"एक पिता के लिए अपनी 'पगड़ी' की शान प्यारी होती है या अपनी बेटी की जान? पढ़िए उस बेटी की कहानी जो 5 साल बाद विधवा होकर उस घर की चौखट पर लौटी, जहाँ उसके लिए 'मर जाने' का श्राद्ध किया जा चुका था..."
"चल बेटा... तूं किसी बात की फ़िक्र मत कर.. तेरी मां तेरे साथ है... सबके सवालों का जवाब मैं दूंगी... तूं बस अब अपने आगे की सोच... बहुत सह चुकी है अब और नहीं... ये घर तेरा भी है।"
मीरा ने गीली आँखों से माँ को देखा। "लेकिन माँ, बाबूजी? उन्होंने तो कहा था कि अगर मैं उस लड़के के साथ गई, तो मेरे लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। उन्होंने तो मेरा मरा हुआ मुंह देखने की कसम खाई थी।"
दोपहर की चिलचिलाती धूप में लोहे के उस बड़े गेट पर जंग लगा ताला नहीं था, लेकिन मीरा को लगा जैसे वहां एक अदृश्य दीवार खड़ी है। पांच साल... पूरे पांच साल हो गए थे उसे इस गली में कदम रखे। वही पुराना नीम का पेड़, वही चबूतरा, और वही उसके घर की 'देहरी', जिसे लांघकर वह एक तूफानी रात में अपनी मर्जी से चली गई थी।
मीरा के कदम कांप रहे थे। उसकी सफ़ेद साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था, जो उसकी बेरंग ज़िंदगी की गवाही दे रहा था। उसका हाथ उसकी माँ, कौशल्या जी ने कसकर थाम रखा था।
"क्या हुआ बेटा, चल ना अंदर..."
मीरा के पैर घर की देहरी के बाहर ठिठक गए तो कौशल्या जी ने उसकी हथेली को अपनी गर्म हथेलियों में भींच लिया। उनकी आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जो मीरा ने पहले कभी महसूस नहीं की थी।
"चल बेटा... तूं किसी बात की फ़िक्र मत कर.. तेरी मां तेरे साथ है... सबके सवालों का जवाब मैं दूंगी... तूं बस अब अपने आगे की सोच... बहुत सह चुकी है अब और नहीं... ये घर तेरा भी है।"
मीरा ने गीली आँखों से माँ को देखा। "लेकिन माँ, बाबूजी? उन्होंने तो कहा था कि अगर मैं उस लड़के के साथ गई, तो मेरे लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। उन्होंने तो मेरा मरा हुआ मुंह देखने की कसम खाई थी।"
कौशल्या जी की आँखों में एक पल के लिए डर आया, लेकिन उन्होंने उसे तुरंत छिपा लिया। "बाप हैं वो तेरे, कोई जल्लाद नहीं। और फिर... अब तो नियति ने तुझे ऐसी सज़ा दी है कि पत्थर का दिल भी पिघल जाए। तू बस मेरे पीछे चल।"
जैसे ही मीरा ने देहरी पार की, सामने बरामदे में आराम कुर्सी पर उसके पिता, रघुवीर प्रताप सिंह बैठे थे। अखबार हाथ में था, लेकिन नज़रें शून्य में थीं। रघुवीर जी शहर के जाने-माने रिटायर्ड प्रिंसिपल थे। उसूलों के पक्के और जुबान के कड़वे। उनकी मूंछों का ताव और सिर की पगड़ी ही उनका अभिमान थी।
कदमों की आहट सुनकर उन्होंने अखबार नीचे किया। सामने का मंजर देख उनके हाथ वहीं जम गए।
उनकी बेटी मीरा। वही मीरा, जो कभी इस घर की रौनक थी। आज उसके मांग का सिंदूर गायब था, हाथों की चूड़ियां नदारद थीं और चेहरे पर 25 साल की उम्र में ही 50 साल का दुख था।
एक पल के लिए रघुवीर जी की आँखों में 'पिता' जागा, लेकिन अगले ही पल उनका 'अहंकार' आड़े आ गया। वे कुर्सी से झटके से खड़े हुए।
"कौशल्या!" उनकी आवाज़ में बिजली जैसी कड़क थी। "मैंने तुमसे कहा था न कि इस लड़की का इस घर से कोई वास्ता नहीं है? यह हमारे लिए उसी दिन मर गई थी जिस दिन इसने हमारी इज्जत को लात मारकर उस आवारा लड़के के साथ भागने का फैसला किया था। क्यों लाई हो इसे यहाँ?"
