और न ही आप इस स्टोर रूम में रहेंगी। आरोही मेरे कमरे में सोएगी, और आप उस बड़े कमरे में रहेंगी जहाँ हवा और धूप आती है। यह घर आपका है, हम तो बस इसमें रह रहे हैं।"
राहुल दरवाज़े पर खड़ा यह सब देख रहा था। उसे पता नहीं था कि हृदय परिवर्तन कैसे हुआ, लेकिन उसने अपनी पत्नी की आँखों में जो डर और प्रेम का मिश्रण देखा, वह समझ गया कि आज घर टूटने से बच गया है।
उस शाम घर का नज़ारा बदल गया।
डायनिंग टेबल पर सरिता ने अपने हाथों से गायत्री देवी को खाना परोसा।
"माँ जी, आज आपके पसंद की कढ़ी बनाई है। और हां, अगर गिर भी जाए तो कोई बात नहीं, कपड़े ही तो हैं, धुल जाएंगे। पर आपका आशीर्वाद नहीं मिला तो मेरी ज़िंदगी मैली रह जाएगी।"
गायत्री देवी ने कांपते हाथों से निवाला उठाया और सरिता के मुंह में दिया। "जुग-जुग जियो बहू।"
आरोही अपनी गुड़िया को गोद में लिए बैठी थी। उसने देखा कि दादी खुश हैं और मम्मा भी। उसने धीरे से अपने पापा से कहा, "पापा, मैंने पिंकी को डिब्बे से निकाल दिया। अब वो मेरे साथ ही सोएगी।"
राहुल ने बेटी को गले लगा लिया। उसने मन ही मन सोचा—शुक्र है कि बच्चों की मासूमियत ने बड़ों की समझदारी को सही रास्ता दिखा दिया।
उस रात सरिता जब सोने गई, तो उसे बहुत सुकून की नींद आई। उसे अब अपने बुढ़ापे से डर नहीं लग रहा था, क्योंकि उसने आज अपनी बेटी को एक ऐसा पाठ पढ़ा दिया था जो किसी स्कूल में नहीं मिलता—"जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे।"
उसने घर की दीवारों को ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि सम्मान और सेवा से मज़बूत कर दिया था। और वह जान गई थी कि घर के बुजुर्ग पुराने फर्नीचर की तरह नहीं होते जिन्हें बदल दिया जाए, बल्कि वो उस वटवृक्ष की तरह होते हैं जिसकी जड़ें अगर काट दी जाएं, तो नई कोपलें (बच्चे) कभी भी छांव नहीं दे पाएंगी।
मित्रों, हमारे घर के बच्चे कैमरों से ज़्यादा तेज़ होते हैं। वे वो नहीं सुनते जो हम उन्हें सिखाते हैं, वे वो सीखते हैं जो हम 'करते' हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपका बुढ़ापा सम्मानजनक हो, तो आज अपने घर के बुजुर्गों का सम्मान करना शुरू कर दीजिये। यह एक निवेश है जिसका रिटर्न आपको अपनी औलाद से ही मिलेगा।
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