पौराणिक कथाओं में माॅं दुर्गा को आदिशक्ति का अवतार माना गया है।कहा जाता है कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म स्थापित हो जाता है ,तब-तब ईश्वर किसी-न-किसी रूप में पृथ्वी पर अवतरित होकर धर्म की रक्षा करते हैं।एक समय पृथ्वी पर दानवों का अत्याचार चरम पर पहुॅंच चुका था।उसी समय माॅं आदिशक्ति ने दुर्गा का अवतार लिया था।उनका यह अवतार दानवों के संहार के लिए हुआ था। उन्होंने ऐसे दानवों से पृथ्वी को मुक्त कराया,जिनका संहार देवताओं के वश में भी नहीं था।देवता सर्वशक्तिमान होते हैं, परन्तु समय-समय पर दानवों द्वारा उन्हें चुनौतियाॅं भी मिलती रहीं हैं।एक बार महिषासुर दानव ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था।उसका क्रूर व्यवहार देवताओं के क्रोध में आग पर तेल के समान काम किया। परिणामस्वरूप आदिशक्ति दुर्गा को प्रकट होना पड़ा।
पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर एक भयानक राक्षस था। संस्कृत में महिष का अर्थ भैंस होता है। महिषासुर के पिता का नाम रंभ था,जो राक्षसों का राजा था।एक बार असुरराज जल में रहनेवाली एक भैंसा से प्रेम कर बैठा,उसी के मिलन से महिषासुर का जन्म हुआ।इसी कारण महिषासुर जब चाहे तब भैंस और फिर इच्छानुसार मानव रूप धारण कर लेता था।वह मायावी जाल रचने में माहिर था। महिषासुर अत्यधिक क्रूर और अत्याचारी था, उसकी इच्छा समस्त देव और दानवों पर विजय पाने की थी।इसके लिए वह ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करने लगा।उसकी वर्षों की कठिन तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए। उन्होंने महिषासुर से वरदान माॅंगने को कहा।उसने ब्रह्मा जी से अमरत्व का वरदान माॅंगा, परन्तु ब्रह्मा जी ने उसे समझाते हुए कहा -"वत्स!अमर होने का वरदान छोड़कर कोई अन्य वरदान माॅंग लो, क्योंकि जिसका जन्म हुआ है,उसकी मृत्यु निश्चित है!"
महिषासुर ने बहुत सोच-विचारकर ब्रह्मा जी से अन्य वर माॅंगते हुए कहा -"प्रभो! कोई भी देवता , दानव या मानव मुझ पर विजय न प्राप्त कर सके।इन तीनों में से किसी पुरुष के हाथों मेरी मृत्यु न हो।"
महिषासुर को अपनी शक्ति पर इतना घमंड था कि उसे विश्वास हो चला था कि कोई स्त्री तो उसका वध कर ही नहीं सकती है!
ब्रह्मा जी ने उसे तथास्तु कहा और अंतर्धान हो गए।
ब्रह्मा जी से वरदान पाकर महिषासुर अत्यधिक निरंकुश और दुराचारी बन गया।उसने विशाल दैत्यों की सेना का संगठन किया।वह इन्द्रलोक और पृथ्वी पर भयंकर उत्पात मचाने लगा। देवताओं को भी सताने लगा।उसने अपनी विशाल सैन्य बल की सहायता से पाताल और मर्त्यलोक पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया।उसके बाद उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर इन्द्रलोक पर भी कब्जा कर लिया।सभी देवगण परेशान होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास गए, परन्तु ब्रह्मा जी के वरदान के कारण सभी देवता मिलकर भी महिषासुर को परास्त नहीं कर पाऍं।सभी देवता परेशान होकर स्वर्गलोक से भागकर पहाड़ियों में छिपते फिर रहे थे। देवताओं के नहीं रहने से हवन आदि समस्त कर्म बंद हो गए, परिणामस्वरूप जगत में वर्षा का अभाव हो गया। वर्षा के अभाव में भूमि शुष्क और जलविहीन हो गई। बहुत से जीव-जंतु जल के अभाव में मारे गए। घर-घर शवों के ढ़ेर लगने लगें।ऐसी स्थिति सौ साल तक बनी रही।इस प्रकार अनर्थ की स्थिति देखकर जीवित मनुष्य और देवता त्राहि-त्राहि करने लगें।
महिषासुर के आतंक से निजात पाने के लिए सभी देवताओं ने मिलकर विचार किया कि कौन ऐसी स्त्री हो सकती है,जो महिषासुर का वध कर सके?
बहुत विचार -विमर्श के बाद भगवान विष्णु ने इसका निदान बताते हुए कहा -"देवगण!अगर सभी देवताओं के तेज और सबकी शक्ति के अंश से कोई सुन्दरी उत्पन्न हो जाऍं,तो वहीं महिषासुर का वध कर सकती है!"