मीरा सहम कर माँ के पीछे छिप गई। पाँच साल पहले वाली वो निडर मीरा, जिसने प्यार के लिए दुनिया से बगावत की थी, आज समय की मार से टूट चुकी थी।
कौशल्या जी ने मीरा का हाथ छोड़ा और आगे बढ़कर पति की आँखों में आँखें डालकर खड़ी हो गईं।
"धीरे बोलिए। पड़ोसी सुनेंगे," कौशल्या जी ने शांत स्वर में कहा।
"सुनने दो पड़ोसियों को!" रघुवीर जी चिल्लाए। "जब यह भाग रही थी, तब इसने सोचा था कि पड़ोसी क्या कहेंगे? तब इसे अपनी मनमानी करनी थी। अब जब उस लड़के ने इसे छोड़ दिया या बर्बाद हो गई, तो इसे बाप का घर याद आ गया?"
"वो लड़का अब इस दुनिया में नहीं है!" कौशल्या जी चीखीं। उनकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि रघुवीर जी भी एक पल को चुप हो गए।
"आर्यन मर चुका है," कौशल्या जी ने रोते हुए कहा। "दो साल हो गए उसे गुजरे। रोड एक्सीडेंट में चला गया वो। यह लड़की... हमारी फूल सी बच्ची, पिछले दो साल से दूसरे शहर में सिलाई-कढ़ाई करके और लोगों के बर्तन मांजकर अपना पेट पाल रही थी। इसने हमें खबर तक नहीं दी क्योंकि इसे आपके 'श्राप' का डर था। वो तो भला हो मेरे भाई का, जिसने इसे बाज़ार में देख लिया और मुझे बताया।"
रघुवीर जी स्तब्ध रह गए। मीरा विधवा हो गई? इतनी कम उम्र में?
लेकिन पुरुष का अहंकार इतनी जल्दी हार नहीं मानता। उन्होंने मुट्ठी भींच ली। "तो? तो मैं क्या करूँ? मैंने इसे चेतावनी दी थी। कहा था कि अगर उस लड़के के साथ गई तो कभी सुख नहीं पाएगी। देखो, वही हुआ। यह मेरे कर्मों का नहीं, इसके अपने कर्मों का फल है। इसे अभी इसी वक्त यहाँ से ले जाओ। मैं एक 'कुलटा' को पनाह देकर अपने समाज में नाक नहीं कटवा सकता।"
मीरा फूट-फूट कर रोने लगी। "माँ, मैंने कहा था न बाबूजी मुझे कभी माफ़ नहीं करेंगे। मुझे जाने दो। मैं किसी अनाथालय में रह लूँगी, लेकिन यहाँ रहकर बाबूजी को और दुख नहीं देना चाहती।"
मीरा ने अपने फटे हुए बैग को उठाया और वापस मुड़ने लगी।
तभी कौशल्या जी ने वो किया जो उन्होंने अपनी तीस साल की शादीशुदा ज़िंदगी में कभी नहीं किया था। उन्होंने लपककर मीरा का हाथ पकड़ा और फिर जाकर घर का मुख्य दरवाजा 'धाड़' से बंद कर दिया। फिर वो पलटीं और रघुवीर जी के सामने एक दीवार बनकर खड़ी हो गईं।
"आज यह लड़की कहीं नहीं जाएगी," कौशल्या जी की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी। "और रघुवीर जी, बहुत हो गई आपकी 'नाक' और 'समाज' की बातें। आज मैं बोलूंगी और आपको सुनना पड़ेगा।"
"कौशल्या, तुम अपनी हद पार कर रही हो," रघुवीर जी ने उंगली उठाई।
"हद तो आप पार कर चुके हैं!" कौशल्या जी ने उनका हाथ झटक दिया। "किस समाज की बात कर रहे हैं आप? वो समाज जो दो दिन अफ़सोस जताएगा और तीसरे दिन भूल जाएगा? लेकिन यह लड़की, यह हमारी बेटी है। यह आपकी ही खून है। जब यह पैदा हुई थी, तो पूरे मोहल्ले में आपने मिठाई बांटी थी। तब आपने यह नहीं सोचा था कि यह बड़ी होकर गलती करेगी या नहीं। आपने बस 'पिता' बनकर प्यार किया था।"
कौशल्या जी की आँखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन वो रुकने को तैयार नहीं थीं।
"हां, इसने गलती की। इसने भागकर शादी की। इसने हमारा दिल तोड़ा। लेकिन क्या गलती की सज़ा 'उम्रकैद' होती है? क्या एक गलती के लिए हम इसे जीते जी मार डालें? देखिए इसकी हालत... इसकी सूजी हुई आंखें, इसके खुरदरे हाथ... क्या आपको इसमें अपनी लाडो नहीं दिखती? वो आर्यन अच्छा था या बुरा, पर वो इसका पति था। उसके जाने के बाद इस पर क्या गुज़री होगी, इसका अंदाज़ा है आपको? जब रात को इसे बुखार चढ़ा होगा और पानी देने वाला कोई नहीं होगा, तब इसे आपकी और मेरी याद नहीं आई होगी?"
