बटुए का हिसाब और माँ की गुल्लक

 "अक्सर हम नोटों की गड्डी में प्यार तोलने लगते हैं, और यह भूल जाते हैं कि घर की औरतें अपनी ख्वाहिशों का गला घोंटकर उसी पैसे से घर की इज़्ज़त बचा रही होती हैं।"


रजत ने ऑफिस का बैग सोफे पर पटका और पानी का गिलास लिए बिना ही सीधे बेडरूम में दाखिल हुआ। उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। सामने उसकी पत्नी, स्वाति, अलमारी में धुले हुए कपड़े जमा रही थी। रजत की पदचाप सुनकर उसने पलटकर देखा और मुस्कुराई, लेकिन रजत की आँखों में तैरते गुस्से को देखकर उसकी मुस्कान वहीं ठिठक गई।

"क्या हुआ रजत? आप इतना परेशान क्यों लग रहे हैं?" स्वाति ने पूछा।

रजत ने एक गहरी सांस ली और कड़े शब्दों में कहा, "स्वाति, मैं तुम्हें महीने की पहली तारीख को अपनी पूरी तनख्वाह लाकर देता हूँ। एक-एक रुपया तुम्हारे हाथ में रखता हूँ, इस भरोसे के साथ कि तुम घर को सही से चलाओगी। लेकिन आज मुझे पता चला कि तुम मेरी माँ को उनके जेब खर्च के लिए पैसे नहीं देती?"

स्वाति हक्की-बक्की रह गई। "रजत, यह आप क्या कह रहे हैं? मैंने कब..."

"बहस मत करो स्वाति!" रजत ने उसकी बात काट दी। "आज माँ मंदिर जा रही थीं, तो उन्होंने मुझसे सौ रुपये मांगे रिक्शे के लिए। मुझे शर्म आ गई। जिस बेटे की कमाई इतनी अच्छी हो, उसकी माँ को सौ रुपये के लिए हाथ फैलाना पड़े? तुम पूरे घर का राशन भरती हो, बच्चों की फीस देती हो, लेकिन माँ के हाथ में दो-चार हज़ार रुपये नहीं रख सकतीं कि वो अपनी मर्जी से कुछ खा सकें या दान कर सकें?"

स्वाति की आँखों में आंसू आ गए। वह कुछ कहना चाहती थी, बताना चाहती थी कि सच्चाई क्या है, लेकिन रजत सुनने के मूड में नहीं था।

"अब से एक बात सुन लो," रजत ने फैसला सुनाते हुए कहा। "मैं तुम्हें घर खर्च के पैसे दूँगा, लेकिन माँ का खर्चा मैं खुद उठाऊँगा। अब से मैं हर महीने माँ को 5000 रुपये अलग से नकद दूँगा ताकि उन्हें कभी तुम्हारे आगे या मेरे आगे हाथ न फैलाना पड़े।"

रजत पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया और सीधे माँ के कमरे में गया।

उसकी माँ, कावेरी देवी, पूजा कर रही थीं। रजत ने उनके पास जाकर 500 रुपये के दस नोट उनके हाथ में रख दिए।

"ये क्या है लल्ला?" कावेरी देवी ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा।

"माँ, ये आपका जेब खर्च है। अब से हर महीने मैं आपको पैसे दूँगा। आपको जो खरीदना हो, जो खाना हो, आप मंगा लेना। स्वाति से मांगने की ज़रूरत नहीं है," रजत ने भावुक होकर कहा।

कावेरी देवी ने नोटों को देखा, फिर रजत को। वे कुछ पल चुप रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, इसकी क्या ज़रूरत है? घर में सब कुछ तो है।"

"नहीं माँ, ज़रूरत है। मुझे अच्छा नहीं लगा कि आपको मुझसे पैसे मांगने पड़े," रजत ने कहा और वहां से चला गया।

उस दिन के बाद से घर का नियम बदल गया। रजत को लगता था कि उसने बहुत बड़ा इंसाफ किया है। वह स्वाति को घर खर्च के लिए पैसे देता, लेकिन उसमें से 5000 रुपये काट लेता। स्वाति चुपचाप वो पैसे ले लेती और अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींचती रहती।

समय बीतता गया। रजत देखता कि माँ खुश हैं (या उसे लगता था कि वे खुश हैं)। कभी-कभी माँ बच्चों के लिए टॉफी मंगा लेतीं, कभी मंदिर में प्रसाद चढ़ा देतीं। रजत को संतोष होता कि उसकी माँ 'आत्मनिर्भर' है।