भगवान विष्णु की बात मानकर सभी देवताओं ने मिलकर अपने तेज से एक महा तेजस्विनी सुन्दर नारी को प्रकट किया।इस आदिशक्ति के निर्माण के लिए भगवान विष्णु ने अपने मुख से हजारों कांतिमय सूर्यों के समान दिव्य तेज दिया और देवी की दोनों भुजाऍं बनाई।भगवान शिव ने अपने शरीर के तेज से देवी का मुख बनाया। यमराज ने अपने तेज से देवी का केश बनाया। चन्द्रमा ने अपने तेज से देवी के दोनों स्तन बनाऍं। वरुण ने अपने तेज से जंघा और उरु उत्पन्न किऍं। पृथ्वी के तेज से देवी के नितंबों का निर्माण हुआ। ब्रह्मा जी के तेज से दोनों चरण उत्पन्न हुए।सूर्य के तेज से पैरों की ऊॅंगलियाॅं उत्पन्न हुईं।वसुओं के तेज से हाथों की ऊॅंगलियाॅं निर्मित हुईं। कुबेर के तेज से नासिका उत्पन्न हुई।वायु के तेज से दोनों कान उत्पन्न हुए और प्रजापति के तेज से भृकुटियाॅं उत्पन्न हुईं।
सभी देवताओं के तेज से इस प्रकार आदिशक्ति दुर्गा प्रकट हुई ।अब देवताओं ने देवी को अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित किया।इसके लिए शिवजी ने देवी को अपना त्रिशूल दिया। विष्णु जी ने अपना चक्र समर्पित किया। अग्नि ने शक्ति, वरुण ने शंख, इन्द्र ने वज्रास्त्र तथा अपने श्रेष्ठ हाथी का घंटा,वायु ने धनुष-बाण दिया।काल ने अपनी तलवार और ढाल से सुशोभित किया। धनपति कुबेर ने उन्हें उत्तम सुरा से भरा एक पात्र तथा शेषनाग जी ने देवी को नाग हार प्रदान किया।इस प्रकार सभी देवताओं ने अपनी तरफ से अन्य चीजों से सम्मानित किया।उसके बाद सौम्य और खुबसूरत देवी का अवतरण हुआ। उन्हें विविध अस्त्र प्रदान करने के बाद सभी देवों ने उनकी स्तुति करते हुए कहा -"हे देवी! हमें महिषासुर के आतंक से निजात दिलाने का कष्ट करें!"
देवी ने मुस्कुराते हुए सभी देवताओं को सांत्वना प्रदान करते हुए कहा -"हे !देवगण!अब आप लोग अपने भय का त्याग करें। मेरा प्रण है कि मैं अत्याचारी महिषासुर के आतंक से सभी को अवश्य मुक्ति दिलवाऊॅंगी।"
महिषासुर ने देवी की सुन्दरता की कहानी सुनी और उन पर मोहित हो उठा।उसने अपने दूतों को आदेश देते हुए कहा -"तुमलोग अपनी जान बचाना चाहते हो तो येन केन प्रकारेण उस सुंदरी को मेरे समक्ष प्रस्तुत करो।"
महिषासुर के दूत देवी को तो पकड़ नहीं सकते थे,तो उन्होंने महिषासुर की माॅंग देवी के समक्ष प्रस्तुत कर दी।देवी तो महिषासुर की निर्लज्जता से पहले से ही क्रोधित थीं,उस पर से उसकी माॅंग ने आग में तेल का काम किया।देवी ने क्रोधित होकर दूतों से कहा-" अभी जाकर उस दुष्ट पापी से कह दो कि अगर उसे जीवित रहना है तो पाताल लोक चला जाऍं,वरना मैं उसे यमलोक पहुॅंचा दूॅंगी!"
अपने दूतों से देवी का आदेश सुनते ही महिषासुर अत्यधिक क्रोधित हो उठा।उसने अपने सेनापति चिक्षुर,दुर्धर,दुर्मुख,वाश्कल तथा विडालवदन जैसे यमराज की तरह भयानक योद्धाओं को देवी से युद्ध करने भेजा।देवी ने क्रोधित होते हुए अपने अंगारों के समान जलती ऑंखें कर सभी योद्धाओं को मार डाला।उसके बाद क्रोध और घमंड से चूर महिषासुर देवी से युद्ध करने आया।वह मायावी रुप धारण कर नौ दिन तक देवी से युद्ध करता रहा।अंत में पस्त होकर भैंसा का रूप धारण कर देवी पर अपने सींगों से प्रहार करने लगा। दसवें दिन देवी ने त्रिशूल से उस पर वार किया। फिर अंत में देवी ने सहस्त्रधारवाला चक्र चलाकर महिषासुर का सिर काटकर उसे युद्धभूमि पर गिरा दिया। महिषासुर की मौत से भयभीत बचे हुए योद्धा प्राण बचाकर पाताल लोक भाग गए।
महिषासुर की मौत से खुश होकर सभी देवता आदिशक्ति देवी की जय-जयकार करने लगें।नौ दिन तक युद्ध चला, इसलिए नवरात्र मनाई जाती है। दसवें दिन महिषासुर का वध हुआ,इस कारण उस दिन विजयादशमी मनाई जाती है। युद्ध समाप्त होने पर धरती पर पुनः धर्म की स्थापना हो गई। बुराई पर अच्छाई की जीत सदैव होती है।एक बाद हमें सदैव याद रखनी चाहिए कि आग में तेल डालने से आग और अधिक धधकती है,उसका परिणाम बुरा होता है।
समाप्त।
लेखिका -डाॅ संजु झा ,
स्वरचित
लेखिका किसी तथ्य की पुष्टि नहीं करती है । कहानी में कल्पना का सम्मिश्रण है।
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