रघुवीर जी की नज़रें झुकने लगी थीं। वे अपनी मूंछों को ताव नहीं दे पा रहे थे।
कौशल्या जी ने मीरा को खींचकर रघुवीर जी के सामने खड़ा कर दिया।
"देखिए इसे! इसकी तरफ देखिए रघुवीर जी! अगर आज आपने इसे घर से निकाला, तो याद रखना, आप सिर्फ अपनी बेटी को नहीं, अपनी पत्नी को भी खो देंगे। क्योंकि जिस घर में मेरी बेटी के लिए जगह नहीं, उस घर में मेरे लिए भी कोई जगह नहीं। मैं भी इसके साथ जा रही हूँ।"
पूरे आंगन में सन्नाटा छा गया। मीरा सिसक रही थी। "माँ, ऐसा मत करो..."
रघुवीर जी ने धीरे से सिर उठाया। उन्होंने मीरा को देखा। पांच साल की नफरत की परतें उतरने लगीं। उन्हें वो पांच साल की मीरा याद आई जो उनकी उंगली पकड़कर मेले में चलती थी। उन्हें वो दस साल की मीरा याद आई जो उनके ऑफिस से आने पर पानी का गिलास लेकर दौड़ती थी। और फिर उन्हें आज की मीरा दिखी—टूटी हुई, हारी हुई, दुनिया की सताई हुई।
उन्हें अहसास हुआ कि उनकी 'पगड़ी' का वजन उनकी बेटी के आंसुओं से ज्यादा भारी नहीं हो सकता। वो एक 'प्रिंसिपल' बाद में हैं, एक 'बाप' पहले हैं।
रघुवीर जी के होंठ कांपे। वे धीरे-धीरे आगे बढ़े। मीरा डर के मारे पीछे हटने लगी। उसे लगा शायद पिता उसे मारने आ रहे हैं।
लेकिन रघुवीर जी ने अपने कांपते हाथों से मीरा के सिर पर हाथ रखा। वो स्पर्श... वही पुराना, सुरक्षित स्पर्श।
"पगड़ी... पगड़ी तो दोबारा बांधी जा सकती है बेटा," रघुवीर जी का गला भर आया, "लेकिन अगर तू चली गई, तो मेरा 'अस्तित्व' ही खत्म हो जाएगा।"
मीरा अविश्वास से पिता को देखने लगी।
"मुझे माफ़ कर दे लाडो," रघुवीर जी घुटनों के बल बैठ गए और फूट-फूट कर रो पड़े। एक सख्त पिता का इस तरह टूटकर रोना किसी प्रलय से कम नहीं था। "मैं अपने अहंकार में अंधा हो गया था। मुझे लगा मैं तुझे सबक सिखा रहा हूँ, पर असल में मैं खुद को सज़ा दे रहा था। मैं रोज़ रात को तेरी तस्वीर देखकर सोता था, पर सुबह दुनिया के सामने पत्थर बन जाता था। आर्यन के जाने के बाद तुझे मेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, और मैं... मैं 'समाज' का पहरेदार बना बैठा रहा।"
मीरा भी नीचे बैठ गई और पिता के गले लग गई। पांच साल का बांध टूट गया। बाप-बेटी दोनों आंगन में बैठकर रो रहे थे। कौशल्या जी दूर खड़ी आँचल से अपने आंसू पोंछ रही थीं, लेकिन आज उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी। आज एक माँ ने एक पिता को हरा दिया था, ताकि एक बेटी जीत सके।
थोड़ी देर बाद, रघुवीर जी उठे। उन्होंने अपने कुर्ते से आंसू पोंछे और मीरा को उठाया।
