कलंक

     पूष माह के ठिठुरती  रात  में मुनिया  अपने सिर और मुँह को शाल से ढके दबे पाँव घर से निकलती है  उसका पति तिहाड़ी मजदूर जो ठहरा. सो रामजी  मेहनतकश काम से थक कर दारू पी बेसुध सोया  पड़ा है । जल्दी से तेज कदम डग भरते हुए गेंहूँ के खेत में मनोहर से मिलने जाती है मुनिया .  मनोहर भी अपनी मुनिया का बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा .

ऐ मनोहर !अब और नहीं रहा जाता तेरे वगैर  . माँ बाबा जबरदस्ती पियक्कड़ के पल्ले बाँध दिए.  काम करके आता व खा पी के दारू ढरका के सुत जाता .  तू बता मेरे साथ ब्याह करेगा ना . ऐसे ही बरगला तो नहीं रहा तू !

काहे नहीं करेंगे . तुमसे प्रेम करते हैं मुनिया . तू कह के तो देख छाती चीर कर दिखा देंगे अपना . यह सुनते ही मुनिया का दिल बाग बाग हो गया   और मनोहर के गले लग  जाती है . अपने मजबूत बाहूपाश में जकड़ लेता है मनोहर ।

एक महीने के बाद मनोहर अपने दोस्त से खबर कराता है कि वह शहर में एक किराए का घर ले रखा है वहीं पर काम भी करेगा इसलिए तुम अपना गहना और पैसा को  खर्चा वगैरह के लिए ले लेना , हमलोग शहर के मंदिर में शादी करेंगे फिर एक साथ राजी खुशी रहेंगे ।

आधी रात को मुनिया एक छोटे से बैग में चार साड़ी ,कुछ गहने और बीस हजार रूपये ,जिसे पेट काट काट के सौ पचास कर बचा रही थी , रख लेती है । बस स्टैंड पर इंतजार कर रही है मुनिया . लेकिन मनोहर का कुछ अता पता नहीं . दो घंटे के इंतजार के बाद मनोहर आता है . कुछ जरूरी काम में फंस गया था इसलिए देरी हो गई.

चलो बस में बैठो मुनिया . हम तुम्हारा बैग बस के ऊपर वाले स्टैंड पर रखवाते हैं. यह कहते लपक कर बैग ले लिया है. मुनिया बस के सीट पर जा कर बैठ जाती है . पंद्रह मिनट में बस खुल गई है .  बस के खुल जाने पर मुनिया को होश आया कि मनोहर तो बस में चढ़ा ही  नहीं.  अरे रोको बस को . मेरा आदमी छूट गया है . बस रूक जाती है . मुनिया बस से उतर कर आसपास देखती है इधर उधर भी जाती है पर कहीं नहीं दिखा मनोहर।

हे भगवान! कहाँ चला गया . बदहवास खोजती रही. वहाँ पर होता मनोहर तब ना मिलता ।

ओ मैडम ! चलना है आपको .कंडक्टर झलाकर बोला .  नहीं भइया मेरा बैग दे दो जरा , अब नहीं जा पाऊंगी।

कंडक्टर बस के छत पर से चिल्लाकर बोला  . अरे मैडम यहाँ कोई बैग नहीं है . ठीक से देखो भाई.  नहीं यहाँ कोई सामान  ही नहीं है . खाली है छत।

समझ गई मुनिया कि मनोहर से ठगी जा चुकी थी  . अब क्या करे  

घर लौटे या मायके .

नहीं नहीं अपने घर ही चली जाती हूँ ये तो नींद में होंगे . इनको क्या पता चलेगा . सो मुनिया घर आकर चुपचाप सो जाती है ।

सुबह खाना खाते समय रामजी बोल पड़े . क्यों भाग गया  ना मनोहर तुमको धोखा देकर .

मुनिया को काटों तो खून नहीं . शर्मिदगी से मुंडी गाड़ लेती है .

मुनिया डरी सहमी ... अजी आपको कैसे पता चला . सब पता है मुझे .

मनोहर गाँव के लड़कियों को बहला फुसलाकर शादी का सब्जबाग दिखा वेश्यालय में बेच देता है इन्ही पैसों से ऐश मौज करता है साला !

तुम जब जाती थी उससे मिलने .  मेरी नजर रहती थी तुम पर ..गनीमत है कि सीमा पार नहीं किया उसने . वरना वहीं गेंहू के खेत में मारकर गाड़ देता।

तुमको क्या लगता है कि दारूबाज हूँ . अरे नहीं ऐसे ही थोड़ी थकान मिटाने के लिए पीता था , अब से वो भी बंद अपनी  मुनिया के लिए।

ये लो तुम्हारा बैग . 

मुनिया की आंखों से गंगा जमुना की धारा बह चली है . आप धन्य हैं रामजी . मेरी इज्जत बचा ली आपने वरना वो मुझे भी वैश्या बना देता ।

-अंजूओझा

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