उधर स्वाति की मुश्किलें बढ़ गई थीं। महंगाई आसमान छू रही थी। दूध के दाम बढ़ गए थे, बच्चों की ट्यूशन फीस बढ़ गई थी, लेकिन रजत ने जो 5000 रुपये कटौती की थी, उसका असर बजट पर पड़ रहा था। स्वाति ने अपनी छोटी-छोटी खुशियां मारना शुरू कर दिया। उसने अपने लिए नए कपड़े खरीदना बंद कर दिया, पार्लर जाना छोड़ दिया। यहाँ तक कि राशन में भी कटौती कर दी, ताकि रजत की पसंद का शाही पनीर और खीर रविवार को बन सके।

रजत को यह सब दिखाई नहीं देता था। उसे लगता था कि घर तो वैसे ही चल रहा है, इसका मतलब स्वाति पहले उन पैसों को बर्बाद करती थी या बचाकर मायके भेजती थी। यह शक उसके मन में घर करने लगा।

छह महीने बीत गए। दीवाली का त्यौहार आने वाला था। रजत को अपनी कंपनी से बोनस मिलने की उम्मीद थी, लेकिन कंपनी को घाटा होने के कारण इस साल बोनस नहीं मिला। रजत बहुत तनाव में था। घर की पुताई होनी थी, बच्चों के नए कपड़े आने थे, और रिश्तेदारों के लिए मिठाई।

रात को खाने की मेज पर रजत ने स्वाति से कहा, "स्वाति, इस बार बोनस नहीं मिला। तुम्हारे पास पिछले महीनों की कुछ बचत होगी न? वो निकाल लो, दीवाली का खर्चा करना है।"

स्वाति ने सिर झुका लिया। "रजत, बचत कहाँ से होती? आपने जो बजट कम किया, उसमें तो घर का खर्च ही मुश्किल से चल रहा है। पिछले दो महीनों से तो मैंने अपनी पुरानी साड़ियाँ ही रफू करके काम चलाया है।"

रजत का पारा चढ़ गया। "क्या मतलब बचत नहीं है? मैं तुम्हें 40 हज़ार रुपये देता हूँ, वो क्या कम होते हैं? तुम ज़रूर पैसे उड़ाती हो। या फिर अपने भाई को भेजती हो। आज जब मुझे ज़रूरत है, तो तुम हाथ खड़े कर रही हो?"

स्वाति की रुलाई फूट पड़ी। "रजत, आप मुझ पर इल्ज़ाम लगा रहे हैं? आपने कभी पूछा कि सिलेंडर कितने का आ रहा है? बच्चों की फीस कितनी हो गई है? माँजी की दवाइयाँ..."

"माँजी को बीच में मत लाओ!" रजत चिल्लाया। "उनके पैसे तो मैं अलग से देता हूँ। उनकी दवाइयाँ मैं लाता हूँ। तुम बस बहाने बना रही हो। मुझे नहीं पता, मुझे कल तक 20 हज़ार रुपये चाहिए, वरना इस बार दीवाली काली मनेगी।"

रजत खाना छोड़कर उठ गया। स्वाति रसोई में जाकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसे दुख पैसों का नहीं था, उसे दुख उस अविश्वास का था जो रजत की आँखों में था।

अगली सुबह रजत हॉल में सिर पकड़कर बैठा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। क्या दोस्तों से उधार ले?

तभी कावेरी देवी (माँ) अपने कमरे से बाहर आईं। उनके हाथ में एक कपड़े की पुरानी थैली (पोटली) थी। वे धीरे-धीरे चलकर रजत के पास आईं और वो पोटली उसके सामने मेज पर रख दी।

"ये क्या है माँ?" रजत ने पूछा।

"खोल कर देख," कावेरी देवी ने शांत स्वर में कहा।

रजत ने पोटली खोली। उसमें 500-500 के नोटों की गड्डियाँ थीं और कुछ 100-200 के खुले नोट भी थे। रजत ने गिना, पूरे 35 हज़ार रुपये थे।

"माँ, इतने पैसे? आपके पास कहाँ से आए?" रजत हैरान था।

कावेरी देवी रजत के पास बैठ गईं। "लल्ला, ये वही पैसे हैं जो तू मुझे पिछले छह महीनों से 'जेब खर्च' के नाम पर दे रहा था।"

"पर माँ... आपने खर्च नहीं किए?"

"खर्च किस पर करती बेटा?" कावेरी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा। "मेरे पास भरा-पूरा घर है, तेरे जैसा बेटा है, और स्वाति जैसी बहू। मुझे किस चीज़ की कमी थी?"

रजत चुप रहा।

कावेरी देवी ने आगे कहा, "तुझे लगता था कि स्वाति मुझे पैसे नहीं देती, इसलिए तूने उसे डांटा और पैसे काट लिए। पर तूने कभी सच जानने की कोशिश की? बेटा, स्वाति मुझे पैसे देने आती थी। हर महीने की पहली तारीख को वो मेरे पास लिफाफा लेकर आती थी। पर मैं ही मना कर देती थी।"

"क्यों माँ?"

