शीतल जल

  बेटा, तुम्हे शायद अहसास नही है कि जिन बच्चों की शिक्षा का स्तर अच्छा नही होता,या उनके मार्क्स कम रहते हैं, तो उनका भविष्य अंधकारमय रहता है।मैं तुम्हे कभी पढ़ते नही देखता,शरारत और खेल कूद करते ही देखता हूँ।यदि नही पढ़ना है, तो फिर इतना खर्च करने की क्या जरूरत?बेटा अब भी संभल जाओ, कम से कम ग्रेजुएशन तो कर लो।

         पापा, मैं अब आपको शिकायत का मौका नही दूंगा।

      अरे बेटा, तुम्हारा पापा हूँ, सब समझता हूं,पर क्या करूँ,बेबस हूँ।ये तो तुम न जाने कितनी बार कह चुके हो,मैंने देखा है ना,तुम्हारी हाई स्कूल में सेकंड क्लास आयी है,इस सेकंड क्लास के आज के जमाने मे कोई मायने है क्या?मुझे नही लगता बेटा तुम इंटर में पास भी हो पाओगे?कोई कुछ कहे तुम पर कोई फर्क नही पड़ता,ढीठ हो गये हो।कहते कहते सुनील जी की आंखों में आंसू तक आ गये, उन्हें अंशू का भविष्य दिखाई पड़ रहा था।

         पापा बोलते जा रहे थे,और  अंशू सर झुकाये चुपचाप सुनता जा रहा था।अपनी भड़ास निकाल    सुनील जी झल्लाकर दूसरे कमरे में चले गये।वे जानते थे कि अंशू की पढ़ाई लिखाई में कोई रुचि नही है।उसके भविष्य के बारे में वे  चिंतित रहते थे।इंटर में पढ़ने वाले बेटे को पीटा भी नही जाता,उनके कुछ भी समझ नही आता था।

         सुनील जी का इकलौता बेटा अंशू बचपन से ही खूब सुंदर और सबको आकर्षित करने वाला था।शुरू में तो ठीक रहा,लेकिन बाद में पढ़ाई लिखाई से उसका मन उचट गया।निरंतर समझाने बुझाने सख्ती करने का अंशू पर कोई फर्क नही पड़ रहा था।गरदन झुका कर सब बातें सुनना और आगे पढ़ाई पर ध्यान देने का आश्वासन देना, उसका नित्य का क्रम बन गया था।लेकिन फिर वही ढाक के पात ,अंशू में कोई परिवर्तन नही आ रहा था।

        जैसा सोचा था,वैसा ही हुआ,अंशू तो आज प्रातः 7 बजे के बजाय 8 बजे सोकर उठा।सुनील जी का अंतर्मन तक हिल गया,एक बेटा और उसमें भी उनके समझाने बुझाने तक का असर एक दिन को भी नही दीखा।निराशा की छाया में सुनील जी दिल पर भारी बोझ ले अपने ऑफिस चले गये।

         अब सुनील जी ने अपने बेटे को कुछ भी कहना छोड़ दिया था,नियति को उन्होंने स्वीकार कर लिया।एक रात्रि को अचानक आंखे खुल जाने पर सुनील जी ने देखा कि अंशू के कमरे की लाइट जल रही है,उन्होंने उठकर धीरे से कमरे में झांककर देखा तो उन्होंने अंशू को कुछ पढ़ते देखा।तो सुनीलजी का माथा ठनका कि यह रात्रि में दो बजे कहीं कोई अश्लील पुस्तक तो नही पढ़ रहा?

आशंकित सुनील जी एकदम तेजी से कमरे में घुस कर अंशू के हाथ से पुस्तक झटक लेकर देखने लगे कि वह क्या पढ़ रहा है?अपने पापा को ऐसे आया देख अंशू सकपका गया।सुनीलजी ने राहत की सांस ली कि पुस्तक अंशू के कोर्स की थी।वे चुपचाप आकर अपने बिस्तर पर लेट गये।

      अंशू के इंटरमीडिएट की परीक्षाएं चल रही थी,सुनीलजी ने एक बार भी अंशू से यह पूछा ही नही कि उसकी परीक्षा कैसे चल रही है।वे जानते थे कि यदि हुआ भी तो मुश्किल से पास हो पायेगा।उनका कोई उत्साह था ही नही।परीक्षाएं समाप्त हो गयी। 

         आज इंटरमीडिएट का परिणाम आना था,सुनीलजी ने कोई दिलचस्पी या जिज्ञासा प्रकट ही नही की। अचानक अंशू उनके कमरे में आया और पापा पापा कहते हुए उनसे चिपट गया,उसके मुंह से कोई बोल निकल ही नही रहे थे,सुनील जी ने समझा कि लगता है फेल हो गया है, पर बेटे को इस प्रकार मुद्दत बाद अपने से लिपटना उनके अंदर के प्यार को उकेर रहा था, उसे ढाढस देने के उद्देश्य से उन्होंने अंशू के सिर पर हाथ रख दिया, पर बोल कुछ न पाये।इतने में पीछे खड़ी अंशू की माँ बोली जानते हो जी अपने अंशू ने अपने कॉलेज को टॉप किया है।फर्स्ट आया है मेरा अंशू।

      सुनकर सुनीलजी अवाक रह गये, ये चमत्कार कैसे हो गया?अंशू की माँ ने ही बताया कि रात को चुपचाप पढ़ता था,कह रहा था,पापा को सरप्राइज दूंगा,उनके हर सपने को पूरा करूँगा,उनको दिये हर दुःख को हर लूंगा।देखो न  कर दिखाया ना हमारे बच्चे ने।

     सुनीलजी बोल अब भी न पाये, पर उन्होंने अंशू और जोर से अपने से चिपटा लिया।सुनील जी को लगा अरे इस घड़े में तो शीतल जल था।

बालेश्वर गुप्ता, नोयडा

सच्ची घटना पर आधारित,अप्रकाशित


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