"कौशल्या," उन्होंने रोंआसी आवाज़ में कहा, "खड़ी क्या हो? बिटिया को प्यास लगी होगी। इसके लिए शिकंजी बनाओ, और हां... वो इसके पसंद के आलू के परांठे भी।"
फिर वे मीरा की ओर मुड़े। "जा बेटा, अपने कमरे में जा। वो कमरा मैंने पांच साल से खुलने नहीं दिया, उसमें तेरी किताबें, तेरे खिलौने... सब वैसे ही हैं।"
मीरा जब अपने कमरे की ओर बढ़ी, तो उसे लगा जैसे वह देहरी, जो आते वक्त पहाड़ जैसी ऊंची लग रही थी, अब फूलों की तरह नरम हो गई है।
शाम को पड़ोसी आए। कानाफूसी शुरू हुई।
"अरे रघुवीर जी, सुना है आपकी बेटी वापस आ गई? वो तो भाग गई थी न?" पड़ोस की शर्मा आंटी ने तंज कसते हुए पूछा।
रघुवीर जी गेट पर आए। उन्होंने अपनी मूंछों पर ताव दिया, लेकिन इस बार इसमें अहंकार नहीं, गर्व था।
"हाँ भाभी जी, मेरी बेटी वापस आ गई है। वो अपने 'मायके' आई है। और बेटियां जब मायके आती हैं, तो सवाल नहीं पूछे जाते, उनका स्वागत किया जाता है। किसी और को कुछ पूछना है?"
रघुवीर जी की आवाज़ में वो दहाड़ थी जिसने शर्मा आंटी और बाकी पड़ोसियों की बोलती बंद कर दी। उन्होंने गेट बंद कर दिया—बाहर की दुनिया के लिए नहीं, बल्कि बाहर की कड़वाहट के लिए।
अंदर, डाइनिंग टेबल पर पांच साल बाद तीन थालियां लगी थीं। मीरा के चेहरे पर अभी भी उदासी थी, लेकिन उसकी आँखों में अब डर नहीं था। उसे पता था कि उसकी ज़िंदगी का सफर अभी बहुत लंबा और कठिन है, लेकिन अब वह अकेली नहीं है। उसके सिर पर पिता का हाथ और पीठ पर माँ का आशीर्वाद है।
उस रात रघुवीर जी ने अपनी डायरी में लिखा—
"सिद्धांतों की दीवारें कितनी भी ऊँची क्यों न हों, औलाद के प्रेम के आगे वो रेत का ढेर साबित होती हैं। आज मैं हार गया, लेकिन एक 'बाप' जीत गया।"
कहानी का सार:
गलतियां बच्चों से ही होती हैं, और माफ़ करना माता-पिता का धर्म होता है। झूठी शान और "लोग क्या कहेंगे" के डर से अपनी औलाद को ठुकराना सबसे बड़ा पाप है। जब दुनिया ठोकर मारती है, तो वो माँ-बाप का घर ही होता है जहाँ मरहम मिलता है। अपनी बेटियों के लिए दरवाजा कभी बंद मत करना, क्योंकि वो दुनिया से लड़ सकती हैं, लेकिन अपने पिता की नफरत से हार जाती हैं।
सवाल आपके लिए:
क्या एक पिता का फर्ज अपनी पगड़ी (इज्जत) बचाना है या अपनी बेटी की जान? अगर आपके आस-पास ऐसा कोई मामला हो, तो आप क्या सलाह देंगे? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल को छू लिया, तो इसे लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो रिश्तों की गहराई और जीवन की सच्चाई बयां करती ऐसी ही मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को अभी फ़ॉलो करें। धन्यवाद!
0 टिप्पणियाँ