"क्योंकि मुझे पता था कि महंगाई बढ़ गई है और तेरी तनख्वाह उतनी ही है। स्वाति बेचारी घर चलाने के लिए अपनी इच्छाएँ मार रही थी। मुझे पैसे लेकर क्या करना था? दो वक्त की रोटी और प्यार तो वो मुझे वैसे भी दे रही थी। उस दिन मंदिर जाते वक्त मैंने तुझसे 100 रुपये इसलिए मांगे थे क्योंकि मेरे पास खुल्ले नहीं थे और स्वाति घर पर नहीं थी, वो बाज़ार गई थी। तूने उसे मेरी बेबसी समझ लिया और बहू की कंजूसी।"

रजत का सिर शर्म से झुक गया।

कावेरी देवी ने एक और बात बताई जिसने रजत को अंदर तक झकझोर दिया। "और ये जो ऊपर से 5 हज़ार रुपये एक्स्ट्रा हैं न इसमें, ये स्वाति ने दिए हैं। पिछले महीने जब तूने कहा था कि तुझे जूतों की ज़रूरत है पर बजट नहीं है, तो स्वाति ने अपने मायके से भाई दूज पर मिले शगुन के पैसे मुझे दिए थे और कहा था—'माँजी, आप ये पैसे रजत को दे देना, कहना आपने जमा किए हैं। अगर मैं दूँगी तो वो लेंगे नहीं या डांटेंगे कि मेरे पास पैसे कहाँ से आए'।"

रजत की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह अपनी पत्नी को चोर और फिजूलखर्च समझ रहा था, जबकि वो तो घर की नींव बनकर चुपचाप सारा भार सह रही थी। और माँ... माँ ने बेटे के दिए पैसों को खर्च करने के बजाय उसी की मुसीबत के लिए जमा करके रखा था।

"मैं कितना गलत था माँ," रजत रुंधे गले से बोला। "मैं पैसों के घमंड में अंधा हो गया था। मैंने स्वाति का दिल दुखाया, उसे ताने मारे।"

तभी स्वाति चाय लेकर आई। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। रजत ने उसे देखा। वो पुरानी साड़ी में थी, वही साड़ी जिसे वो शायद कई सालों से पहन रही थी।

रजत उठा और स्वाति के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। "मुझे माफ़ कर दो स्वाति। मैं घर का मुखिया बनकर सिर्फ हुकुम चला रहा था, जबकि असली मैनेजर तो तुम हो। मैंने तुम्हारा हक़ मारकर माँ को दिया, और माँ ने वही पैसा वापस मुझे देकर यह साबित कर दिया कि घर पैसों से नहीं, त्याग से चलते हैं।"

स्वाति ने रजत के हाथ पकड़ लिए। "ऐसा मत कहिये। आप बस हम पर विश्वास रखिये। पैसा कम हो तो भी घर चल जाता है, पर अगर विश्वास कम हो जाए, तो महल भी खंडहर बन जाते हैं।"

रजत ने उस पोटली में से पैसे निकाले और स्वाति के हाथ में रख दिए। "ये लो। आज हम सब बाज़ार चलेंगे। सबसे पहले तुम्हारे लिए नई साड़ी आएगी, माँ के लिए शॉल और बच्चों के कपड़े। घर की पुताई अगली बार सही, पर इस दीवाली तुम्हारे चेहरे की मुस्कान फीकी नहीं पड़नी चाहिए।"

कावेरी देवी ने दोनों के सिर पर हाथ रखा। "बस, यही तो चाहिए मुझे। मेरा जेब खर्च मेरा परिवार है। जब तुम दोनों खुश रहते हो, तो मेरा खज़ाना भरा रहता है।"

उस दीवाली रजत के घर में सिर्फ़ दीये नहीं जले, बल्कि रिश्तों पर जमी धूल भी साफ हो गई। रजत जान गया था कि पत्नी 'नौकरानी' नहीं, 'सहधर्मिणी' होती है और माँ 'जिम्मेदारी' नहीं, 'संजीवनी' होती है।


दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवार में पारदर्शिता और विश्वास कितना ज़रूरी है। अक्सर पुरुष यह नहीं देख पाते कि एक गृहणी घर चलाने के लिए कितने मूक समझौते करती है। और माँ... माँ तो वो बैंक है जहाँ आप जो भी जमा करते हैं, वो सूद समेत (दुआओं के साथ) आपके बुरे वक्त में वापस मिल जाता है।

आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या आपके घर में भी कोई ऐसी 'स्वाति' या 'कावेरी माँ' है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।

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